छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने NSS कैंप में गैर-मुस्लिम छात्रों को नमाज पढ़ने के लिए मजबूर करने के मामले में प्रोफेसर को राहत देने से इनकार किया

Chhattisgarh high court

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (Chhattisgarh High Court) ने बिलासपुर स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) और उसके बाद की आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया। इस प्रोफेसर पर बिलासपुर में नेशनल सर्विस स्कीम (NSS) कैंप के दौरान गैर-मुस्लिम छात्रों को नमाज पढ़ने के लिए मजबूर करने का आरोप है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की बेंच ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से मना करते हुए कहा कि जांच पूरी हो चुकी है और आरोपी दिलीप झा के खिलाफ पर्याप्त सामग्री इकट्ठा की जा चुकी है, जिससे मुकदमा चलाने की जरूरत है।

कोर्ट ने कहा, ‘चार्जशीट से पता चलता है कि जांच में प्रथम दृष्टया सबूत मिले हैं जो ट्रायल की मांग करते हैं, और इस स्टेज पर कोई निष्कर्षात्मक प्रमाण नहीं है कि कार्यवाही किसी गलत मंशा से शुरू की गई थी।’

कोर्ट ने झा की इस दलील को खारिज कर दिया कि उनका कैंप साइट पर कोई ऑपरेशनल रोल नहीं था और वे घटना के समय मौजूद भी नहीं थे।

यह मामला गुरु घासीदास सेंट्रल यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित 7 दिनों के NSS कैंप से जुड़ा है, जो मार्च में हुआ था। कैंप में ईद-उल-फित्र के मौके पर मुस्लिम छात्रों को स्टेज पर नमाज पढ़ने के लिए कहा गया।

शिकायत के अनुसार, अन्य (गैर-मुस्लिम) छात्रों को भी उनकी सहमति के बिना भाग लेने के लिए मजबूर किया गया। यह भी आरोप लगाया गया कि जिन छात्रों ने आपत्ति जताई, उन्हें प्रमाण-पत्र रद्द करने समेत प्रतिकूल परिणामों की धमकी दी गई।

प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने FIR दर्ज की और बाद में चार्जशीट दाखिल की, जिसमें NSS प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर दिलीप झा को भी आरोपी बनाया गया।झा ने कोर्ट में दलील दी कि उनका कैंप साइट पर कोई ऑपरेशनल रोल नहीं था और उन पर लगाए गए आरोप बेबुनियाद हैं तथा आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

हालांकि, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह तथ्यों से संबंधित विवादित मुद्दे हैं, जिनकी जांच ट्रायल के दौरान ही होनी चाहिए।कोर्ट ने राज्य की दलील से सहमति जताते हुए कहा कि ऐसे तथ्यात्मक विवादों को याचिका रद्द करने की कार्यवाही में तय नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने टिप्पणी की, ‘याचिकाकर्ता की यह दलील कि वे घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे या केवल प्रशासनिक भूमिका में थे, ट्रायल के दौरान क्रॉस-एक्जामिनेशन और सबूतों के माध्यम से पूरी तरह से जांच की जा सकती है। इस स्टेज पर हस्तक्षेप करना तथ्यों और सबूतों पर पूर्व-निर्णय करना होगा, जिसकी शक्ति इस कोर्ट को नहीं है।’

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