हसदेव अरण्य में 7 लाख पेड़ काटने का नया प्रस्ताव, छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन ने जताया विरोध

CG NEWS रायपुर। हसदेव अरण्य क्षेत्र में नए कोल ब्लॉक केते एक्सटेंशन को मंजूरी देने के प्रस्ताव के खिलाफ छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने बुधवार को संयुक्त बयान जारी कर कड़ा विरोध जताया है। आंदोलनकारियों ने इसे ‘अडानी की लूट’ करार देते हुए केंद्र सरकार से तत्काल प्रस्ताव वापस लेने की मांग की है। 8 मई 2026 को केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (FAC) की बैठक में राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को आवंटित और अदानी के एमडीओ वाले केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक की वन स्वीकृति पर विचार होना है। छत्तीसगढ़ सरकार पहले ही इसकी अनुशंसा केंद्र को भेज चुकी है।

7 लाख पेड़ काटने का खतरा

आंदोलन के अनुसार, इस नए खदान में लगभग 7 लाख पेड़ काटे जाएंगे। इससे हसदेव के समृद्ध साल के जंगलों, जैव विविधता, हसदेव नदी और बांगो जलाशय का भारी विनाश होगा। पहले ही परसा ईस्ट केते बासेन (PEKB) और परसा खदानों में 6 लाख पेड़ काटे जा चुके हैं और 10,630 एकड़ जंगल-जमीन नष्ट हो चुकी है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला,ने कहा, ‘मोदी-साय सरकार ने छत्तीसगढ़ को अदानी के हाथों बेच दिया है। हसदेव का विनाश राजस्थान की बिजली जरूरत के नाम पर अदानी की लूट के लिए किया जा रहा है।’

पर्यावरणीय और सामाजिक खतरे

बांगो जलाशय पर संकट: छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जलाशय, जो 6 लाख हेक्टेयर जंगल में सिंचाई करता है।
हाथी रिजर्व प्रभावित: लेमरू हाथी रिजर्व बेमानी हो जाएगा क्योंकि प्रस्तावित खदान रिजर्व के 10 किमी के अंदर है।
आदिवासी प्रभाव: 98% क्षेत्र घना वन है। ग्रामीणों की आय का 70% जंगलों से आता है। वन अधिकार कानून की प्रक्रिया भी पूरी नहीं हुई है।
रामगढ़ पहाड़ी का खतरा: ऐतिहासिक, पुरातात्विक और धार्मिक महत्व वाले रामगढ़ में पहले से दरारें आ चुकी हैं। नई खदान से पूरा पहाड़ नष्ट हो सकता है।

विधानसभा प्रस्ताव की अवमानना?

आंदोलन ने याद दिलाया कि छत्तीसगढ़ विधानसभा ने 26 जुलाई 2022 को सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर हसदेव अरण्य के सभी कोल ब्लॉक्स निरस्त करने की मांग की थी। भूपेश बघेल सरकार ने भी केते एक्सटेंशन का विरोध किया था लेकिन वर्तमान विष्णुदेव साय सरकार ने उस फैसले को पलट दिया है।

राजस्थान की जरूरत का दावा झूठा?

आंदोलनकारियों ने दावा किया कि राजस्थान में कोयला आधारित बिजली की जरूरत पहले से कम हो गई है। CEA के संशोधित आंकड़ों के अनुसार 2025-36 तक 16,561 MW बिजली की जरूरत है। 32,000 MW सोलर क्षमता और अतिरिक्त बिजली उपलब्धता को देखते हुए केते एक्सटेंशन और परसा खदानों की कोई जरूरत नहीं है। ये खदानें केवल अदानी के पावर प्लांट्स के लिए ‘रिजेक्ट कोयला’ के नाम पर लूट का साधन हैं।

हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के उमेश्वर सिंह आर्मो और रामलाल करियाम ने चेतावनी दी कि हसदेव का विनाश पूरे छत्तीसगढ़ को रेगिस्तान बनाने की दिशा में एक और बड़ा कदम होगा, खासकर जब भारत के 95 शहर पहले ही दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में शामिल हैं। केंद्र सरकार तुरंत FAC बैठक में प्रस्ताव रद्द करे और हसदेव अरण्य को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए।

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