बांकीपुर हॉट सीट: भाजपा के गढ़ में प्रशांत किशोर तोड़ पाएंगे कायस्थों का वर्चस्व

बिहार के 243 विधायक में एक भी कायस्थ विधायक नहीं है। एक कायस्थ विधायक नितिन नबीन सिन्हा थे, जो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं। कायस्थ समाज का कम से कम एक प्रतिनिधि विधानसभा में रहना चाहिए। वहीं सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा का कोर वोटर भाजपा से नाराज है। ऐसे में प्रशांत किशोर के उम्मीदवार बनने के बाद यहां राजनीतिक हलचल काफी तेज हो गई है। भाजपा की तरफ से एक सामान्य लड़का को टिकट देना काफी अचरज वाली बात है।” बिहार के वरिष्ठ पत्रकार राजेश ठाकुर बिहार में हो रहे बांकीपुर विधानसभा चुनाव पर अपनी राय रखते हैं।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की पारिवारिक एवं पारंपरिक सीट बांकीपुर के उपचुनाव में देश के कई नेताओं को चुनाव जितवा चुके जनसुराज्य पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर सीधे टक्कर दे रहे हैं। तीन दशक से बीजेपी का गढ़ बांकीपुर सीट…जहां से कुल 26 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। जिसमें कुछ नाम जिनकी चर्चा मीडिया और सोशल मीडिया पर हो रही है। भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा, जन सुराज के उम्मीदवार प्रशांत किशोर, राजद की रेखा गुप्ता और तेजप्रताप यादव की पार्टी जनशक्ति जनता दल की कैंडिडेट वीणा मानवी ने भी नामांकन कराया है।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की बांकीपुर सीट को जीतना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई है। जन सुराज के संयोजक प्रशांत पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। उनके लिए यह चुनाव संगठन की वास्तविक ताकत दिखाने का अवसर है। यदि पार्टी मजबूत प्रदर्शन करती है तो बिहार की राजनीति में उसकी भूमिका बढ़ सकती है। वहीं राजद इस चुनाव को शहरी इलाके में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के अवसर के रूप में देख रहा है।

पटना में एक प्रसिद्ध पीआर टीम में नॉरेटिव मैनेजर के तौर पर काम कर रहे आशीष रंजन कहते हैं कि,”मौजूदा मुकाबला मुख्य रूप से प्रशांत किशोर और नीरज के बीच है। नीरज का फायदा यह है कि वह भाजपा के अनुभवी उम्मीदवार हैं और कायस्थ इलाके में अपनी जातिगत पकड़ के कारण मजबूत हैं। हालांकि पार्टी ने उम्मीदवार बदलने से विपक्ष को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिल गई है और नीरज अब तक जनता के बीच खुद को प्रभावी अंदाज़ में पेश नहीं कर पाए हैं।”

“प्रशांत किशोर लोकप्रियता और कद दोनों में इन उम्मीदवारों से आगे हैं, उनकी टीम पेशेवर है और वे राष्ट्रीय मीडिया में सक्रिय रूप से दिखते हैं। उनके पास तीन साल की पदयात्रा और पूरे बिहार में चुनाव लड़ने का अनुभव है, जिससे वे अपना संदेश अच्छी तरह पेश करते हैं। मगर पिछली चुनावी हार से स्पष्ट है कि उन्हें राजनीति में और सीखना होगा, खासकर विनम्रता और लोगों को साथ लेकर चलने के कौशल में।” आगे वह कहते है।

स्थानीय लोगों से सुनिए

“पूरे बिहार में विकास की तुलना करें तो बांकीपुर का विकास नितिन नवीन ने किया है। हालांकि विकास का पैमाना बहुत कम है। यहां की मुख्य राजनीति जाति का वर्चस्व है। ‌वोट भी इसी आधार पर दिया जाएगा।” संजय मंडल कहते है।

“प्रशांत किशोर अगर यहां से जीत जाएंगे तो बांकीपुर का नाम पूरे देश में होगा। नितिन नवीन ने यहां विकास किया है लेकिन अभी प्रशांत किशोर बिहार की राजनीति में प्रवेश के काफी जरूरी है।”

28 वर्षीय सन्नी कुमार कहते है।

“नितिन नवीन की बपौती रही है बांकीपुर सीट।‌बुद्धिमान और चालाक आदमी अपना घर अपने नौकर या गार्ड के हवाले छोड़ जाता है, ताकि वापस आने पर उसे वह फिर से सौंप दिया जाए। अभिषेक के बाद नीरज को टिकट देकर नीति नवीन ने यह साबित किया है।” 40 वर्षीय अभिनव सिंह कहते है।‌

आम लोगों से बात करने पर पता चलता है कि प्रशांत किशोर और भाजपा दोनों के समर्थन में काफी लोग हैं। ‌ पूरा चुनाव इन्हीं दोनों के बीच होने जा रहा है।

कंट्रोवर्सी वाला चुनाव

एक उपचुनाव जो इतने कंट्रोवर्सी से गुजर रहा है। इसकी शुरुआत तब हुई जब भाजपा ने अपना उम्मीदवार बदल दिया। भाजपा ने सबसे पहले अभिषेक कुमार सिन्हा उर्फ बंटी को टिकट देकर संदेश दिया कि वह मंडल अध्यक्ष को भी उम्मीदवार बना सकती है। अभिषेक के नामांकन को भव्य बनाया गया। एनडीए के दिग्गज नेताओं ने एकजुटता का मैसेज दिया। नामांकन के अगले ही दिन अभिषेक को नाम वापस लेना पड़ा। भाजपा के कार्यकर्ता के मुताबिक अभिषेक के माता-पिता के चारा घोटाला से जुड़े होने और सर्टिफिकेट से जुड़े मामले के चलते भाजपा ने टिकट वापस ले लिया था। इसके बाद भाजपा ने आनन-फानन में नीरज कुमार सिन्हा को नया उम्मीदवार बनाया। इस बदलाव को लेकर जिससे विपक्ष ने अंदरूनी मतभेद का आरोप लगाया; भाजपा ने इसे सामान्य प्रक्रिया बताया।

फिर दूसरी कंट्रोवर्सी जब तेज प्रताप यादव वाली जनशक्ति जनता दल की उम्मीदवार वीणा मानवी को नामांकन दाखिल करने के तुरंत बाद पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। मानवी को बेल लेना पड़ गया। तेजप्रताप और समर्थक कार्रवाई को चुनावी साजिश बताते हैं, जबकि पुलिस कहती है कि यह अदालती प्रक्रिया थी।

तीसरी कंट्रोवर्सी तब हुई जब सम्राट चौधरी की संपत्ति की जानकारी पता चली। चारों प्रत्याशियों में सबसे अमीर प्रशांत किशोर हैं। उनके पास भाजपा के नीरज सिन्हा (संपत्ति 20.28 लाख) से करीब 950 गुना ज्यादा संपत्ति है। जनसुराज्य के मालिक प्रशांत किशोर के पास प्रशांत किशोर के पास कुल 197.99 करोड़ रुपए की संपत्ति है। इनके नाम पर 22.19 करोड़ की चल और 73.87 करोड़ रुपए की अचल संपत्ति है। पीके की पत्नी जाह्नवी दास के पास 89.51 करोड़ रुपए की चल और 12.42 करोड़ रुपए की अचल संपत्ति है। उन पर 8 आपराधिक मामले दर्ज हैं। इन पर दंगा कराने, सरकारी सेवक को काम करने से रोकने, आपराधिक साजिश रचने और आपराधिक मानहानि जैसे गंभीर आरोप लगे हैं।

आंदोलन का गढ़ रहा है बांकीपुर

वर्ष 1942 बांकीपुर में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सचिवालय पर देश का झंडा फहराने की कोशिश में 7 व्यक्ति शहीद हो गये थे। यह मूर्ति बिहार विधानसभा के बगल में लगी है।‌ बांकीपुर विधानसभा की असली पहचान छात्र राजनीति की रही है।

1974 के स्टूडेंट मूवमेंट में बांकीपुर का इलाका केंद्र रहा है। जिसकी भूमिका बांध रहे थे कायस्थ जाति के जयप्रकाश नारायण। मगर इस बीच बांकीपुर की छात्र राजनीति का दायरा सिमटता चला गया। मगर हाल के वर्षों में पेपर लीक और परीक्षा की विसंगतियों को लेकर बांकीपुर में कई छात्र आंदोलन हुए हैं। बीपीएससी में गड़बड़ी के खिलाफ हुए आंदोलन का नेतृत्व प्रशांत किशोर ने भी किया है।

क्या बांकीपुर में बीजेपी के लिए गंभीर खतरा बन गये हैं पीके?

पिछले कुछ दिनों से बिहार में बीजेपी जनसुराज से जुड़े कई बड़े असंतुष्ट नेताओं को अपने खेमे में जोड़ रही है। इससे लगना है कि बांकीपुर में प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी ने बीजेपी में बेचैनी पैदा कर दी है। प्रशांत किशोर बार-बार कहते हैं कि यह चुनाव सम्राट चौधरी के सीएम बनने पर एक प्रकार का जननिरूपण (रेफरेंडम) है। इसलिए सम्राट चौधरी इस सीट को जीतने के लिए पूरी तरह जुटे हुए हैं, और उनके साथ वाले भी पूरी सक्रियता से काम कर रहे हैं।

बड़ा सवाल यह है अगर बांकीपुर का उप चुनाव भाजपा के लिए इतना महत्वपूर्ण था तो उसने पहले अभिषेक बंटी फिर नीरज भारती जैसा उम्मीदवार क्यों दिया? कोई मजबूत उम्मीदवार क्यों नहीं दिया? जबकि यह पहले दिन से तय था कि पीके बांकीपुर लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

स्थानीय पत्रकार परमवीर सिंह कहते हैं कि, “इस मामले में साफ कुछ नहीं कहा जा सकता। एक राय है कि बीजेपी चाहती है कि पीके बांकीपुर जीत जाए ताकि बिहार में विपक्ष टूटे और बीजेपी को फायदा हो। लेकिन फिर जीत के लिए इतनी मेहनत क्यों? दूसरी बात ये है कि बीजेपी कमजोर उम्मीदवार उतारकर सेफ गेम खेल रही है। अगर जीत गई तो कहेगी कि हमारे बूथ लेवल कार्यकर्ता ने पीके को हराया, अगर हार गई तो कहेगी कि हमने सिर्फ बूथ लेवल पर काम किया कोई बड़ी जीत नहीं थी।”

दिलचस्प है कि प्रशांत किशोर इस चुनाव में सिर्फ सम्राट चौधरी पर निशाना साध रहे हैं।‌ वे नितिन नबीन पर सवाल नहीं उठाते जो इस विधानसभा के पूर्व विधायक और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। वे बार-बार कहते हैं कि सम्राट चौधरी को सीएम बनाने से भाजपा के लोग भी असंतुष्ट हैं। बांकीपुर हारने से न बिहार की गद्दी पर असर पड़ेगा, न दिल्ली पर। मगर मोदी जी के पास मैसेज चला जायेगा कि उन्होंने एक अपराधी चरित्र के व्यक्ति को सीएम की कुर्सी पर बिठा दिया है।

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