क्रूड के दाम बढ़ रहे हैं लेकिन फिर भी भारत में ऑटोमोबाइल सेक्टर बूम पर है। क्रूड आयल संकट के बाद भी सरकार इस आनेवाली समस्या से अनजान बानी बैठी है। वह खुद ऑटो सेक्टर को बढ़ावा दे रही है क्योंकि इसमें सरकार को करना -धरना कुछ नहीं पड़ता और रेवेन्यू खूब आ जाता है, जीडीपी भी इससे मैनुपुलेट की जा सकती है।
ऑटो सेक्टर के बूम के कारण कई तरह के रोजगार जनरेट हो जाते हैं – कार के उत्पादन में, वितरण और सेल्स में, मेंटेनेंस में, कार लोन देने वाली कंपनियों और बैंक में, बीमा में, गैराज में। सरकार को मिलने वाले टोल में भारी इजाफा हो रहा है। सब कुछ ऑटो मोड में चल रहा है।
क्रूड के दाम बढ़ रहे हैं, फिर भी भारत में ऑटोमोबाइल सेक्टर बूम पर है। क्रूड ऑयल संकट के बावजूद सरकार इस आने वाली समस्या से अनजान नहीं है, लेकिन वो खुद ऑटो सेक्टर को खूब बढ़ावा दे रही है। क्यों? क्योंकि इसमें सरकार को ज्यादा “करना-धरना” नहीं पड़ता, रेवेन्यू खूब आ जाता है, जीडीपी के नंबर अच्छे दिखते हैं, और रोजगार भी जनरेट हो जाते हैं।
कार के उत्पादन से लेकर वितरण, सेल्स, मेंटेनेंस, कार लोन देने वाली कंपनियों और बैंकों, बीमा, गैरेज तक – हर जगह जॉब्स बढ़ रहे हैं। टोल टैक्स में भी भारी इजाफा हो रहा है, क्योंकि ज्यादा गाड़ियां मतलब ज्यादा टोल। सब कुछ “ऑटो मोड” में चल रहा है!
भारत में आजकल एक अजीब-सा खेल चल रहा है। क्रूड ऑयल के दाम आसमान छू रहे हैं (ब्रेंट क्रूड $80-84 के आसपास घूम रहा है, मिडिल ईस्ट टेंशन से), पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है, लेकिन ऑटोमोबाइल सेक्टर फिर भी रॉकेट मोड में है!
जनवरी 2026 में पैसेंजर व्हीकल्स की सेल्स 12.6% बढ़कर 4,49,616 यूनिट्स हो गईं। टू-व्हीलर्स 26.2% उछलकर 19.26 लाख पहुंचे, और कुल डोमेस्टिक सेल्स 23% जंप के साथ रिकॉर्ड स्तर पर। 2025 पूरे साल पैसेंजर व्हीकल्स करीब 43-45 लाख बिके, जबकि टू-व्हीलर्स 2 करोड़ 5 लाख से ज़्यादा । सोसायटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफेक्चरर्स के ये आंकड़े बताते हैं कि सेक्टर हाई स्पीड पर दौड़ रहा है।
लेकिन सवाल ये है – क्रूड महंगा होने के बावजूद ये बूम क्यों? और इससे सड़कें क्यों ऐसी हो गई हैं कि पैर रखने की जगह नहीं बची? सरकार को पता है समस्या आने वाली है, लेकिन वो ऑटो सेक्टर को ऐसे बढ़ावा दे रही है जैसे कोई फ्री का पैसा वाला खेल हो – रेवेन्यू आ रहा है, जीडीपी में नंबर अच्छे दिख रहे हैं, रोजगार बढ़ रहे हैं, लेकिन सड़कें, हवा और आम आदमी की जिंदगी पर क्या असर पड़ रहा है? यह सिर्फ वाहनों की बात नहीं, हमारी जिंदगी की बात है!
क्रूड महंगा तो फ्यूल महंगा होना चाहिए, फ्यूल महंगा तो लोग कार-बाइक कम खरीदेंगे – लेकिन ऐसा क्यों नहीं हो रहा?
2025 में सरकार ने छोटी कारों पर जीएसटी को 28% से घटाकर 18% कर दिया, इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर तो 5% ही है। इससे अफोर्डेबिलिटी बढ़ी। ग्रामीण इलाकों में अच्छी मानसून से डिमांड उछली। फाइनेंसिंग आसान हो गई। लोन सस्ते और ईएमआई कम हो गई।
लेकिन लोग अब छोटी कार नहीं, रुतबा दिखाने के लिए एसयूवी चाहते हैं। यूटिलिटी व्हीकल्स पैसेंजर व्हीकल सेल्स का 60-65% हो गए। लग्जरी और मिड-साइज कारों की डिमांड इतनी बढ़ी कि उनकी कीमतें बढ़ गई, मार्जिन अच्छे हो गए। इन वाहनों पर छह-छह महीने तक वेटिंग चल रही है!
इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की सेल्स भी बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स धड़ाधड़ बिक रहे हैं, क्योंकि यहां फ्यूल कॉस्ट जीरो जैसी है। सरकार की कुछ योजनाएं भी हैं। दिल्ली, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इलेक्ट्रिक व्हीकल पॉलिसी से सब्सिडी, टैक्स छूट और चार्जिंग स्टेशन बढ़ रहे हैं। पेट्रोल महंगा होने से इलेक्ट्रिक गाड़ियों की मांग बढ़ी। इसके अलावा एक्सपोर्ट भी मजबूत है। इंडियन कारें विदेश जा रही हैं, डबल-डिजिट ग्रोथ हो रही है। लोकल डिमांड + एक्सपोर्ट = सेक्टर हाई स्पीड पर!
सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतें अप्रैल 2022 से फ्रीज कर रखी हैं। ऑयल कंपनियां लॉस झेल रही हैं या प्रॉफिट से एडजस्ट कर रही हैं। आम आदमी को अभी फुल झटका नहीं लगा। लेकिन अगर क्रूड $90+ पर रहा तो प्राइस हाइक आएगा, तब बूम थम सकता है। ऑटो सेक्टर 2025-26 में 6-10% ग्रोथ का अनुमान है, लेकिन ये बूम सस्टेनेबल नहीं – क्रूड, रुपया कमजोर, ट्रेड टैरिफ से खतरा मंडरा रहा है।
सरकार ने ऑटो सेक्टर को ‘गॉडफादर’ बना दिया है। कोविड के बाद मजबूती आई – जीडीपी में योगदान 6% से बढ़कर 7.1% हो गया। सरकार इसे 12% तक ले जाना चाहती है। क्रूड महंगा होने से इम्पोर्ट बिल बढ़ेगा, रुपया दबाव में आएगा, लेकिन फिर भी रोकना नहीं चाहती। क्यों? एक्साइज, GST, रोड टैक्स, रजिस्ट्रेशन फीस से खूब कमाई हो रही है। टोल टैक्स में भारी इजाफा – ज्यादा गाड़ियां, ज्यादा टोल!
ऑटो सेक्टर जीडीपी का मल्टीप्लायर इफेक्ट देता है। कार बन रही है तो स्टील, रबर, पार्ट्स, फैक्ट्रियां – जॉब्स बढ़ते हैं। प्रोडक्शन में लाखों जॉब्स, डीलरशिप, सेल्स, सर्विस सेंटर, कार लोन (बैंक), इंश्योरेंस, गैरेज, स्पेयर पार्ट्स, टायर शॉप्स, टोल प्लाजा स्टाफ – कुल मिलाकर डायरेक्ट + इनडायरेक्ट 3-4 करोड़ जॉब्स जुड़े हैं। सरकार को बस पॉलिसी सपोर्ट देना है – जीएसटी घटाओ, इलेक्ट्रिक गाडी पर इंसेंटिव दो, प्रॉडक्शन लिंक इंसेंटिव स्कीम लागू करो – बाकी मार्केट खुद चलाता है!
लेकिन इस कारण देश में अराजकता फैल गई है। सड़कें जहां पहले चलने की जगह थीं, अब पार्किंग लॉट + रेस ट्रैक बन गई हैं। रजिस्टर्ड वाहनों की संख्या 2025-26 में 30 करोड़ पार कर चुकी है, लेकिन रोड इंफ्रा उस स्पीड से नहीं बढ़ा।
पूरे देश में ट्रैफिक जाम का नर्क झेलना पड़ रहा है। टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स 2025 में बेंगलुरु दूसरे, पुणे पांचवें नंबर पर। दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद में औसत स्पीड 15 से 20 किलोमीटर परती घंटा। लोग रोज घंटों जाम में फंसते हैं !
2025 में दिल्ली में सड़क दुर्घटनाओं में 1,617 मौतें हुईं (4.2% बढ़ोतरी)। पूरे देश में सालाना 1.5-1.7 लाख मौतें (रोज करीब 400-470)। हॉर्न बजाना, लेन न मानना, स्पीडिंग, मोबाइल यूज – सब वजहें।
प्रदूषण पर सरकार सिर्फ बात करती है – ट्रांसपोर्ट से 40% अर्बन पॉल्यूशन, जाम में एमिशन 29% ज्यादा। फुटपाथ गायब, गाड़ियां सड़क पर पार्क, पैदल यात्री खतरे में – बच्चे, बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित। मॉल, ऑफिस, घर में पार्किंग नहीं तो फुटपाथ पर खड़े कर देते हैं। लोग अब और लाउड हॉर्न लगवा रहे हैं, लेकिन सेफ्टी नहीं बढ़ी। अर्बन एरिया में ओवरक्राउडिंग।
जाम से स्ट्रेस, पॉल्यूशन से सांस की बीमारियां, एक्सीडेंट से मौतें – कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था को अरबों का नुकसान। लेकिन इसकी गणना कोई नहीं कर रहा!
ऑटो सेक्टर का बूम भारत की ग्रोथ स्टोरी का हिस्सा है – जॉब्स, रेवेन्यू, मॉडर्नाइजेशन। लेकिन अगर सड़कें, हवा और सेफ्टी पर ध्यान नहीं दिया तो ये ‘बूम’, ‘बूमरैंग’ बन जाएगा – वापस मार देगा!











