अनूपपुर। अमरकंटक में वन विभाग द्वारा 27 हजार 500 औषधीय पौधे नष्ट कर दिए गए। दरअसल आयुष वन योजना के तहत विकसित 50 हेक्टेयर का औषधीय जंगल भीषण आग की भेंट चढ़ गया। इस आग में 2021-22 में लगाए गए 27,500 से अधिक दुर्लभ औषधीय पौधे जलकर खाक हो गए हैं। अब सवाल उठ रहा है कि आखिर जिम्मेदार अधिकारी क्या कर रहे थे, जब पूरा जंगल जल रहा था।
आग में करोड़ों के पौधे स्वाहा

अमरकंटक क्षेत्र में वर्ष 2021-22 में आयुष वन योजना के तहत औषधियों वन क्षेत्र तैयार किया गया था। इसे वर्ष 2027-28 तक पूरी तरह से विकसित किया जाना था। लेकिन, योजना की अवधि पूर्ण होने से पहले ही करोड़ों रुपए की लगातार से तैयार किया गया यह पूरा क्षेत्र आग में जलकर खाक हो चुका है। इस क्षेत्र में 50 हेक्टेयर जमीन में बड़े औषधीय पौधे – 10000 और छोटे औषधीय पौधे – 17500 थे कुल मिलाकर 27 हजार 500 पौधे रोपित किए गए थे।
पौधों को ना मिली खाद, ना ही दवाई
औषधीय पौधों के संरक्षण और विकास के लिए नियमित देखभाल बेहद जरूरी होती है, लेकिन यहां तो हालात बिल्कुल उलट रहे थे। वन विभाग ने केवल पौधे लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली और बाद की देखभाल पूरी तरह नजरअंदाज कर दी. जिसका नतीजा आज सामने है। चौकीदार से मिली जानकारी के अनुसार, 2021-22 में पौधारोपण के बाद से अब तक इन पौधों में न तो खाद डाली गई और न ही किसी प्रकार की कीटनाशक दवाइयों का छिड़काव किया गया। इससे पौधे पहले से ही कमजोर हो चुके थे।
चौकीदार ने खोल दी वह विभाग की कलई

इस 50 हेक्टेयर में फैले औषधियों वन की देखभाल के लिए एक चौकीदार की नियुक्ति की गई थी। मौके पर मौजूद चौकीदार के बयान ने वन विभाग की कलई खोल कर रख दी है। चौकीदार के अनुसार उसे अक्सर अन्य जगहों पर आग बुझाने के लिए भेज दिया जाता था, इससे औषधीय वन की निगरानी पूरी तरह प्रभावित होती रही। यानी जिस व्यक्ति को सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई, उसे ही वहां से हटा दिया गया। ऐसे में सवाल है कि आखिर क्षेत्र की जिम्मेदारी किसके भरोसे छोड़ी गई थी?
खरपतवार बने आग बढ़ने की वजह
वन क्षेत्र में आग फैलने का सबसे बड़ा कारण सूखी घास और झाड़-झंखाड़ होता है, जिसे समय-समय पर हटाना बेहद जरूरी है। लेकिन यहां पिछले एक साल से सफाई नहीं कराई गई। नतीजा यह हुआ कि पूरे क्षेत्र में सूखा कचरा जमा हो गया, जिसने आग को तेजी से फैलने में मदद की। यदि समय रहते सफाई की गई होती, तो आग इतनी विकराल नहीं होती। यह सीधी सीधी लापरवाही है, जिसने पूरे औषधीय वन को तबाह कर दिया।
कागजों पर हुआ भरपूर काम ,जमीनी हकीकत शून्य
आयुष वन योजना के तहत इस क्षेत्र में हजारों पौधे लगाए गए थे, जिस पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि विभाग ने केवल कागजों में काम दिखाया। यह घटना बताती है कि सरकारी योजनाएं किस तरह केवल औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। जब निगरानी और रखरखाव ही नहीं होगा, तो ऐसी योजनाओं का क्या फायदा?
यह जनता के पैसे और संसाधनों की खुली बर्बादी का उदाहरण है। इतनी बड़ी घटना के बाद भी वन विभाग की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं आया है। न ही अब तक किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय की गई है। सवाल यह है कि जब 50 हेक्टेयर का वन जल रहा था, तब विभाग कहां था? क्या सिर्फ जांच के नाम पर मामला दबा दिया जाएगा या वास्तव में दोषियों पर कार्यवाही होगी? यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में भी ऐसी घटनाएं दोहराती जाती रहेंगी।
इस मामले पर खबर लिखने तक वन विभाग की ओर से कोई जवाब सामने नहीं आया है। लेंस रिपोर्टर ने वन विभाग के अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन, संपर्क नहीं हो सका है।









