नेशनल ब्यूरो। नई दिल्ली
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की कड़ी आलोचना की है। कोर्ट ने कहा कि एनएचआरसी अपनी अधिकार सीमा से बाहर जाकर उत्तर प्रदेश की आर्थिक अपराध शाखा को राज्य के 558 सहायता प्राप्त मदरसों के खिलाफ लगे आरोपों की जांच करने का निर्देश दे रहा है। लेकिन मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर हमले या लिंचिंग के मामलों में कोई स्वतः संज्ञान नहीं लेता, जहां अपराधियों के खिलाफ केस दर्ज नहीं होते या उचित जांच नहीं होती। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की खंडपीठ ने इस मुद्दे की जांच करते हुए आश्चर्य व्यक्त किया कि एनएचआरसी ऐसे मामलों में दखल दे रहा है जिन्हें हाईकोर्ट ही निपटा सकता है,
कोर्ट ने टिप्पणी की कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग उन मामलों में हस्तक्षेप कर रहे हैं जो प्रथम दृष्टया उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। कोर्ट ने कहा, “यह कोर्ट इस बात से अनभिज्ञ है कि एनएचआरसी ने कभी स्वतः संज्ञान लिया हो जब सतर्कता करने वाले अपने हाथ में कानून ले लेते हैं और देश के साधारण नागरिकों को परेशान करते हैं, या अलग-अलग समुदायों के लोगों के बीच संबंधों के कारण उन्हें परेशान करते हैं, या यहां तक कि सार्वजनिक स्थान पर अलग धर्म के व्यक्ति के साथ कॉफी पीना भी एक डरावना कार्य बन जाता है।”
दरअसल कोर्ट टीचर्स एसोसिएशन मदरिस अरेबिया द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में एनएचआरसी द्वारा फरवरी 2025 में दिए गए आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिसमें ईओडब्ल्यू को 558 मदरसों के खिलाफ आरोपों की जांच करने को कहा गया था।
एनएचआरसी में शिकायत में आरोप लगाया गया था कि मदरसे अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके बिना जरूरी मानकों को पूरा किए सरकारी अनुदान ले रहे हैं। साथ ही, अशिक्षित शिक्षकों की भर्ती रिश्वत और कमीशन देकर की जा रही है।याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आयोग को कथित घटना के 1 साल बाद मानवाधिकार उल्लंघन की जांच का आदेश देने का अधिकार नहीं है।
गौरतलब है कि पिछले साल सितंबर में हाईकोर्ट ने एनएचआरसी के इस आदेश पर स्टे लगा दिया था।हाईकोर्ट ने एनएचआरसी के आदेश को देखते हुए कहा कि वह प्रथम दृष्टया आयोग के कार्य से अलग है।खंडपीठ ने कहा कि एनएचआरसी और राज्य मानवाधिकार आयोगों को यह समझना चाहिए कि वे कोई ट्रिब्यूनल नहीं हैं जो मुकदमों की सुनवाई कर सकें।
कोर्ट ने कहा कि यदि जरूरी हो तो वे शिकायतकर्ता बनकर सक्षम अदालत के सामने जा सकते हैं या एफआईआर दर्ज करा सकते हैं, लेकिन जहां मानवाधिकार शामिल नहीं हैं, वहां कार्यकारी अधिकारियों को ऐसे निर्देश देने पर संदेह है।कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि देश के मानवाधिकार आयोग ऐसे मामलों में दखल दे रहे हैं जिन्हें अनुच्छेद 226 के तहत पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) के जरिए हाईकोर्ट के सामने उठाया जाना चाहिए था।









