नई दिल्ली। जम्मू और कश्मीर की सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस में आंतरिक असंतोष की लहर और तेज हो गई है। करीब 15 से 17 असंतुष्ट विधायकों ने शुक्रवार को श्रीनगर के गुपकर स्थित पार्टी अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला के आवास पर मुलाकात की। मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला(Omar Abdullah) भी इस बैठक में मौजूद रहे। यह मुलाकात हालिया कैबिनेट विस्तार के बाद पार्टी के भीतर पनपे विद्रोह को शांत करने और मांगों पर चर्चा करने के प्रयास में हुई।
अक्टूबर 27, 2026 को ओमर अब्दुल्ला ने कैबिनेट का विस्तार किया था, जिसमें मंत्रियों की संख्या छह से बढ़ाकर नौ कर दी गई। इसके तुरंत बाद कई वरिष्ठ और अन्य विधायकों ने नाराजगी जताई। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, 30 अक्टूबर को करीब 17 विधायकों ने जमशेद लोन के आवास पर चार घंटे की बैठक की और 15 दिन का अल्टीमेटम जारी किया। उन्होंने “किचन कैबिनेट” और ‘कोटरी कल्चर’ समाप्त करने, एकतरफा फैसलों पर रोक लगाने तथा चुनावी मैनिफेस्टो के वादों को अक्षरशः लागू करने की मांग रखी। कई विधायकों ने विस्तार के बाद फारूक अब्दुल्ला द्वारा आयोजित रात्रिभोज का बहिष्कार भी किया था।
मुख्य मांगों में पूरी कैबिनेट का पुनर्गठन, दो साल पूरे कर चुके मंत्रियों को हटाना (जिसमें उप मुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी भी शामिल हैं), मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी को हटाना, पार्टी मामलों में कथित हस्तक्षेप रोकना और विधायकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करना शामिल हैं।
द स्टेट्समैन और न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, विधायक क्षेत्रीय संतुलन, बेहतर आंतरिक परामर्श और अनुच्छेद 370 तथा राज्य का दर्जा बहाली जैसे चुनावी वादों की पूर्ति पर भी जोर दे रहे हैं। इंडिया टुडे के मुताबिक, 6 नवंबर की बैठक से पहले विधायकों ने चौथी बार बंद कमरे में रणनीति बनाई थी। ओमर अब्दुल्ला ने केवल एनसी विधायकों से बात करने की शर्त रखी और स्वतंत्र विधायक से मुलाकात से इनकार किया।
बैठक में शामिल प्रमुख नामों में मुबारक गुल, हसनैन मसूदी, नजीर अहमद गुरेजी, अब्दुल मजीद लारमी, कैसर जम्शेद लोन, फारूक शाह, मिर्चाल आदि शामिल रहे। फारूक अब्दुल्ला ने मीडिया से बात करते हुए पार्टी में दरार की खबरों को पूरी तरह खारिज किया।
टाइम्स ऑफ इंडिया और ग्रेटर कश्मीर के अनुसार, उन्होंने कहा कि ‘नेशनल कॉन्फ्रेंस कभी टूटी नहीं और टूटेगी भी नहीं। यह संगठन एकजुट है। हमने उनसे बात की। उनकी समस्याएं जायज थीं और उन पर उचित विचार किया जाएगा। कुछ कदम जल्दी और कुछ धीरे-धीरे उठाए जाएंगे।’ उन्होंने राज्य का दर्जा तथा अनुच्छेद 370 और 35ए की बहाली के लिए संघर्ष जारी रखने का भी भरोसा दिलाया।
इस संकट के बीच श्रीनगर सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह मेहदी का 3 नवंबर को पार्टी और लोकसभा से इस्तीफा देना एक बड़ा झटका साबित हुआ। द हिंदू और अन्य रिपोर्टों के अनुसार, रुहुल्लाह ने आरोप लगाया कि पार्टी ने चुनावी वादे पूरे नहीं किए, खासकर अनुच्छेद 370 की बहाली का। कुछ एनसी नेताओं ने इसे भाजपा की “ऑपरेशन लोटस” का नतीजा बताया, जबकि भाजपा ने इनकार किया।
राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि यह विद्रोह एनसी की आंतरिक लोकतंत्र की कमी और शासन के दो वर्षों के प्रदर्शन पर असंतोष को उजागर करता है। 90 सदस्यीय विधानसभा में एनसी के पास करीब 42 सीटें हैं और गठबंधन का बहुमत फिलहाल सुरक्षित है, लेकिन बड़े पैमाने पर इस्तीफों की स्थिति में राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। फारूक अब्दुल्ला के आश्वासन के बावजूद असंतुष्ट विधायक अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं। यह विकास जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है, जहां पार्टी के पुराने गार्ड और नेतृत्व के बीच तनाव स्पष्ट रूप से सामने आ रहा है।











