नई दिल्ली। गृह मंत्रालय के वामपंथी उग्रवाद प्रभाग नएक RTI आवेदन का जवाब देते हुए स्पष्ट किया है कि उसके पास ‘दिमागी नक्सल’(Intellectual Naxal) या बौद्धिक नक्सल के रूप में चिन्हित किसी व्यक्ति का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। आवेदनकर्ता अशोक उपाध्याय को भेजे गए जवाब में यह जानकारी ‘NIL’ (शून्य) बताई गई है।
28 अक्टूबर 2026 को जारी पत्र में केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (CPIO) राजकुमार पिक्की सिंह ने लिखा है कि मांगी गई जानकारी उनके अधिकार क्षेत्र में रखे गए रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं है। इसलिए, उनके स्तर पर इसे ‘NIL’ माना जाए। साथ ही, RTI अधिनियम, 2005 की धारा 6(3) के तहत आवेदन को विभाग के अन्य CPIO के पास भेज दिया गया है, ताकि यदि उनके पास संबंधित जानकारी उपलब्ध हो तो वह आवेदक को दी जा सके।
RTI आवेदन RTI MIS पोर्टल पर दायर किया गया था। इसमें गृह मंत्रालय से पूछा गया था कि कितने लोगों को ‘दिमागी नक्सल’ के रूप में चिन्हित किया गया है। ‘दिमागी नक्सल’ या ‘अर्बन नक्सल’ शब्द अक्सर उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो नक्सलवादी विचारधारा का खुला समर्थन करते हैं या बौद्धिक स्तर पर नक्सल आंदोलन से जुड़े माने जाते हैं।
गृह मंत्रालय के वामपंथी उग्रवाद प्रभाग का यह जवाब महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि नक्सलवाद से जुड़े मामलों में सरकार अक्सर शहरी और बौद्धिक स्तर पर सक्रिय तत्वों की बात करती रही है। कई मौकों पर सुरक्षा एजेंसियों और मंत्रालय ने ‘अर्बन नक्सल’ या ‘इंटेलेक्चुअल नक्सल’ की अवधारणा का जिक्र किया है। लेकिन RTI के जवाब में जब आधिकारिक संख्या मांगी गई तो संबंधित प्रभाग ने इसे शून्य बताया।
पत्र में अपील का प्रावधान भी बताया गया है। यदि आवेदक इस जवाब से संतुष्ट नहीं हैं तो वे 30 दिनों के भीतर जॉइंट सेक्रेटरी (LWE) राजीव कुमार के पास अपील दायर कर सकते हैं। पत्र की प्रतियां LWE-III के निदेशक, IT सेल के सेक्शन ऑफिसर और अन्य संबंधित अधिकारियों को भी भेजी गई हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ‘NIL’ का मतलब यह हो सकता है कि या तो गृह मंत्रालय के इस प्रभाग के पास ऐसा कोई अलग कैटेगरी या डेटाबेस नहीं है, या फिर ऐसी जानकारी किसी अन्य विभाग, राज्य सरकारों या सुरक्षा एजेंसियों के पास है। चूंकि आवेदन अन्य CPIO के पास फॉरवर्ड किया गया है, इसलिए अंतिम स्थिति बाद में स्पष्ट हो सकती है।
यह RTI जवाब ऐसे समय आया है जब देश में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान चल रहा है और सुरक्षा बलों ने कई इलाकों में नक्सलियों के खिलाफ सफलता हासिल की है। ऐसे में ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्द पर आधिकारिक स्तर पर शून्य का जवाब आने से बहस छिड़ने की संभावना है। कुछ लोग इसे पारदर्शिता का संकेत मान रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि यह जानकारी कहीं और मौजूद हो सकती है।
अशोक उपाध्याय द्वारा दायर इस RTI ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सरकार के पास ‘दिमागी नक्सल’ या वैचारिक नक्सलवाद से जुड़े लोगों का कोई आधिकारिक आंकड़ा है या नहीं। फिलहाल, गृह मंत्रालय के LWE प्रभाग का जवाब साफ है—उसके रिकॉर्ड में ऐसी कोई संख्या दर्ज नहीं है।









