सरकार से सलाह लेकर जजों की नियुक्ति करते थे चंद्रचूड़, बोले पूर्व जस्टिस कौल

नई दिल्ली। पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ (Chandrachud)ने उनसे विजय चौधरी बनाम भारत संघ से जुड़े फैसले जिसमें PMLA के प्रमुख प्रावधानों को बरकरार रखा गया थापर पुनर्विचार की मांग वाली याचिकाओं में “मध्य मार्ग” अपनाने को कहा था।एक और खुलासे में जस्टिस कौल ने कहा कि जब वे केंद्र सरकार पर लंबित कॉलेजियम सिफारिशों पर कार्रवाई करने का दबाव बना रहे थे, तो न्यायिक नियुक्तियों में देरी से जुड़ा मामला उनकी बेंच से वापस ले लिया गया। उन्होंने कहा कि तत्कालीन सीजेआई पर मामला उनकी बेंच से हटाने का कुछ दबाव था, हालांकि वे यह नहीं कह सकते कि सरकार ने दबाव डाला था या नहीं।द वायर के पत्रकार करण थापर को दिए इंटरव्यू में अपनी आने वाली किताब Without Fear or Favour के संदर्भ में जस्टिस कौल ने दोनों मामलों पर सीजेआई चंद्रचूड़ के साथ अपनी बातचीत का जिक्र किया।

‘कभी मध्य मार्ग नहीं अपनाया’PMLA मामले का जिक्र करते हुए जस्टिस कौल ने कहा कि जब उनकी अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच Vijay Madanlal Choudhary फैसले पर पुनर्विचार की याचिकाएं सुनने वाली थी, तब सीजेआई चंद्रचूड़ ने उन्हें अपने चैंबर में बुलाया। चर्चा में बेंच के सदस्य जस्टिस संजीव खन्ना भी मौजूद थे।जस्टिस कौल के अनुसार, सीजेआई ने उन्हें मामला आगे न बढ़ाने के लिए मनाने की कोशिश की और कहा कि अगर आगे बढ़ना ही है तो सावधानी बरतें और “मध्य मार्ग” अपनाएं।जस्टिस कौल ने कहा कि उन्होंने सुनवाई जारी रखने का फैसला किया क्योंकि पीछे हटना उनकी ईमानदारी पर सवाल खड़ा करता। उन्होंने कहा: “लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे, कि मैं इसके लिए पैसे ले रहा हूं? 22 साल की जजशिप के बाद अगर मैं इस तरह के मुद्दे पर झुक जाता हूं तो मैंने अपना काम नहीं किया। मेरी ईमानदारी मेरे लिए बहुत मायने रखती है, किसी के दबाव में नहीं।”उन्होंने सीजेआई से कहा: “अपने न्यायिक करियर में मैंने कभी किसी भी रूप में मध्य मार्ग नहीं अपनाया। अगर मुझे लगता है कि मामला सही है तो मैं आगे बढ़ा हूं।”चर्चा के बाद जस्टिस कौल और जस्टिस खन्ना कोर्ट रूम में सुनवाई के लिए चले गए।

जस्टिस कौल ने कहा कि केंद्र सरकार मामला उनकी सेवानिवृत्ति तक खींचना चाहती थी और बार-बार स्थगन मांगती रही। अंत में उनकी सेवानिवृत्ति से ठीक पहले बेंच भंग कर दी गई।इन याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के Vijay Madanlal Choudhary फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी, जिसमें PMLA के कई प्रावधान (ईडी की गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती की शक्तियां तथा जमानत की सख्त शर्तें) बरकरार रखे गए थे।PMLA मामला जस्टिस कौल की बेंच से हटाने की कोशिशजस्टिस कौल ने आगे कहा कि सुनवाई से पहले मामला उनकी बेंच से हटाने की कोशिश हुई थी। थापर के पूछने पर कि क्या मामला उनसे छीनने की “कोशिश” हुई, उन्होंने बताया कि एक सहयोगी जज ने बताया कि ये याचिकाएं दूसरी बेंच के पास चली गईं, जिससे वे परेशान हुए। उन्होंने सीजेआई से बात की। सीजेआई ने कहा कि किसी जज ने सभी मामलों को अपने पास समेकित करने का आदेश दिया था। जस्टिस कौल ने कहा कि बिना सीजेआई की सहमति के ऐसा नहीं हो सकता। उन्होंने कहा: “अगर आप नहीं चाहते कि मैं ये मामले सुनूं तो मुझे बता दें। मुझे हर तरह का मामला सुनने की कोई बड़ी इच्छा नहीं है, लेकिन एक जज से मामला नहीं छीना जाना चाहिए।”अंत में सीजेआई चंद्रचूड़ ने जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी के साथ तीन जजों की बेंच गठित की।जजों की नियुक्ति वाले मामले को हटाने परजस्टिस कौल ने यह भी कहा कि जब वे नियुक्तियों के लिए समयसीमा लागू कराने की कोशिश कर रहे थे, तब न्यायिक नियुक्ति वाला मामला उनकी बेंच से ले लिया गया।थापर ने पूछा कि क्या यह सच है कि पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने सरकार के खिलाफ प्रतिकूल आदेश आने की आशंका से मामला उनसे छीन लिया। जस्टिस कौल ने इसे “बहुत अजीब” बताया और कहा कि बेंच सरकार को न्यायिक नियुक्तियों में देरी न करने के लिए “थोड़ा धक्का” देने की कोशिश कर रही थी।जस्टिस कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की बेंच केंद्र सरकार के खिलाफ जजों की नियुक्ति में देरी पर अवमानना याचिकाएं सुन रही थी। बेंच ने सरकार की कॉलेजियम प्रस्तावों पर बैठे रहने और “चुन-चुनकर” रवैये की आलोचना की थी। लेकिन अचानक मामला बेंच की कॉजलिस्ट से हटा दिया गया।जस्टिस कौल ने कहा: “हम धीरे-धीरे उस मामले को आगे बढ़ा रहे थे। पता नहीं उस चरण पर मामला क्यों ले लिया गया। याचिकाकर्ता बहुत नाराज थे, उन्होंने मेंशन किया। मैंने सुप्रीम कोर्ट के संबंधित रजिस्ट्रार को कोर्ट में बुलाया। उन्होंने कहा लंच में बताएंगे।

लंच में उन्होंने बताया कि फाइल पर नोटिंग है कि शायद दो साल पहले जब मामला मुझे दिया गया था तब सीजेआई से औपचारिक अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए मामला वापस लेना उचित समझा गया।”जस्टिस कौल ने कहा कि उन्होंने सीजेआई से अपनी शिकायत बताई कि जिस तरह मामला उनसे छीना गया, वह नहीं होना चाहिए था।जब थापर ने संस्मरण में दिए अवलोकन का जिक्र किया कि “चीफ जस्टिस पर कुछ दबाव था”, तो जस्टिस कौल ने कहा: “उन्हें लगा होगा कि मुझे यह मामला नहीं संभालना चाहिए।”जब पूछा गया कि क्या सरकार ने सीजेआई को मामला जस्टिस कौल की बेंच से हटाने के लिए प्रेरित किया, तो उन्होंने कहा: “यह कहना मेरे लिए मुश्किल है।

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