रायपुर। छत्तीसगढ़ के निजी मेडिकल कॉलेजों में MBBS छात्रों से जबरदस्ती हॉस्टल और ट्रांसपोर्ट फीस वसूलने के मामले में प्रवेश तथा फीस विनियामक समिति (AFRC) ने राहत भरे निर्देश जारी किए हैं। समिति ने संबंधित कॉलेजों को कारण बताओ नोटिस भेजकर 7 दिनों के अंदर जवाब मांगा है। समिति ने साफ कहा है कि हॉस्टल, मेस और ट्रांसपोर्ट की सुविधा अनिवार्य नहीं है जो छात्र हॉस्टल में नहीं रहना चाहते, उन्हें डे-स्कॉलर के रूप में पढ़ने की अनुमति दी जाए। अंतिम निर्णय आने तक छात्रों पर कोई दबाव न डाला जाए।
क्या है ताजा आदेश?
22 अक्टूबर 2026 को AFRC ने रायपुर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) के डीन को पत्र लिखकर निर्देश दिए। पत्र में श्री निश्चय वाजपेयी की शिकायत का जिक्र है। उनके बेटे संकल्प वाजपेयी MBBS प्रथम वर्ष के छात्र हैं और हॉस्टल सुविधा नहीं लेना चाहते।

समिति ने स्पष्ट किया कि :
होस्टल सुविधा का उपयोग करना बाध्यकारी नहीं है।
छात्रों को डे-स्कॉलर बनने से नहीं रोका जा सकता।
होस्टल, मेस और ट्रांसपोर्ट वैकल्पिक हैं।
फीस ‘नो प्रॉफिट नो लॉस’ आधार पर सिर्फ उन्हीं से ली जाए जो सुविधा का उपयोग करते हैं।
पुराना विवाद और अतिरिक्त फीस का मामला
यह राहत उस बड़े विवाद के बीच आई है जिसमें निजी मेडिकल कॉलेज छात्रों से नियमों के खिलाफ अतिरिक्त फीस वसूल रहे थे। AFRC ने अप्रैल 2025 में और शासन ने सितंबर 2025 में आदेश जारी कर सत्र 2022-23 से अधिक वसूली गई फीस वापस करने को कहा था।
तीन प्रमुख कॉलेजों से प्रति छात्र वापस की जाने वाली राशि थी :
श्री शंकराचार्य इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस, भिलाई: ₹4,43,173
रायपुर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस: ₹4,53,593
श्री बालाजी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस: ₹4,58,222
आदेश का पालन न करने पर 7फीसदी % ब्याज और 10-10 लाख रुपये जुर्माना लगाने का प्रावधान था लेकिन कॉलेजों ने न तो पुरानी राशि लौटाई और न वर्तमान सत्र में मनमानी बंद की। इसके खिलाफ निश्चय वाजपेयी ने पुलिस कमिश्नर को शिकायत दी थी। शिकायत में धोखाधड़ी, आपराधिक न्यासभंग और शासन के आदेश की अवहेलना जैसे आरोप लगाए गए थे।
पहले भी उठ चुके हैं गंभीर सवाल
इससे पहले भी पीजी मेडिकल सीटों पर भारी फीस को लेकर विवाद हुआ था। तीन निजी कॉलेजों में कुल 274 पीजी सीटें हैं। ट्यूशन फीस के अलावा हॉस्टल के नाम पर 4.5 से 5.5 लाख रुपये सालाना, एडवांस प्रोफेशनल ट्रेनिंग के नाम पर 3 से 6 लाख रुपये और एक लाख रुपये का डिपॉजिट वसूला जा रहा था। कुल मिलाकर एक छात्र पर 70 लाख रुपये से अधिक का बोझ पड़ रहा था। डॉक्टर संगठनों और छात्रों का आरोप था कि फीस विनियामक समिति के नियमों का खुला उल्लंघन हो रहा है और मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए मेडिकल शिक्षा लगभग असंभव होती जा रही है।
अब आगे क्या?
AFRC के ताजा निर्देश से छात्रों को फिलहाल राहत मिली है। कॉलेजों को 7 दिनों में जवाब देना है। अगर आदेश का पालन नहीं हुआ तो आगे और सख्त कार्रवाई हो सकती है। अभिभावक और छात्र अब यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि समिति और शासन इस बार ठोस कदम उठाएंगे, ताकि मेडिकल शिक्षा सिर्फ पैसे वालों के लिए न रह जाए।









