पुलिसिया दमन के सामने ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ से दमकती दिल्ली!

दिल्ली की सड़कों पर बीती जुलाई से जो छात्रों-युवाओं का जो ज्वार उमड़ रहा है, वह महात्मा गाँधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन की याद दिला रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजधानी अक्टूबर में भी छावनी बनी हुई है लेकिन छात्रों, युवाओं और राजनीतिक-सामाजिक कार्यकर्ता इस क़िलेबंदी के सामने अहिंसा की लाठी थामे निर्भय खड़े हुए हैं।12 अक्टूबर को राहुल गाँधी के आह्वान पर इंडिया गठबंधन के दलों की ओर से निकाले गये ‘सेव डेमोक्रेसी’ मार्च में बड़ी तादाद में आम नागरिक भी शामिल हुए जो इसके विस्तार की मुनादी थी। प्रतिरोध के इस दौर में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी वही भूमिका निभाते नज़र आ रहे हैं जो कभी आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गाँधी की थी।

महात्मा गाँधी ने 1930 में ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ शुरू किया था। यह विश्व इतिहास में बिल्कुल नवीन परिघटना थी। ‘नमक कानून’ तोड़ने के आह्वान के साथ साबरमती आश्रम से शुरू हुई ‘दांडी यात्रा’ ने पूरे देश में उबाल ला दिया था। अंग्रेज़ों की लाठियाँ कम पड़ गयीं लेकिन उनके सामने घायल होकर भी ‘भारत माता की जय’ बोलने वालों की कमी नहीं पड़ी। लोग जेल गए, लाठी खाई, लेकिन पीछे नहीं हटे। गाँव-गाँव में लोग नमक बना रहे थे, विदेशी कपड़े जला रहे थे और टैक्स नहीं दे रहे थे। गाँधीजी का यह प्रयोग दुनिया के लिए मिसाल बना। उन्होंने साबित कर दिया कि साधारण लोग भी डर छोड़कर अन्याय के खिलाफ खड़े हो सकते हैं।

गाँधीजी ने कांग्रेस को प्रार्थना-पत्र लिखने वाली संस्था से सड़क पर लड़ने वाली ताक़त में बदल दिया था। उन्होंने आम आदमी को डरना छोड़ना सिखा दिया था। तब जेल जाना शर्म नहीं, सम्मान की बात हो गयी थी। आज राहुल गाँधी भी वही कोशिश कर रहे हैं। लंबे समय से जड़ता की शिकार कांग्रेस को उन्होंने सड़क पर उतरने का हुनर और हौसला दिया है। 12 अक्टूबर के मार्च में चौथाई से ज़्यादा लोग ऐसे थे जिनका किसी दल से सीधा संबंध नहीं था। वे लोकतंत्र को बचाने के लिए सड़क पर आये थे।

राहुल में उन्हें भविष्य की उम्मीद दिख रही थी जो पार्टियों के दायरों को पार करके भारत के राजनीतिक इतिहास में सादगी, दृढ़ता और अहिंसक प्रतिरोध का नया रंग भर रहा है। उन्होंने कॉक्रोच जनता पार्टी के नेताओं की गिरफ़्तारी का विरोध करके और आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा को साथ खड़ा करके संदेश दिया है कि लोकतंत्र बचाने की लड़ाई महज़ कांग्रेस की लड़ाई नहीं है।



गाँधी जी भी एक समय बाद सिर्फ़ कांग्रेस के नेता नहीं रह गये थे। वे सारे देश की उम्मीद बन गये थे। महात्मा गाँधी की अहिंसा की नीति से पूरी तरह सहमत न रहने वाले सुभाषचंद्र बोस ने ही उन्हें राष्ट्रपिता की उपाधि दी थी। राहुल भी आज उसी हैसियत में नज़र आ रहे हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन ने भारत को लोकतांत्रिक देश बनाया। नेहरू ने संस्थाएँ खड़ी कीं ताकि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अलग-अलग काम करें। स्वतंत्र मीडिया ‘वाचडॉग’ की भूमिका निभाए। आज ये सारी संस्थाएँ दबाव में हैं। संविधान की भावना को कमज़ोर करने की कोशिशें हो रही हैं। चुनाव आयोग पर इन गंभीर आरोपों की गूँज वैश्विक स्तर पर है कि नियमों की अनदेखी करके करोड़ों लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। लेकिन सरकार दमन के दायरे को बढ़ाती जा रही है।

दशकों से जिस जंतर-मंतर पर पूरे देश के लोग अपनी समस्याओं पर आंदोलन करने आते थे उसे इस सरकार ने ‘छू-मंतर ‘कर दिया है। उसकी नज़र में आंदोलनकारी नौजवान महज़ अराजक हैं। अंग्रेज़ भी ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल करते थे।



महात्मा गाँधी ने अंग्रेज़ों से आज़ादी दिलायी थी तो आज चुनौती उनसे लड़ने की है जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेज़ों का साथ दिया था। हद तो यह है कि हिटलर और मुसोलिनी से प्रभावित आरएसएस की शाखाओं से निकले आज के सत्ताधीश उनके ‘ब्राउन शर्ट’ और ‘ब्लैक शर्ट’ मिलिशिया वाला प्रयोग दोहरा रहे हैं। दिल्ली में जिस तरह पुलिस के साथ मिलकर ‘हिंदू रक्षा दल’ जैसे संगठनों ने आम आंदोलनकारियों पर हमले किये और पुलिस के सामने लड़कियों के कपड़े भी फाड़े, वह सत्ताधारियों के फ़ासीवादी चरित्र का पर्दाफ़ाश करता है।

राहुल गाँधी ने इस चुनौती को स्वीकार किया है। यह संयोग नहीं कि वे बीजेपी से ज़्यादा आरएसएस पर निशाना साधते हैं। वे जानते हैं कि लोकतंत्र को पाने के साथ-साथ उसकी रक्षा के लिए भी लगातार संघर्ष करने की ज़रूरत है। अमेरिका का उदाहरण सामने है जहाँ ‘लिबर्टी’ के उद्घोष के साथ 1776 में क्रांति हुई लेकिन 1860 में इसी लिबर्टी को बचाने के लिए देश ने गृहयुद्ध झेला। मोदी सरकार ने वोट चोरी को एक ‘व्यवस्था’ में बदलकर भारत की जनता पर गृहयुद्ध थोपने जैसी कोशिश ही की है।

यह लड़ाई आसान नहीं है। सत्ता आक्रामक है। जनता के संघर्ष को बदनाम करने के लिए तमाम षड्यंत्र रचे जा रहे हैं। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जब आम लोग डर छोड़ देते हैं तो मज़बूत से मज़बूत दीवार भी उन्हें रोक नहीं पाती। हद तो ये है कि सरकार को आज़ादी के आंदोलन और संविधान के संकल्पों के सबसे तेजस्वी प्रतीक तिरंगा लहराना भी बर्दाश्त नहीं हो रहा है जो शर्मनाक है। 16 अक्टूबर को दिल्ली में तिरंगा मार्च निकालने के पहले ही सीजेपी के अभिजीत दीपके और आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा सरकार की संवेदनहीनता का एक और सबूत है।

बीते दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन ने उत्तर प्रदेश के बारे में टिप्पणी की थी कि यहाँ ‘आर्वेलियन डिस्टोपिया’ जैसी स्थिति बन रही है। वे मशहूर लेखक जार्ज आर्वेल के उपन्यास ‘1984’ की ओर इशारा कर रहे थे जिसमें एक ऐसे राज्य की कल्पना की गयी है जहाँ नागरिकों को कोई अधिकार नहीं है। सभी नागरिकों पर कड़ी निगरानी है। विरोध की कोई गुंजाइशन नहीं है। आज़ादी छीन ली गयी है। अब यह टिप्पणी दिल्ली पर भी फ़िट बैठ रही है।

ऐसे स्थिति में किसी भी देश में प्रतिवाद और प्रतिरोध की लहर उमड़ना स्वाभाविक है। इतिहास बताता है कि ऐसी स्थिति में हिंसक प्रतिरोध की पूरी गुंजाइश होती है। लेकिन भारत के पास अहिंसक प्रतिरोध का शानदार इतिहास है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी उसी इतिहास से प्रेरणा ले रहे हैं। उनका ‘डरो मत’ का नारा लोगों को सविनय अवज्ञा आंदोलन की भावना से जोड़ रहा है। अफ़सोस कि मोदी सरकार इतिहास से सबक़ नहीं ले रही है जैसे तानाशाह अक्सर नहीं लेते और इतिहास के कूड़ेदान में जगह पाते हैं।

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