यह कांग्रेस का आजादी के बाद का सबसे बड़ा पैदल मार्च था

नई दिल्ली। 23 दिसंबर 1978 को चौधरी चरण सिंह के आवाहन पर दिल्ली के बोट क्लब पर एक विशाल किसान रैली हुई। इसमें लाखों किसान पहुंचे थे। यह रैली मोरारजी देसाई सरकार में मंत्रिमंडल से हटाए जाने के बाद उनकी राजनीतिक ताकत दिखाने और किसान मुद्दों को उठाने के लिए आयोजित हुई थी। अंततः मोरारजी देसाई को जाना पड़ा था। 2014 में मनमोहन सिंह की सरकार जाने के पीछे अन्ना हजारे के रामलीला मैदान के प्रदर्शन को बड़ी वजह बताया जाता है लेकिन कांग्रेस पार्टी ने सोमवार को जो दिल्ली में किया वो सबसे बड़ा भले ना हो लेकिन आजादी (independence)के बाद कांग्रेस के बड़े प्रदर्शन में से एक जरूर था जिसकी चर्चा लंबे समय तक होगी।

जो बात इस आंदोलन को अन्य आंदोलनों से अलग करती है वो दो बातें हैं। पहली बात सोमवार का सुप्रीम कोर्ट मार्च अकेले राहुल गांधी के आवाहन पर किया गया दूसरा इसमें ना केवल इंडिया गठबंधन से जुड़े राजनीतिक दलों बल्कि वैचारिक तौर पर आंदोलन का समर्थन करने वाले भी भारी संख्या में शामिल हुए। यह बताना जरूरी है कि सोमवार को बारखंभा रॉड से सुप्रीम कोर्ट तक के जुलूस में लगभग 50 से 60 हज़ार जनता शामिल हुई लेकिन इस भीड़ में लगभाग 80 फ़ीसदी हिस्सा छात्रों, युवाओं और महिलाओं का था। मेट्रो स्टेशन और तमाम सुविधाएँ बंद होने के बावजूद यह भीड़ अप्रत्याशित थी।

दोपहर एक बजे का वक्त था जब राहुल गांधी इंदिरा भवन में प्रेस कांफ्रेस कर रहे थे उधर बारखंभा रोड पर हजारों की भीड़ इकट्ठा हो चुकी थी। दिलचस्प यह था कि जो पुलिस रविवार तक बेहद सक्रिय थी वो या तो वहाँ दिखने वाली बसों में क़ैद थी जिस पर बाद में युवा छात्र कब्जा कर लिए या फिर वो बिना लाठियों के दूर खड़ी थी।मार्च के पहले या बाद में किसी प्रकार से कानून व्यवस्था को लेकर किसी प्रकट की कोई टकराहट नहीं हुई।जो बात प्रदर्शनकारियों को चौंका रही थी वो कॉक्रोच जनता पार्टी के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रंका की ग़ैर मौजूदगी। एसएफआई के कुछ कार्यकर्ताओं ने बातचीत में कहा कि हम अपेक्षा कर रहे थे कि नेहा बोरा की तरह सीजेपी के कार्यकर्ता भी इस आंदोलन में शामिल होंगे लेकिन वह नज़र नहीं आए। हांलाकि कुछ घंटों बाद मंगलवार सुबह दोनों ही जंतर मंतर पर हिरासत में ले लिए गए। कांग्रेस पार्टी के अजीत तिवारी का कहना था कि जब आप किसी मूवमेंट में शामिल हैं तो उसके विस्तार की कैसे अनदेखी कर सकते हैं?

सुप्रीम कोर्ट तक निकले जुलूस में इंडिया गठबंधन के सभी लोग शामिल थे हांलाकि आम आदमी पार्टी, AIMIM के लोग और उनके समर्थक शामिल नहीं हुए जबकि अरविंद केजरीवाल ने रविवार को आवाहन किया था कि हमारा विरोध ज्ञानेश कुमार के ना हटने तक जारी रहेगा। यह भी दिलचस्प था कि कांग्रस या विपक्ष शासित प्रदेशों की तुलना में बीजेपी शासित प्रदेशों के समर्थकों की संख्या बेहद ज़्यादा थी।सुदूर राजस्थान के बीकानेर से लेकर छत्तीसगढ़ के मुंगेली से आए कांग्रेस के कार्यकर्ता इस जुलूस में शामिल हुए। कांग्रेस के तमाम शीर्ष नेता जिनमें राहुल गांधी, डीके शिवकुमार, टीएस सिंहदेव सड़क पर पैदल चले वहीं बाक़ी सांसदों ने बस में बैठकर पूरा रास्ता तय किया।

जुलूस में शामिल जनता के उत्साह का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरी यात्रा के दौरान कई बार भगदड़ की सी स्थिति बनी जिनमे लोगों को चोट आई।राहुल गांधी के सुरक्षाकर्मियों को इस दौरान काफ़ी मशक्कत का सामना करना पड़ा। ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े को लेकर युवा छात्रों की अगुवाई कर रही नेहा बोरा और योगेंद्र यादव की जुलूस में मौजूदगी से एक संदेश साफ़ गया कि नेहा बोरा वामपंथ की लाइन पर ही पूरी लड़ाई लड़ रही है वो किसी भी कीमत पर सीजेपी या आम आदमी पार्टी की लाइन पर रणनीति तय नहीं करेंगी। पैदल मार्च के दौरान राहुल गांधी कई जगह नेहा बोरा के कंधों पर हाथ रखे नजर आए। प्रियंका गांधी भी उनसे रास्ते भर बातें करती दिखी।

सीजेआई द्वारा मिलने से इनकार करने के बाद पैदल मार्च का कार्यक्रम बदलेगा कि नहीं इसको लेकर लंबे समय तक ऊहापोह की स्थिति रही लेकिन राहुल गांधी समेत विपक्ष के सांसदों ने ज्ञानेश कुमार और SIR के ख़िलाफ़ पेटीशन दाखिल करने का फैसला कर लिया था। यह बात बहुतों के द्वारा कहीं जा रही थी कि राहुल गांधी सुप्रीम कोर्ट से निकलकर धरने का फैसला कर सकते हैं लेकिन राहुल गांधी दस सांसदों के साथ याचिका दाखिल करने भीतर गए। जब वो पहुँचे उस वक्त शाम के 5.30 बज चुके थे। जब तक राहुल बाहर नहीं निकले समर्थक प्रतीक्षा करते रहे। राहुल गांधी ने ऐलान किया है कि यह आंदोलन ज्ञानेश कुमार के हटने तक जारी रहेगा कार्यकर्ताओं ने भी दिल्ली में जमे रहने की ठान ली है।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now