ज्ञानेश कुमार, संधू और जोशी की बैठक, चुनाव आयोग ने दिया आरोपों पर स्पष्टीकरण

नई दिल्ली | चुनाव आयोग(Election Commission) ने शनिवार को अपने अंदर असंतोष की रिपोर्ट्स को खारिज करने की कोशिश की। उसने सभी सदस्यों की बैठक बुलाई और अपने कामकाज पर लगे आरोपों का बिंदुवार स्पष्टीकरण जारी किया। आयोग ने दोहराया कि प्रमुख फैसले, जिनमें मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) शामिल है, पूर्ण आयोग द्वारा सर्वसम्मति से लिए गए थे।चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि बिहार और बंगाल में जिनके नाम मतदाता सूची में रह गए हैं BLO उनके घर जाकर उनके नाम लेंगे।मतदाता नए सिरे से आवेदन कर सकते हैं|

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी शनिवार दोपहर निर्वाचन सदन, नई दिल्ली में मिले। प्रेस विज्ञप्ति में यह कहा गया। साथ में तीनों की एक तस्वीर भी जारी की गई। यह उन रिपोर्ट्स के बीच हुआ जिनमें कहा गया था कि संधू और जोशी ने SIR से जुड़े कई फैसलों और आदेशों पर कई मौकों पर आपत्ति जताई थी।

चुनाव आयोग की विज्ञप्ति में SIR और आयोग के आंतरिक कामकाज पर कुछ फैसले भी घोषित किए गए। साथ ही कैबिनेट सचिव को लिखे गए उस पत्र पर भी अपना रुख साफ किया गया, जिसके बारे में 23 सितंबर के द इंडियन एक्सप्रेस में कहा गया था कि वह संधू और जोशी द्वारा लिखा गया था।विवाद उन आपत्तियों से जुड़ा है जो जोशी और संधू ने कई मुद्दों पर उठाई थीं। इनमें नए मतदाता नामांकन के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में बदलाव, ऑनलाइन सिस्टम ECINET का कामकाज, आईटी डिवीजन में काम का पुनर्वितरण, पश्चिम बंगाल SIR में अपीलें और गोवा के मतदाताओं से जुड़े मामलों का निपटारा शामिल हैं।

फॉर्म 6 के मामले में SIR प्रक्रिया के दौरान फॉर्म के साथ जुड़े एक घोषणा पत्र पर सवाल उठाए गए थे, जिसमें संभावित मतदाताओं से कहा गया था कि वे अपने माता-पिता के नाम के जरिए पिछले SIR से जोड़ें। आयोग के नोट में कहा गया कि इस घोषणा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। SIR अवधि के अलावा 1960 के मतदाता पंजीकरण नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म ही इस्तेमाल होंगे।

ECINET पर मतदाता सूची डेटाबेस तक पहुंच और पोर्टल के कामकाज को लेकर चिंताएं उठाई गई थीं। आयोग ने कहा कि फील्ड अधिकारियों को उनके वैधानिक अधिकारों के अनुसार भूमिका आधारित पहुंच दी गई है। साथ ही एक वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा ECINET की समीक्षा का भी ऐलान किया गया, जिसमें आईआईटी या आईआईआईटी के स्वतंत्र विशेषज्ञ भी शामिल होंगे। फील्ड अधिकारियों को जरूरत पड़ने पर और लचीलापन भी दिया जाएगा। नए आईटी मॉड्यूल और पोर्टल से जुड़े सभी नए प्रस्तावों पर पहले अधिकारियों की समिति चर्चा करेगी, उसके बाद ही आयोग के सामने मंजूरी के लिए रखे जाएंगे।

एक और मुद्दा कैबिनेट सचिव को लिखे उस पत्र का था, जिसमें “चुनाव आयोग में प्रतिनियुक्ति पर आए एक अधिकारी” से जुड़े काम के पुनर्वितरण की बात थी। आयोग ने कहा कि यह पत्र आयोग की किसी नीति या आईटी डिवीजन से संबंधित नहीं था, बल्कि उस अधिकारी के कामकाज से जुड़ा था। जिन काम पुनर्वितरण आदेशों पर आपत्ति जताई गई थी, वे दो आयुक्तों के निर्देश के बाद लागू नहीं किए गए। आईटी डिवीजन की निगरानी एक उप चुनाव आयुक्त के पास पहले से बनी रही, उसे कभी वापस नहीं लिया गया।
SIR पर आयोग ने कहा कि 24 जून 2025 का वह आदेश, जिसके तहत पूरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह अभियान शुरू किया गया, आयोग की सर्वसम्मति से जारी किया गया था। बाद के शेड्यूल भी सर्वसम्मति से जारी हुए। सुप्रीम कोर्ट ने मूल SIR आदेश को बरकरार रखा है।

आयोग ने गोवा के 97 मतदाताओं का मामला भी स्पष्ट किया, जो मतदाता सूची से छूट गए थे। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बूथ लेवल अधिकारियों को घर-घर जाकर उनके फॉर्म लेने का निर्देश दिया था। 97 में से 81 मतदाता पहले ही शामिल होने के लिए फॉर्म 6 भर चुके हैं।आयोग ने अपने आंतरिक कामकाज को मजबूत करने के उपाय भी घोषित किए। अब सभी बैठकों का एजेंडा पहले से भेजा जाएगा और मिनट्स जारी किए जाएंगे। आयुक्तों द्वारा अधिकारियों को दिए गए निर्देशों का पूरी सावधानी से पालन किया जाएगा।

दिल्ली में SIR प्रक्रिया के तहत दावे और आपत्तियां दाखिल करने की समय सीमा 30 अक्टूबर तक बढ़ा दी गई है। निपटान का लक्ष्य 30 नवंबर तक है। महाराष्ट्र में ये समय सीमाएं क्रमशः 12 अक्टूबर और 10 नवंबर तक बढ़ाई गई हैं।
विवाद अब सिर्फ आंतरिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा। विपक्षी दलों ने जोशी और संधू की कथित आपत्तियों का हवाला देते हुए आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं और ज्ञानेश कुमार के हटाए जाने की मांग की है। यह विवाद SIR पर चल रहे बड़े राजनीतिक संघर्ष से भी जुड़ गया है, जिसमें विपक्ष चुनाव आयोग से अधिक पारदर्शिता की मांग कर रहा है।

आयोग के ताजा बयान का मकसद आंतरिक विचार-विमर्श और औपचारिक फैसलों के बीच फर्क साफ करना है। वह कहता है कि SIR सहित उसके बड़े फैसले सामूहिक और सर्वसम्मति से लिए गए थे।

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