ओबीसी क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला – लागू करने में क्यों आ रही हैं दिक्कतें ?

लेंस न्यूज। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को एक आदेश में कहा था कि OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने के लिए सिर्फ माता-पिता की सैलरी काफी नहीं है। इसके साथ उनके सामाजिक स्तर और पद की श्रेणी को भी देखना होगा। फैसले के पांच महीने बाद केंद्र सरकार फिर कोर्ट पहुंच गई है। सरकार कह रही है कि अगर यह फैसला पुराने मामलों पर भी लागू किया गया तो कई विवाद खड़े हो सकते हैं।

क्रीमी लेयर क्या होता है ?

क्रीमी लेयर का मतलब है पिछड़े वर्ग के वे लोग जो आर्थिक और सामाजिक रूप से काफी आगे बढ़ चुके हैं। 2004 में सरकार ने पीएसयू और प्राइवेट नौकरी करने वालों की सैलरी को भी क्रीमी लेयर तय करने का आधार बनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस नियम को रद्द कर दिया।

कोर्ट ने क्या कहा था?

कोर्ट ने साफ कहा कि पीएसयू या प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले माता-पिता की सैलरी अकेले यह तय नहीं कर सकती कि उनके बच्चे क्रीमी लेयर में आते हैं या नहीं। यह फैसला उन सिविल सेवा के उम्मीदवारों के मामले में आया था जिनके माता-पिता प्राइवेट या पीएसयू में काम करते थे।

पुराने नियम में सरकारी कर्मचारी और प्राइवेट/पीएसयू कर्मचारी के साथ अलग व्यवहार होता था। समान स्थिति वाले परिवारों के साथ अलग रवैया अपनाया जाता था। कोर्ट ने इसे गलत माना।

सरकार की मुश्किलें

आजकल बहुत से लोग प्राइवेट सेक्टर में काम करते हैं। वहां पदों और सैलरी का कोई एक जैसा सिस्टम नहीं है। सरकार कहती है कि अलग-अलग क्षेत्रों के पदों की बराबरी तय करने में समय लगेगा। इसमें करीब दो साल लग सकते हैं।

अमीर उम्मीदवारों को फायदा मिलने का डर

सरकार को चिंता है कि अगर सिर्फ सैलरी नहीं देखी गई तो प्राइवेट सेक्टर में बहुत ज्यादा कमाई करने वाले माता-पिता के बच्चे भी आरक्षण का लाभ ले सकते हैं। इससे असली जरूरतमंदों को नुकसान हो सकता है।

यह फैसला 2025 की सिविल सेवा परीक्षा के नतीजे आने के बाद आया। 958 उम्मीदवारों का चयन हो चुका है। सरकार कह रही है कि फैसला पुराने नियमों पर भरोसा करके परीक्षा देने वाले उम्मीदवारों पर लागू नहीं होना चाहिए।

क्यों जल्द फैसला चाहिए?

चयनित उम्मीदवार जल्द मसूरी अकादमी में ट्रेनिंग के लिए जाएंगे। सेवा आवंटन में देरी से उनकी ट्रेनिंग, कैडर और सीनियरिटी प्रभावित हो सकती है। कोर्ट 1 सितंबर को इस मामले में सुनवाई करेगा। सरकार जानना चाहती है कि क्या वह पुराने नियमों के आधार पर सेवा आवंटन कर सकती है या नई जांच करनी होगी।

पूनम ऋतु सेन

पूनम ऋतु सेन युवा पत्रकार हैं, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद लिखने,पढ़ने और समाज के अनछुए पहलुओं के बारे में जानने की उत्सुकता पत्रकारिता की ओर खींच लाई। विगत 6 वर्षों से वीमेन, एजुकेशन, पॉलिटिकल, हेल्थ, लाइफस्टाइल से जुड़े मुद्दों पर लगातार खबर कर रहीं हैं और सेन्ट्रल इण्डिया के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अलग-अलग पदों पर काम किया है। द लेंस में बतौर जर्नलिस्ट कुछ नया सीखने के उद्देश्य से फरवरी 2025 से सच की तलाश का सफर शुरू किया है।

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