डॉ. आंबेडकर की प्रतिज्ञा और राष्ट्रीय एकता पर वार है ‘पूरा वंदे मातरम्’ क़ानून!

राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के दो नहीं, सभी ‘छह छंद’ सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से गाने का क़ानून बनने के बाद बीजेपी ने इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ने का ऐलान कर दिया है। यह वंदे मातरम् के ज़रिए विपक्ष को ‘हिंदू विरोधी’ साबित करने की मुहिम है। लेकिन शिक्षा और रोज़गार के मुद्दे पर बुरी तरह घिरी बीजेपी क्या यह जानती है कि मुद्दों से ध्यान हटाने की उसकी यह रणनीति कितनी ‘राष्ट्रघाती’ है?

वंदे मातरम् के महज़ दो बंद गाने का फ़ैसला मुस्लिम तुष्टीकरण के कारण नहीं था जैसा कि बीजेपी का आरोप है, बल्कि यह राष्ट्रीय प्रतीकों के चुनाव में बरती गयी वह सावधानी थी जो राष्ट्रीय एकता के लिए अनिवार्य थी और है।

इस बात को समझने के लिए इतिहास के पन्ने पलटने पड़ेंगे।

यूनाइटेड किंगडम के हाउस ऑफ कॉमन्स में मार्च 1947 में भारत की आज़ादी को लेकर बहस चल रही थी। विपक्ष के नेता की हैसियत से पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल भारत को आज़ाद करने के विचार पर कड़ा विरोध जता रहे थे। महात्मा गाँधी का लगातार तिरस्कार करने वाले और उन्हें ‘ढोंगी’ तथा ‘नंगा फ़कीर’ बताकर मज़ाक उड़ाने वाले चर्चिल ने उस दिन अपनी कुख्यात टिप्पणी में कहा था— “इन तथाकथित राजनीतिक वर्गों के हाथ में भारत की सरकार सौंपकर हम घास-फूस के आदमियों के हाथ में सत्ता दे रहे हैं, जिनका कुछ वर्षों में कोई निशान नहीं बचेगा।”

यह केवल चर्चिल की आशंका ही नहीं थी कि भारत एकजुट नहीं रह पायेगा। कई लोगों का मानना था कि अंग्रेज़ों ने अपनी सैन्य-शक्ति के दम पर भारत को एक राजनीतिक नक्शा दिया है। यह शक्ति नहीं रही तो तमाम धर्मों, संप्रदायों, जातियों और क़रीब साढ़े पाँच सौ रियासतों में बँटे भारत का नक्शा बिगड़ जायेगा। कोई वजह नहीं रहेगी कि केरल और दिल्ली के लोग ख़ुद को ‘एक राष्ट्र’ मानें। यूरोप में बने ‘राष्ट्र राज्यों’ के उदाहरण थे जो आमतौर पर एक धर्म, एक भाषा या नस्ल पर आधारित थे जबकि भारत तो विविधताओं का जंगल था।

लेकिन आधुनिक भारत के निर्माताओं ने इस असंभव सी लगने वाली कल्पना को ज़मीन पर उतार दिया। 1915 में दक्षिण अफ़्रीका से महात्मा गाँधी के आगमन के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने जो करवट बदली, वह इतिहास का अभूतपूर्व मोड़ साबित हुई। गाँधीजी के चमत्कारी नेतृत्व में कांग्रेस के साथ समाज का वह मेहनतकश तबका भी जुड़ गया जो पहले ‘कोऊनृप हो यह में का हानी’ के भाव से भरा था। किसान, मज़दूर, मध्यवर्ग, नौजवान, महिलाएँ—सभी एक साझा सपने में बँध गये। यह सपना था एक ऐसे भारत राष्ट्र के निर्माण का जहाँ जनता को प्रजा नहीं, नागरिक होना था। समता, समानता और स्वतंत्रता से भरे इस सपने में महज़ अंग्रेज़ों से आज़ादी लेना नहीं, एक नया भारत भी बनाना था।

राष्ट्रीय आंदोलन दरअसल इसी सपने को लेकर हुए विराट मंथन का नाम था जिसने एक सर्वथा ‘नवीन राष्ट्र’ को जन्म दिया। अहिंसा और सत्याग्रह को अस्त्र बनाकर चले इस अनोखे आंदोलन ने देश में ऐसी ऊर्जा पैदा की जिसके सामने अंग्रेज़ों के जाने के बाद ख़ुद मुख़्तार हो जाने का रियासतों का सपना धरा रह गया और एक ऐसा संविधान बना जिस पर विश्वास जताते हुए केरल से लेकर कन्याकुमारी ‘एक राष्ट्र’ हो गये। इस मान्यता के पीछे कोई सैन्य शक्ति नहीं, संविधान के रूप में मिली एक नैतिक शक्ति थी। जनता को संविधान किसी ने दिया नहीं, ‘हम भारत के लोग’ की घोषणा करते हुए उसने इसे ‘आत्मार्पित’ किया।

संविधान ने गारंटी दी थी कि लोकतंत्र चाहे बहुमत के शासन का नाम हो, लेकिन यह ‘बहुसंख्यकवाद’ बिल्कुल नहीं होगा। किसी एक की मान्यता किसी दूसरे पर थोपी नहीं जायेगी। सभी नागरिक बराबर होंगे और उन्हें अपने-अपने धर्म के अनुसार जीने की आज़ादी होगी। वंदे मातरम् के छह गीतों की अनिवार्यता इसी संवैधानिक संकल्प को उलटने की कोशिश है। क्योंकि इसके बाक़ी चार छंद दरअसल देवियों की आराधना हैं। जिसकी भी मान्यता हिंदू धर्म या देवी-देवताओं या मूर्तिपूजा में नहीं है, उन पर इसकी अनिवार्यता थोपना संविधान के ‘बेसिक स्ट्रक्चर’ पर हमला है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी संरक्षित किया हुआ है।

मुस्लिमों और ईसाइयों पर हिंदू मान्यताओं को थोपने का ‘परपीड़क सुख’ लेने और ध्रुवीकरण का खेल खेलने के फेर में बीजेपी यह भूल गयी कि वह किस-किस को अपमानित कर रही है। सिख भी निराकार ईश्वर की आराधना करते हैं और उनकी ओर से भी वंदे मातरम् पर नये क़ानून का विरोध शुरू हो गया है। जैन और बौद्ध जैसे निरीश्वरवादी दर्शन को मानने वाले हों या मूर्तिपूजा का विरोध करने वाले आर्य समाजी, सभी के लिए देवी आराधना संभव नहीं है। नास्तिक भगत सिंह और दक्षिण में पेरियार के अनुयायी भी इसे स्वीकार नहीं कर सकते।

इस मामले में डॉ. आंबेडकर के अनुयायियों की तो चर्चा ही नहीं होती। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि में लगभग पाँच लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले डॉ. आंबेडकर ने 22 प्रतिज्ञाएँ भी दिलवाई थीं। इनमें दूसरी थी कि ‘मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा।’ डॉ. आंबेडकर ने जो संविधान लिखा था, उसके तहत उन्हें ऐसा करने की आज़ादी थी। लेकिन मोदी सरकार ‘पूरा वंदे मातरम्’ गाना अनिवार्य करके डॉ. आंबेडकर के इस अधिकार पर हमला बोल रही है। वह भूल जाती है कि उसका यह अभियान डॉ. आंबेडकर के अनुयायियों को पलटवार करने के लिए मजबूर करेगा।

1937 में कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने जब वंदे मातरम् के दो बंद ही स्वीकार किये थे तो उसके पीछे सब को साथ लेकर चलने का विचार था। यह फ़ैसला गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर जिस कमेटी ने लिया था, उसमें महात्मा गाँधी, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल भी थे। क्या मोदी और अमित शाह उनसे बड़े देशभक्त हैं?

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में इस गीत के सिर्फ़ दो बंद लिखे थे, जो मातृभूमि की सुंदरता उसकी नदियों, फसलों, हवा और चाँदनी का गुणगान करते थे। कांग्रेस और संविधान सभा ने इसे ही स्वीकार किया था जिस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी।

दरअसल, बाद में ‘आनंदमठ’ उपन्यास लिखते हुए बंकिम बाबू ने इसमें चार नये बंद जोड़े थे जिनमें मातृभूमि को दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती जैसी देवी के रूप में देखा गया। अंग्रेज़ी राज में डिप्टी कलेक्टर बंकिम चंद्र ने इस उपन्यास के ज़रिए एक झूठ भी परोसा था। यह उपन्यास 1760 से 1800 के बीच बंगाल में हुए संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर है जिसमें मुस्लिम फ़कीर भी शामिल थे। यह ‘संन्यासी-फ़कीर विद्रोह’ अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ हुआ था। लेकिन बंकिम बाबू ने उपन्यास में मुस्लिम फ़कीरों को ग़ायब कर दिया और विद्रोह को अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ नहीं, मुस्लिम शासकों के ख़िलाफ़ बता दिया। यही नहीं, आनंदमठ का समापन भी अंग्रेज़ी राज को हिंदू धर्म रक्षक बताते हुए उसकी सराहना के साथ होता है। आज़ादी की लड़ाई से अलग रहते हुए अंग्रेज़ों का साथ देने वाले आरएसएस का भी यही सोच था।

इस वंदे मातरम् विवाद के पीछे ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने के आरएसएस के लक्ष्य की गूँज है। एम.एस. गोलवलकर जैसे उसके कई विचारकों ने बार-बार ग़ैर-हिंदुओं से हिंदू संस्कृति स्वीकार करके ‘देशभक्ति का प्रमाण’ देने का दबाव डाला है। यह संविधान की सरसराह अवहेलना है, शायद इसीलिए संविधान बदलना भी इस संगठन का मक़सद रहा है लेकिन यह राष्ट्रीय एकता के लिए भी ख़तरनाक है। शायद इसीलिए डॉ. आंबेडकर ने चेताया था कि “हिंदू-राज देश के लिए भयानक विपत्ति होगी, क्योंकि यह स्वाधीनता, समता और बंधुत्व के लिए खतरा है। इस दृष्टि से यह लोकतंत्र से मेल नहीं खाता। हिंदू राज को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए।”

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