विसंगति की मशीन: चुनाव आयोग ने कैसे संदेह पैदा किया और सुप्रीम कोर्ट ने उसे कायम रहने दिया

13 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल में पहले चरण के मतदान में पांच दिन बाकी थे। बाहर किए गए मतदाताओं के एक समूह की ओर से पेश वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के सामने एक सीधी-सी दलील रखी।

इन अपीलकर्ताओं ने 2024 के बाद हुए हर चुनाव में मतदान किया था। महीनों पहले एक एल्गोरिदम द्वारा चिन्हित किए जाने तक उनके नाम मतदाता सूची में थे। ऐसे में, जब राज्य की अपनी व्यवस्था उनकी अपीलों पर सुनवाई के लिए समय नहीं निकाल पाई थी, तो क्या इन अपीलों के निपटारे तक उन्हें मतदान के लिए पात्र नहीं माना जाना चाहिए?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का जवाब अब पूरे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से निकला सबसे अधिक उद्धृत वाक्य बन चुका है। इसलिए नहीं कि उसने किसी विवाद का समाधान कर दिया, बल्कि इसलिए कि उसने एक ही वाक्य में यह दिखा दिया कि जिस असमानता को दूर करने के लिए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की जा रही थी, उस पर अदालत ने कितनी कम गंभीरता से विचार किया था।

उन्होंने पूछा, “उन्हें वोट देने देने का सवाल ही क्या है?”

फिर उन्होंने कहा, “अगर हम ऐसा करते हैं, तो फिर जो लोग शामिल हैं, उनके मतदान के अधिकार को रोक दें।”

इस गैर-तार्किक तुलना पर कुछ देर ठहरकर विचार करना जरूरी है, क्योंकि आगे की पूरी दलील उसी अंतर पर टिकी है, जिसे मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी ने पहचानने से इनकार कर दिया।

मतदाता सूची में पहले से शामिल व्यक्ति, जिसकी पात्रता को चुनाव आयोग चुनौती दे रहा है, उसकी स्थिति पर अपील लंबित रहने का कोई असर नहीं पड़ता। प्रकाशित सूची में उसका नाम बना रहता है और वह मतदान करता है।

इसके विपरीत, मतदाता सूची से बाहर किया गया व्यक्ति, जो अपना नाम बहाल कराने के लिए अपील कर रहा है, अपील लंबित रहने से सब कुछ खो देता है। प्रकाशित सूची में उसका नाम नहीं होता और इसलिए अपील लंबित होने के बावजूद वह मतदान नहीं कर सकता।

ये दोनों स्थितियां समान नहीं हैं।

इन दोनों को समान मानना, जैसा कि मुख्य न्यायाधीश ने बाहर किए गए मतदाताओं को राहत देने से इनकार करते हुए किया, निष्पक्षता नहीं है।

यह एक ऐसा निर्णय है जिसमें संस्थागत विफलता का पूरा बोझ उसी नागरिक पर डाल दिया गया, जिसे पहले ही अपनी पात्रता साबित करने के लिए मजबूर किया जा रहा था।

इस लेख में तीन तर्क रखे गए हैं। ये सभी पिछले नौ महीनों में SIR के दौरान सामने आए सूचना के अधिकार (RTI) के आंकड़ों, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और चुनाव आयोग की अधिसूचनाओं पर आधारित हैं।

पहला, पश्चिम बंगाल की SIR—और बाद में पता चला कि पश्चिम बंगाल से कहीं आगे तक—एक ऐसी वर्गीकरण व्यवस्था का इस्तेमाल किया गया, जिसका चुनावी कानून में कोई आधार नहीं था। इसके बाद आयोग ने अपने ही नियुक्त निर्णायकों द्वारा इस व्यवस्था को सुधारने की कोशिशों को चुनौती दी।

नतीजा यह हुआ कि अपीलों की व्यवस्था नागरिकों की शिकायतों के कारण जितनी जाम हुई, उतनी ही राज्य और उसके अपने तंत्र के आपसी विवाद के कारण भी।

दूसरा, जब न्यायपालिका के सामने यह स्पष्ट हो गया कि यह व्यवस्था समय रहते काम पूरा नहीं कर सकती, तब अदालत ने पात्रता की सामान्य धारणा अपनाने जैसे सीधे उपाय के बजाय प्रक्रियागत अंतिमता को प्राथमिकता दी।

और ऐसा उस तर्क के आधार पर किया गया, जो अदालत की अपनी कार्यवाही के रिकॉर्ड के सामने टिकता नहीं है।

तीसरा, इसके परिणामस्वरूप जो पैटर्न सामने आया—बनावटी श्रेणियां, जवाबदेही से बाहर सॉफ्टवेयर, वर्षों का काम कुछ हफ्तों में पूरा करने के लिए बनाए गए अपर्याप्त न्यायिक तंत्र और हस्तक्षेप से बचती अदालतें—वह केवल बंगाल की कहानी नहीं है।

यही मॉडल नौ अन्य राज्यों में भी चल रहा है और कम-से-कम एक राज्य में इसका पैमाना पश्चिम बंगाल से दस गुना बड़ा है।

I. पहला छल: दो रास्ते, एक ही विलोपन का आंकड़ा

पश्चिम बंगाल की SIR के बारे में जो भी विवरण “90 लाख मतदाता हटाए गए” को एक अकेले तथ्य के रूप में पेश करता है, वह असल कहानी को स्पष्ट करने के बजाय छिपाता है।

वास्तव में एक ही नाम के तहत दो बिल्कुल अलग प्रक्रियाएं चल रही थीं। इन दोनों को एक ही संख्या में मिला देना पहला ऐसा भ्रम है, जिसे पहचानना जरूरी है।

पहला रास्ता वह SIR था, जिसकी उम्मीद देश को थी—मृत, स्थान बदल चुके और दोहरे नाम वाले मतदाताओं को हटाना।

यही व्यवस्था बिहार की पहली चरण की SIR में और अन्य राज्यों में दूसरे चरण की SIR में भी लागू की गई। यह मतदाता सूची का नियमित रखरखाव था, भले ही इसे बेहद तेज गति से लागू किया गया हो।

पश्चिम बंगाल में इसके तहत लगभग 65 लाख नाम हटाए गए। शुरुआती ड्राफ्ट मतदाता सूची में यह संख्या 58.2 लाख थी, जिसे बाद में संशोधित किया गया।

कोई इस बात से इनकार नहीं करता कि मतदाता सूचियों की समय-समय पर सफाई जरूरी है। पूरे देश में पहले रास्ते को लेकर विवाद मुख्यतः इस बात पर था कि प्रक्रिया कितनी तेजी से और कितने दस्तावेजी बोझ के साथ की गई, न कि इस श्रेणी की वैधता पर।

दूसरा रास्ता वह था, जहां आयोग ने ऐसा काम किया जो पश्चिम बंगाल में ही नहीं, बल्कि भारतीय चुनावों के इतिहास में इससे पहले कहीं नहीं किया गया था।

उसने “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” (तार्किक विसंगति) नाम की एक श्रेणी बनाई।

यह शब्द न तो Registration of Electors Rules में कहीं है और न ही चुनावी कानून में इसकी कोई स्वतंत्र श्रेणी है।

यहां तक कि चुनावी व्यवस्था में 40 वर्ष काम कर चुके एक सेवानिवृत्त IAS अधिकारी ने भी सार्वजनिक रूप से कहा है कि वह इस श्रेणी से परिचित नहीं थे।

यह श्रेणी नवंबर 2025 से बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) को जारी निर्देशों के जरिए धीरे-धीरे सामने आई।

जनवरी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसकी जानकारी सार्वजनिक करने के लिए आयोग पर दबाव डालने के बाद इसकी वास्तविक कार्यप्रणाली सामने आई।

पता चला कि इसके पीछे सॉफ्टवेयर द्वारा तैयार किए गए कुछ संकेतक थे।

इनमें अलग-अलग तरह से लिप्यंतरित दस्तावेजों में मतदाता के नाम और माता-पिता के नाम में अंतर; माता-पिता के बीच 50 वर्ष से अधिक या दादा-दादी के बीच 40 वर्ष से कम उम्र का अंतर; और, सबसे महत्वपूर्ण, ऐसा परिवार जिसमें पांच से अधिक मतदाताओं ने एक ही व्यक्ति को अपना पिता बताया हो—जैसे संकेतक शामिल थे।

इनमें से कोई भी मतदाता की अपात्रता का प्रमाण नहीं है।

ये केवल उन दस्तावेजी असंगतियों के संकेत हैं, जो भारतीय परिवारों के सामान्य रिकॉर्ड में आम हैं—विशेषकर बंगाली और अरबी-फारसी नामों के अलग-अलग रोमन लिप्यंतरण, पिछली पीढ़ियों में बड़े भाई-बहनों वाले परिवार और विवाह के बाद महिलाओं के उपनाम बदलने जैसी स्थितियां।

अपने चरम पर पश्चिम बंगाल में अकेले “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” की सूची में 1.25 करोड़ नाम थे।

पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा से विशेष रूप से बुलाए गए 600 न्यायिक अधिकारियों ने इस लंबित काम की सुनवाई की।

उनके फैसलों के बाद 33 लाख लोगों को फिर से मतदान के लिए पात्र माना गया, जबकि 27 लाख को अपात्र पाया गया।

बाद की रिपोर्टों से पता चला कि अपात्र ठहराए गए लोगों में मुस्लिम नामों का अनुपात कुछ इलाकों में असामान्य रूप से अधिक था।

मिसाल के तौर पर मेटियाब्रुज में मुस्लिम आबादी लगभग 60 प्रतिशत थी, लेकिन “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” के आधार पर बाहर किए गए लोगों में मुस्लिम नामों की हिस्सेदारी 87 प्रतिशत थी।

इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य, जो इतने बड़े आंकड़ों के बीच आसानी से नजरअंदाज हो सकता है, यह है कि “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” केवल बंगाल की समस्या नहीं थी।

29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में—यानी पश्चिम बंगाल की SIR पूरी होने से कई सप्ताह पहले—कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण और गोपाल शंकरनारायणन ने DMK की ओर से दलील देते हुए कहा था कि तमिलनाडु में भी 1.16 करोड़ नामों वाली ऐसी ही “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” सूची थी और उसे भी वही पारदर्शिता मिलनी चाहिए, जो बाद में अदालत ने बंगाल के लिए आदेशित की।

इसका अर्थ है कि यह श्रेणी एक ही विवादित राज्य से दूसरे राज्यों में फैली कोई आकस्मिक व्यवस्था नहीं थी।

इसे दूसरे चरण में शामिल सभी नौ राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों—छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल—में एक साथ लागू किया गया था।

बाद में यही व्यवस्था हरियाणा और उत्तराखंड में SIR के एक और दौर में भी दिखाई दी, जहां अंतिम ज्ञात पते से अस्थायी रूप से अनुपस्थित रहने को भी प्रवासन के प्रमाण की तरह देखा जा रहा है।

इसलिए यह केवल यह कहानी नहीं है कि बंगाल में क्या गलत हुआ।

यह उस प्रशासनिक श्रेणी की कहानी है, जो चुनाव आयोग जहां भी इसे लागू करता है, वहां एक ही तरह की समस्याएं पैदा करती है।

दूसरे रास्ते को केवल एक खराब तरीके से बनाए गए फिल्टर की संज्ञा देना पर्याप्त नहीं है।

असली समस्या तब शुरू हुई जब न्यायिक अधिकारियों ने इस व्यवस्था से पैदा हुई गड़बड़ियों को सुधारना शुरू किया।

कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी द्वारा RTI के तहत हासिल की गई जानकारी, जिसे अर्थशास्त्री और याचिकाकर्ता प्रशांत बोस की ओर से दायर अंतरिम आवेदन के हिस्से के रूप में अगस्त 2026 में सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा गया, इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

इसके मुताबिक, अगस्त की शुरुआत तक पश्चिम बंगाल की अपीलीय पीठों के सामने 38.1 लाख अपीलें लंबित थीं।

इनमें 20 लाख से अधिक अपीलें नाराज नागरिकों ने नहीं, बल्कि स्वयं चुनाव आयोग ने दायर की थीं।

यानी आयोग उन मतदाताओं को शामिल करने के अपने ही न्यायिक अधिकारियों के फैसलों के खिलाफ अपील कर रहा था, जिन्हें उसके अपने अधिकारियों ने पहले ही पात्र मान लिया था।

दूसरे शब्दों में, “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” की प्रक्रिया में 33 लाख लोगों को पात्र पाए जाने के बाद आयोग ने अपने ही अधिकारियों द्वारा पात्र घोषित किए गए अधिकांश लोगों के मामलों को चुनौती देने का फैसला किया।

जिस संस्था को अपने द्वारा नियुक्त, प्रशिक्षित और वित्तपोषित निर्णायकों के हर पांच में से लगभग तीन फैसलों पर आपत्ति हो, वह कोई सामान्य सत्यापन प्रक्रिया नहीं चला रही है।

वह बाहर किए जाने की एक दूसरी, अनौपचारिक परत बना रही है—जिसे अपील की कानूनी प्रक्रिया का रूप दिया गया है।

इस व्यवस्था के निपटारे के आंकड़े आयोग के अपने बचाव को भी मुश्किल बना देते हैं।

38.1 लाख कुल अपीलों में से RTI जवाब के समय तक केवल 82,782 मामलों—यानी 2.17 प्रतिशत—का फैसला हुआ था।

और यह स्थिति प्रक्रिया शुरू होने के 90 दिन से अधिक समय बाद की थी।

लेकिन असली सवाल केवल यह नहीं है कि इतने कम मामले निपटे।

सवाल यह है कि जिन 82,782 मामलों का फैसला हुआ, उनमें हुआ क्या।

इनमें से 75,443 मामले—91.1 प्रतिशत—नागरिक के पक्ष में गए। केवल 7,339 मामलों में अपात्रता बरकरार रखी गई।

आयोग को संदेह का पूरा लाभ देने के लिए यह भी मान लें कि इन “शामिल किए जाने” वाले मामलों का एक बड़ा हिस्सा ऐसे मतदाताओं के पक्ष में फैसला था, जिनके नाम पहले ही न्यायिक अधिकारियों ने बहाल कर दिए थे और आयोग ने उन फैसलों को चुनौती दी थी।

इसके बावजूद यह आंकड़ा असाधारण बना रहता है।

इसका अर्थ है कि जिन मामलों में यह व्यवस्था वास्तव में अपना काम पूरा कर पाई, उनमें दस में से नौ मामलों में आयोग की स्थिति गलत पाई गई—चाहे अपील किसने दायर की हो।

चाहे यह बूथ लेवल अधिकारी द्वारा हटाए गए मतदाता को बहाल करने का मामला हो या आयोग द्वारा अपने ही न्यायिक अधिकारी के फैसले के खिलाफ की गई अपील हो, पैटर्न एक ही है।

जहां भी यह प्रक्रिया पूरी हुई, वहां आयोग का पहले का फैसला नौ में से करीब नौ बार गलत निकला।

और यहां एक महत्वपूर्ण बात है।

आयोग ने उन 82,782 मामलों का यह ब्योरा अब तक सार्वजनिक नहीं किया है कि कितने मामले मतदाताओं द्वारा नाम हटाए जाने के खिलाफ दायर अपीलों के थे और कितने आयोग द्वारा मतदाताओं को शामिल किए जाने के खिलाफ दायर अपीलों के।

यही वह एक विभाजन है जो इस सवाल का स्पष्ट जवाब दे सकता है कि यह कहानी बड़े पैमाने पर नागरिकों की जीत की है या किसी संस्था के अपने ही अधिकारियों से विवाद की।

लेकिन पांच महीने बाद भी यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

वह भी ऐसी अदालत के सामने, जिसने अब तक दो बार आयोग से ठीक यही आंकड़े मांगे हैं, लेकिन उसे अब तक उपयोगी और स्पष्ट रूप में उपलब्ध नहीं कराया गया।

91 प्रतिशत के इस आंकड़े में एक और पहलू है, जो इसे और गंभीर बनाता है।

अपीलीय पीठों द्वारा तय किए गए 82,782 मामले, अधिकांशतः बूथ लेवल अधिकारी द्वारा किए गए शुरुआती नाम विलोपन या बिना समीक्षा वाले एल्गोरिदमिक संकेत के खिलाफ पहली अपील नहीं थे।

वे उन फैसलों के खिलाफ अपीलें थीं, जिन्हें 600 न्यायिक अधिकारियों ने पहले ही सुनकर तय किया था।

इन अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट ने ही विशेष रूप से इसलिए लगाया था ताकि एल्गोरिदम और प्रशासनिक स्तर पर हुई गलतियों को सुधारा जा सके।

ऐसे में 91 प्रतिशत मामलों का उलट जाना यह नहीं बताता कि सॉफ्टवेयर ने कुछ गलतियां कीं।

सॉफ्टवेयर से गलतियां होना सामान्य बात है और उन्हें पकड़ने के लिए समीक्षा की व्यवस्था बनाई गई थी।

यह बताता है कि जिस समीक्षा व्यवस्था पर अदालत ने भरोसा किया था—जिसमें बूथ लेवल अधिकारियों के बजाय न्यायिक अधिकारियों को लगाया गया था—वह भी जिन मामलों की वास्तव में जांच हुई, उनमें नौ में से आठ से अधिक बार गलत साबित हुई।

पहले स्तर पर इतनी बड़ी संख्या में गलतियां होने के पीछे का गणित भी साफ है।

सुप्रीम कोर्ट के 20 फरवरी के आदेश और 6–9 अप्रैल को मतदाता सूची को अंतिम रूप देने की तारीख के बीच 600 न्यायिक अधिकारियों ने लगभग सात सप्ताह में 60 लाख विवादित मामलों को निपटाया।

यदि काम को बराबर बांटा जाए तो हर अधिकारी के हिस्से में 10,000 मामले आते हैं।

यानी आठ घंटे के कार्यदिवस के हिसाब से हर दिन 200 से अधिक फैसले।

दूसरे शब्दों में, हर मामले पर लगभग दो से तीन मिनट।

लगातार कई सप्ताह तक इस गति से काम करने वाली किसी भी प्रक्रिया को सामान्य अर्थ में “न्यायिक सुनवाई” नहीं कहा जा सकता।

न्यायिक सुनवाई का मतलब है दस्तावेजों की व्यक्तिगत जांच, पक्ष रखने का अवसर, कारणों का रिकॉर्ड और उन कारणों पर विचार।

दो-तीन मिनट में यह सब संभव नहीं है।

यह न्याय नहीं, बल्कि थोड़ी बेहतर कागजी प्रक्रिया के साथ किया गया सिक्का उछालना है।

यही पूरे SIR तंत्र का केंद्रीय विरोधाभास है।

अगर चुनावी समयसीमा में काम पूरा करने के लिए सुनवाई इतनी तेज कर दी जाए, जैसा कि पहले स्तर पर किया गया, तो परिणाम यह होता है कि जिन मामलों की किसी ने जांच की, उनमें 91 प्रतिशत उलट गए।

दो से तीन मिनट में न्याय नहीं मिलता।

अगर सुनवाई इतनी धीमी की जाए कि वास्तव में विचार-विमर्श हो सके, जैसा कि अपीलीय पीठों में हो रहा है, तो 100 से अधिक दिन बाद भी केवल 2.17 प्रतिशत मामले निपटते हैं।

इस गति से मौजूदा लंबित मामलों को खत्म करने में वर्षों लगेंगे।

तब तक कई और चुनाव हो चुके होंगे और उन मतदाता सूचियों के आधार पर होंगे, जिनकी जांच अभी पूरी भी नहीं हुई है।

SIR की समयसीमा ने केवल न्यायिक व्यवस्था पर सामान्य क्षमता से अधिक दबाव नहीं डाला।

उसने हर स्तर की समीक्षा को दो विकल्पों के बीच फंसा दिया—या तो जल्दी फैसला करो और गलत होने का जोखिम उठाओ, या सही फैसला करो लेकिन इतनी देर से कि उसका कोई चुनावी महत्व ही न रह जाए।

और चुनावी कैलेंडर इस तरह बनाया गया कि दोनों में से कोई भी रास्ता चुना जाए, कीमत नागरिक को चुकानी पड़े और संस्था पर कोई वास्तविक बोझ न आए।

II. चूक: अदालत ने गणित किया और फिर भी आगे बढ़ गई

संस्थागत विफलता की अधिकांश कहानियों में न्यायपालिका के पास एक बचाव रहता है—अदालत को समस्या का अनुमान नहीं था और समस्या का असली पैमाना बाद में सामने आया, जब ऐसे आंकड़े उपलब्ध हुए जिनका पहले से अनुमान लगाना संभव नहीं था।

इस मामले में यह बचाव उपलब्ध नहीं है।

क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के अपने न्यायाधीशों ने चुनाव से पहले, खुले न्यायालय में, इस समस्या का गणित किया था।

फिर भी उन्होंने प्रक्रिया को आगे बढ़ने दिया।

13 अप्रैल की सुनवाई में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने इस तथ्य पर विचार किया कि असाधारण समय के दबाव में काम कर रहे न्यायिक अधिकारी—जिन्हें 6/9 अप्रैल की अंतिम तिथि से पहले 60 लाख विवादित मामलों को निपटाने का निर्देश दिया गया था—कुछ मामलों में अपने फैसलों के कारण तक दर्ज नहीं कर पा रहे थे।

उन्होंने कहा कि अगर अधिकारी 70 प्रतिशत मामलों में सही फैसला कर पाए हों, तो “यह भी एक अच्छी उपलब्धि होगी।”

सुप्रीम कोर्ट का एक मौजूदा न्यायाधीश यह स्वीकार कर रहा था कि 60 लाख मामलों की सुनवाई के बाद होने वाली गलतियों का अनुमान 30 प्रतिशत तक लगाया जा सकता है।

यानी 15 लाख से अधिक मामले गलत तरीके से तय हो सकते थे—किसी भी दिशा में।

और यही गलती उस मतदाता सूची में स्थायी रूप से दर्ज हो सकती थी, जिसे अदालत मतदान के लिए अंतिम रूप देने वाली थी।

अब इस बयान की तुलना 18 सप्ताह बाद सामने आए वास्तविक निपटारे के आंकड़ों से कीजिए।

वहां 30 प्रतिशत की संभावित गलती नहीं दिखी।

जिन मामलों का फैसला हुआ, उनमें 91 प्रतिशत फैसले पलट गए।

और, जैसा कि ऊपर बताया गया है, यह आंकड़ा उन्हीं न्यायिक अधिकारियों के फैसलों के खिलाफ अपीलों में सामने आया, जिन्हें अदालत ने गलती सुधारने के लिए नियुक्त किया था।

अगर न्यायमूर्ति बागची का 70 प्रतिशत का अनुमान इस बात की ऊपरी सीमा मानकर चल रहा था कि प्रक्रिया कितनी गलत हो सकती है, तो बाद में सामने आया आंकड़ा बताता है कि अदालत को नुकसान का जो अनुमान था, वह भी शायद कम था।

अदालत को अपने ही न्यायाधीश के शब्दों से पता था कि जिस सुरक्षा व्यवस्था पर वह भरोसा कर रही है, उसके विफल होने का वास्तविक खतरा मौजूद है।

इसके बावजूद उसने उसी व्यवस्था के आधार पर मतदाता सूची को अंतिम रूप देने दिया।

इस ज्ञात अनिश्चितता के जवाब में अदालत ने जोखिम के अनुपात में कोई अतिरिक्त सुरक्षा उपाय नहीं बनाया।

याचिकाकर्ताओं ने एक बेहद सरल उपाय सुझाया था।

चूंकि ये मतदाता 2024 की मतदाता सूची में शामिल थे, इसलिए यह मान लिया जाए कि वे अब भी पात्र हैं। उनकी पात्रता तभी समाप्त हो जब किसी सक्षम न्यायाधिकरण का स्पष्ट प्रतिकूल फैसला आ जाए।

इस व्यवस्था से न्यायाधिकरणों पर कोई अतिरिक्त बोझ भी नहीं पड़ता।

इसके उलट, यह ठीक उसी स्थिति से नागरिकों की रक्षा करती, जिसका जोखिम अदालत खुद पहचान चुकी थी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने ऊपर उद्धृत अपनी टिप्पणी में इसी प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

बाद में 16 अप्रैल को जारी लिखित आदेश में अदालत ने अपने मौखिक रुख में केवल इतना बदलाव किया कि 21 या 27 अप्रैल तक जिन अपीलों पर फैसला हो जाए, उन्हें मतदान की पात्रता में शामिल किया जा सकता है।

लेकिन यह कोई वास्तविक समाधान नहीं था।

अदालत के अपने आंकड़ों के मुताबिक, 19 न्यायाधिकरण अगर हर दिन लगभग 100 मामलों का निपटारा करते, तो केवल 10 लाख अपीलें निपटाने में ही 526 कार्यदिवस लगते।

यानी लगातार काम करने पर भी दो साल से अधिक।

इसलिए मतदान खत्म होने से पहले लंबित अपीलों में से केवल बहुत थोड़े मामलों को इसका लाभ मिलना लगभग तय था।

और यह गणित उस समय अदालत के सामने मौजूद था।

अदालत ने अपने तय नियम में चार अपवाद जरूर किए।

इनमें दो उम्मीदवारों से जुड़े मामले थे, जिनके नामांकन पत्र लंबित न्यायाधिकरण मामलों के कारण अटक गए थे।

दो अन्य मामले कोलकाता के एक दंपति से जुड़े थे, जिनके परिवार का संबंध संविधान की मूल प्रति के चित्रांकन से था और जिनके मामले को मीडिया का ध्यान मिला था।

इन चार लोगों को तेजी से सुनवाई मिली।

जबकि लाखों सामान्य अपीलकर्ताओं को ऐसी राहत नहीं मिली।

यह किसी एक न्यायाधीश की बदनीयती का प्रमाण नहीं है।

यह कहीं अधिक संरचनात्मक समस्या की ओर इशारा करता है।

व्यवस्था वास्तव में तेजी से काम कर सकती थी, अगर सही व्यक्ति अदालत के सामने मौजूद हो।

इसका मतलब है कि 526 दिनों का अनुमान वास्तव में केवल संस्थागत क्षमता का सवाल नहीं था।

यह प्राथमिकता तय करने का सवाल था।

और यह प्राथमिकता सामान्य अपीलकर्ता को नहीं दी गई।

इस लेख में इसे साजिश के बजाय “चूक” कहा गया है।

ऐसी अदालत जिसने अपने रिकॉर्ड में दर्ज बातचीत के दौरान जोखिम के पैमाने को समझने के लिए जरूरी हर तथ्य देख लिया था, लेकिन फिर भी उसने कोई ऐसा कदम नहीं उठाया जिससे उस जोखिम को कम किया जा सके।

उसने प्रक्रियात्मकता को प्राथमिकता दी—मतदाता सूची को अंतिम कर दो, न्यायाधिकरणों को जितनी गति से हो सके काम करने दो और लंबित मामले तथा तय हो चुके मामले को कानूनी रूप से अलग मानो, भले ही इस अंतर का वास्तविक परिणाम एक वर्ग के नागरिकों का मतदान से वंचित होना ही क्यों न हो।

इसके बजाय अदालत के पास एक ऐसा विकल्प था, जिसमें किसी अतिरिक्त न्यायिक काम की जरूरत नहीं थी—नागरिक के पक्ष में पात्रता की प्रारंभिक धारणा।

लेकिन उसे नहीं अपनाया गया।

ऐसी चूक को प्रभावी होने के लिए किसी साजिश या मंशा की जरूरत नहीं होती।

बस इतना काफी है कि न्यायपालिका अपने सामने मौजूद अनिश्चितता को किसी स्पष्ट नियम से नागरिक के पक्ष में दूर करने के बजाय उसे उसी नागरिक के खिलाफ अपने आप सुलझने दे।

III. निहितार्थ: एक ऐसी नागरिकता परीक्षा, जिसे किसी ने कानून में बनाया ही नहीं

इन दोनों विफलताओं को एक साथ रखिए।

एक तरफ ऐसा प्रशासनिक वर्गीकरण था, जिसका कोई स्पष्ट विधायी आधार नहीं था और जिसका असर अलग-अलग समुदायों पर असमान रूप से पड़ा।

दूसरी तरफ ऐसी न्यायपालिका थी, जिसने जोखिम को पहचाना, उसका गणित किया और फिर भी उस जोखिम को कम करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाया।

इन दोनों को मिलाकर जो तस्वीर सामने आती है, वह केवल एक राज्य की चुनावी व्यवस्था की कहानी नहीं है।

यह इस बात का उदाहरण है कि नागरिकता की एक परीक्षा ऐसी जगह कैसे बनाई और लागू की जा सकती है, जहां नागरिकता की शर्तों को तय ही नहीं किया गया था।

इसके लिए न जनप्रतिनिधित्व कानून में कोई संशोधन हुआ।

न संसद में बहस हुई।

न ऐसा कोई नियम अधिसूचित हुआ, जिसे उसके मूल स्वरूप में चुनौती दी जा सके।

इसके बजाय केवल आयोग की एक अधिसूचना, एक एल्गोरिदम और अनुपालन की ऐसी समयसीमा थी, जो सामान्य अपील व्यवस्था को सुधार का अवसर देने के लिए बहुत छोटी थी।

पश्चिम बंगाल के आंकड़ों में दिखाई देने वाला भौगोलिक पैटर्न इस सवाल को और गंभीर बनाता है, बिना किसी मंशा के बारे में अनुमान लगाए।

RTI से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, अपीलों का लगभग पूरा लंबित बोझ उन्हीं जिलों में दिखाई देता है, जहां तृणमूल कांग्रेस ऐतिहासिक रूप से मजबूत रही है।

मुर्शिदाबाद में 99.93 प्रतिशत मामले लंबित थे।

मालदा में 99.72 प्रतिशत।

उत्तर 24 परगना में निपटारे की दर केवल 0.077 प्रतिशत थी।

पूर्व बर्धमान में 99.97 प्रतिशत मामले लंबित थे।

इसके विपरीत पुरुलिया में 24.62 प्रतिशत मामलों पर काम हुआ और बांकुड़ा में यह दर 23.05 प्रतिशत थी।

दोनों इलाकों को TMC का अपेक्षाकृत कमजोर क्षेत्र माना जाता है।

यहां यह दावा नहीं किया जा सकता कि न्यायाधिकरणों की क्षमता का ऐसा असमान वितरण क्यों हुआ।

उसके लिए उपलब्ध आंकड़ों से आगे जाकर अनुमान लगाना पड़ेगा।

लेकिन एक बात स्पष्ट रूप से कही जा सकती है।

राज्य को इस सवाल का जवाब देने की जरूरत ही नहीं पड़ी, क्योंकि अपीलीय व्यवस्था के लगभग ठप हो जाने ने उससे पहले ही इस सवाल को दबा दिया।

जो प्रक्रिया समान रूप से काम करने में इतनी विफल हो कि उसका असर अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग पड़े, राजनीतिक जवाबदेही के लिहाज से वह व्यवहार में उस प्रक्रिया से अलग नहीं रहती, जिसे जानबूझकर असमान बनाया गया हो।

दोनों स्थितियों में कीमत नागरिक चुकाता है।

और दोनों में संस्था पर कोई वास्तविक कीमत नहीं आती।

अब आगे की तस्वीर को देखते हुए पश्चिम बंगाल को सबसे खराब उदाहरण मानने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

संभव है कि वह सबसे खराब नहीं, बल्कि सबसे अच्छी तरह दस्तावेजीकृत उदाहरण हो।

उत्तर प्रदेश की ड्राफ्ट मतदाता सूची में ही 15.35 करोड़ मतदाताओं के आधार पर 2.89 करोड़ नाम हटा दिए गए।

एक राज्य में हटाए गए नामों की यह संख्या पश्चिम बंगाल में न्यायिक स्तर पर तय किए गए कुल मामलों से तीन गुना से भी अधिक है।

और इस राज्य में अभी तक ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है कि पश्चिम बंगाल जैसी न्यायिक अधिकारियों और अपीलीय न्यायाधिकरणों की समान व्यवस्था बनाई गई थी।

पश्चिम बंगाल को दो-स्तरीय न्यायिक व्यवस्था इसलिए मिली क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच मौजूद एक विशेष “विश्वास के संकट” को इतना गंभीर माना कि उसने अनुच्छेद 142 के तहत विशेष हस्तक्षेप किया।

उत्तर प्रदेश, गुजरात या राजस्थान के लिए ऐसा कोई समान निष्कर्ष और समान न्यायिक उपाय सामने नहीं आया है।

यह तब है जब तमिलनाडु की “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” सूची में शामिल नामों की संख्या पूर्ण आंकड़ों में पश्चिम बंगाल से भी अधिक थी।

अगर जिस राज्य को सबसे विस्तृत न्यायिक सुरक्षा दी गई, वहां भी वह व्यवस्था 90 दिनों में अपने तीन प्रतिशत से कम मामलों का निपटारा कर सकी, तो असली सवाल उन राज्यों को लेकर है, जिन्हें ऐसी कोई समान व्यवस्था मिली ही नहीं।

और यही वह बिंदु है जो SIR को केवल बंगाल की समस्या मानने की धारणा को कमजोर करता है।

यह एक राष्ट्रीय कहानी है।

एक ऐसी श्रेणी जिसे विधायी प्रक्रिया के बिना बनाया गया।

जिसे भारत के राज्यों के एक बड़े हिस्से में एक साथ लागू किया गया।

जिसके कारण ऐसी अपील व्यवस्था बनी जिसे सबसे अच्छी तरह संसाधन मिलने के बावजूद समय पर काम पूरा करना संभव नहीं था।

और जिसे ऐसी न्यायपालिका ने आगे बढ़ने दिया जिसने जोखिम का गणित खुद सामने रखा था, लेकिन उस जोखिम के आधार पर प्रक्रिया को रोकने या नागरिक के पक्ष में सुरक्षा देने से इनकार किया।

यह केवल प्रशासनिक गलती का मामला नहीं है।

यह इस बात का उदाहरण है कि भारत के मतदाता समुदाय की सीमा को कैसे बदला जा सकता है—ऐसी श्रेणियों के जरिए जो इतनी तकनीकी हों कि उन पर सार्वजनिक बहस न हो सके; ऐसी समयसीमा के भीतर जो न्यायिक सुधार को लगभग असंभव बना दे; और ऐसी समीक्षा व्यवस्था के साथ जो उन नामों के बराबर गति से कभी काम ही न कर सके जिन्हें हटाया जा रहा है।

भारत में मतदान का अधिकार कभी भी केवल किसी एक नाटकीय फैसले से खत्म नहीं हुआ है।

इस साल यह इस बात पर निर्भर हो गया है कि आपकी पारिवारिक दस्तावेजी जानकारी पर “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” नाम का सॉफ्टवेयर संकेत पड़ता है या नहीं।

और अगर पड़ता है, तो उसके बाद उसे सुधारने की ताकत रखने वाला कोई व्यक्ति समय निकालकर आपकी फाइल देखता है या नहीं।

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