Nepal-Tibet border Flood: नेपाल और तिब्बत की सीमा पर बुधवार सुबह अचानक आई बाढ़ और बड़े भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है। सैकड़ों लोगों की मौत हो गई है और हजारों लोग अभी भी लापता हैं। यह घटना ग्लेशियर से जुड़ी बाढ़ (GLOF) जैसी लग रही है।
क्या हुआ था?
बुधवार सुबह करीब 8:37 बजे नेपाल-चीन सीमा के पास तेज झटके महसूस किए गए। शुरुआत में स्थानीय लोगों और अधिकारियों ने इसे भूकंप समझा। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) ने भी पहले इसे 4.4 तीव्रता का भूकंप बताया था। लेकिन कुछ घंटों बाद स्थिति साफ हुई। असल में एक ऊंचे ग्लेशियर का निचला हिस्सा अचानक टूटकर घाटी में गिर गया। बर्फ, चट्टान और मलबे का विशाल ढेर ल्हेंदे खोला (Lhende Khola) नदी में जा गिरा। यह नदी भोटेकोशी की सहायक नदी है, जो चीन से निकलकर नेपाल में प्रवेश करती है।
मलबे ने नदी को कुछ समय के लिए अवरुद्ध कर दिया। जब यह प्राकृतिक बांध टूटा, तो पानी, मिट्टी और चट्टानों की दीवार तेज रफ्तार से नीचे की ओर बह निकली। झटका इतना तेज था कि USGS ने बाद में इसे 5.2 तीव्रता के भूकंप के बराबर आंका। यानी भूकंप पहले नहीं आया था, बल्कि बड़े भूस्खलन ने भूकंप जैसा झटका पैदा किया था।

अब तक कितना नुकसान?
मानवीय क्षति
नेपाल में 175 और तिब्बत में 3 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है (कुल 178)। आंकड़ा अभी और बढ़ सकता है। 1,400 से ज्यादा लोग लापता बताए जा रहे हैं। नेपाल के विदेश मंत्री के अनुसार अकेले नेपाल में 826 लोग लापता हैं, जिनमें 300 से ज्यादा भारतीय शामिल हैं। तिब्बत के ग्यिरोंग काउंटी में 558 लोग लापता हैं, जिनमें 260 विदेशी नागरिक हैं। तमिलनाडु के 37 पर्यटक, पश्चिम बंगाल के 32 लोगों का समूह (कैलाश मानसरोवर यात्रा पर) और ईशा फाउंडेशन से जुड़े दर्जनों लोग संपर्क से बाहर हैं। कई सुरक्षाकर्मी भी लापता हैं।

बुनियादी ढांचे का नुकसान
कम से कम 32 बड़े पुल ध्वस्त हो गए। कई झूला पुल भी क्षतिग्रस्त हुए।
बेट्रावती से रसुवागढ़ी सीमा चौकी तक की सड़क का करीब 42 किलोमीटर हिस्सा बह गया या क्षतिग्रस्त हुआ।
13 जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुईं। इनमें 8 चालू और 5 निर्माणाधीन परियोजनाएं शामिल हैं। इनकी कुल क्षमता करीब 748 मेगावाट है।
800 से 1,000 गाड़ियां फंस गईं या बह गईं। इनमें करीब 300 यात्री बसें शामिल हैं।
कई गांवों, बाजारों और इमिग्रेशन सेंटर का संपर्क पूरी तरह टूट गया।
बाढ़ की असली वजह क्या थी?
वैज्ञानिकों के अनुसार आइस-रॉक एवलांच सैटेलाइट तस्वीरों (Planet Labs) के विश्लेषण से पता चला है कि करीब 5,200 मीटर ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर का निचला हिस्सा (लगभग 0.2 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र) टूट गया। यह हिस्सा करीब 1,200 मीटर नीचे घाटी में गिरा। गिरते समय बर्फ के साथ बड़ी मात्रा में चट्टानें और मिट्टी भी साथ आ गईं। यह मलबा ल्हेंदे नदी में जाकर जमा हो गया और नदी को अस्थायी रूप से रोक दिया। जब पानी का दबाव बढ़ा और बांध टूटा, तो अचानक भीषण बाढ़ आ गई। विशेषज्ञ इसे आइस-रॉक एवलांच (Ice-Rock Avalanche) बता रहे हैं।
क्या यह GLOF था?
कई विशेषज्ञों ने ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की भी संभावना जताई है। इसमें ग्लेशियर के पीछे जमा झील का पानी अचानक बाहर निकल जाता है लेकिन इस घटना में ज्यादातर वैज्ञानिक तर्क आइस-रॉक एवलांच की ओर इशारा कर रहे हैं, जिसने नदी को अवरुद्ध कर बाढ़ पैदा की। नेपाल की नेशनल डिजास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDRRMA) ने सैटेलाइट इमेजरी के आधार पर कहा कि यह मलबा युक्त बाढ़ ल्हेंदे नदी में एक ग्लेशियल-रॉक स्लाइड के बाद आई।

भूकंप की भूमिका
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने शुरुआत में संसद में कहा था कि सीमा पर भूकंप की खबर मिली थी, जिससे भूस्खलन हो सकता है। लेकिन USGS ने साफ कर दिया कि कोई भूकंप नहीं आया था। महसूस किया गया झटका पूरी तरह भूस्खलन की वजह से था। सैटेलाइट तस्वीरों में ग्लेशियर के आसपास असामान्य गर्मी और बर्फ की कमी दिखी है। हिमालय के ग्लेशियर पिछले कुछ दशकों में तेजी से पिघल रहे हैं। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि बढ़ते तापमान ने ग्लेशियर को अस्थिर बनाया हो सकता है। हालांकि, इस घटना का जलवायु परिवर्तन से सीधा संबंध अभी पूरी तरह साबित नहीं हुआ है। आगे attribution studies से यह पता चल सकेगा।
भारत पर क्या असर पड़ेगा?
नेपाल का पानी त्रिशूली नदी से होते हुए गंडक नदी में पहुंचेगा। बिहार में खास असर दिख सकता है। पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर और वैशाली में सतर्कता बढ़ाई गई है। सीतामढ़ी और शिवहर पर भी नजर है। करीब 3 मीटर ऊंची फ्लड वेव आने का अलर्ट है। उत्तर प्रदेश के महाराजगंज और कुशीनगर में भी अलर्ट जारी किया गया है।
बचाव और राहत अभियान
नेपाल का प्रयास
नेपाली सेना ने रसुवा के टिमुरे इलाके से 116 लोगों को सुरक्षित निकाला है। इनमें 95 नेपाली और 21 भारतीय नागरिक शामिल हैं। एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट की सुरंग में फंसे 7 लोगों को भी जिंदा बचाया गया। तीन अन्य सुरंगों में बचाव कार्य जारी है। नेपाल सरकार ने 30 हेलीकॉप्टर तैनात किए हैं। 20 हेलीकॉप्टर स्टैंडबाय पर हैं। प्रधानमंत्री बालेन शाह खुद प्रभावित इलाकों का जायजा लेने नुवाकोट पहुंचे। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने प्रधानमंत्री से फोन पर बात कर पूरी मशीनरी लगाने का निर्देश दिया।

हाल के वर्षों की सबसे बड़ी आपदाओं में से एक
यह हाल के वर्षों में नेपाल की सबसे भयानक प्राकृतिक आपदाओं में से एक साबित हो रही है। मरने वालों की संख्या अभी और बढ़ने की आशंका है। रसुवा, नुवाकोट, चितवन, धाडिंग समेत कई जिले अचानक आई बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। इसका असर आगे चलकर बिहार और उत्तर प्रदेश तक भी पहुंच सकता है। बाढ़ की शुरुआत तब हुई जब एक हिमस्खलन ने भोटेकोशी नदी की सहायक ‘ल्हेन्डे’ नदी के बहाव को रोक दिया। पानी का दबाव बढ़ने पर अचानक बड़ी लहर निकली और सबसे पहले रसुवागढ़ी के पास तिमुरे को अपनी चपेट में ले लिया।

यह इलाका नेपाल-चीन सीमा के करीब है। बाढ़ इतनी तेज थी कि सैकड़ों लोगों के घर और बस्तियों का बड़ा हिस्सा पानी में बह गया।चूंकि उस समय इलाके में बारिश नहीं हो रही थी, इसलिए लोगों को किसी तरह की चेतावनी नहीं मिली। ज्यादातर लोग अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त थे, जब अचानक बाढ़ ने तबाही मचा दी। रसुवा जिले से अब तक करीब 114 घायल लोगों को हेलीकॉप्टर के जरिए सुरक्षित निकाला जा चुका है। नेपाली सेना के हेलीकॉप्टरों ने 85 लोगों को बचाया, जबकि निजी हेलीकॉप्टरों ने 29 लोगों को एयरलिफ्ट किया। रसुवा बागमती प्रदेश का एक पहाड़ी जिला है, जो तिब्बत की सीमा से लगा हुआ है।

भारत की मदद
भारत ने दो खेप में कुल 47.5 टन राहत सामग्री भेजी है। इसमें जरूरी दवाइयां, खाद्य पैकेट और अन्य मानवीय सहायता शामिल है। पहली खेप C-130J विमान से और दूसरी खेप भारतीय वायुसेना के विमान से भेजी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल को हर तरह की मदद देने का भरोसा दिलाया है। भारतीय दूतावास आपातकालीन हेल्पलाइन चला रहा है और लापता भारतीयों की जानकारी जुटा रहा है।
अन्य देशों ने भी भेजी मदद
अमेरिका ने 5 लाख डॉलर की मदद और एक आपदा सलाहकार भेजने की घोषणा की है। चीन बचाव अभियान में सहयोग कर रहा है। चीनी हेलीकॉप्टर उस जगह भी पहुंचा जहां से तबाही शुरू हुई थी। ब्रिटेन अपने नागरिकों की मदद के लिए प्रयास कर रहा है। बांग्लादेशी अभिनेत्री अपु बिस्वास पोखरा में सुरक्षित बताई जा रही हैं।
पिछले साल भी आई थी बाढ़, चेतावनी व्यवस्था फिर नाकाम
पिछले साल भी इसी ल्हेंदे नदी में बाढ़ आई थी। 8 जुलाई 2025 को आई उस बाढ़ में कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई थी। कई जगहों पर सड़क का हिस्सा बह गया था और नेपाल-चीन को जोड़ने वाला मितरी पुल भी बह गया था। तबाह हुए इलाके अभी तक पूरी तरह सामान्य स्थिति में नहीं लौट पाए थे। इस बार भी अधिकारियों का कहना है कि अचानक आई बाढ़ की सही और समय पर जानकारी न मिलने के कारण जान-माल का भारी नुकसान हुआ। रसुवा जिला प्रशासन के अधिकारियों ने साफ कहा कि उन्हें तिब्बत की तरफ से शुरू हुई बाढ़ के बारे में कोई पूर्व जानकारी नहीं थी।
इस घटना ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है। क्या नेपाल की नदियों में बाढ़ आने के बाद ही निचले इलाकों के लोगों को चेतावनी दी जानी चाहिए, या हिमालय के संवेदनशील इलाकों में कोई घटना होते ही तुरंत जानकारी मिलने का मजबूत सिस्टम होना चाहिए? समस्या सिर्फ नेपाल और चीन के बीच जानकारी साझा करने तक सीमित नहीं है। लगता है कि बाढ़ से पहले नेपाल ने अपने इलाके में लगाए गए उपकरण भी समय पर चेतावनी भेजने में नाकाम रहे।
सबसे ज्यादा भारतीय पर्यटक लापता
नेपाल टूरिज्म बोर्ड के अनुसार, सबसे ज्यादा भारतीय पर्यटक लापता हैं। अब तक की जानकारी के मुताबिक:
- भारत से 133
- अमेरिका से 47
- ऑस्ट्रेलिया से 34
- ब्रिटेन से 33
- कनाडा से 24
- मलेशिया से 19
- यूक्रेन से 7
- सिंगापुर और दक्षिण अफ्रीका से 6-6
- न्यूजीलैंड और जापान से 5-5
इसके अलावा जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन, आयरलैंड, नीदरलैंड्स समेत 25 से ज्यादा देशों के नागरिक भी बाढ़ में लापता बताए जा रहे हैं। बाढ़ से तिमुरे और स्याफ्रूबेसी इलाकों में बस्तियां, पुलिस चौकियां और कस्टम ऑफिस बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। रसुवागढ़ी बॉर्डर क्रॉसिंग को जोड़ने वाली सड़कें और पुल भी क्षतिग्रस्त हो गए हैं। किसी भी जानकारी या मदद के लिए नेपाल टूरिज्म बोर्ड ने टोल फ्री नंबर 1234, हॉटलाइन 1144 और टूरिज्म पुलिस 9851289445 पर संपर्क करने की अपील की है।

आगामी चुनौतियां
खराब मौसम, टूटे रास्ते और संचार व्यवस्था ठप होने के कारण बचाव अभियान मुश्किल चल रहा है। मौतों का आंकड़ा और बढ़ने की आशंका है। कई परिवार अभी भी अपने प्रियजनों का इंतजार कर रहे हैं। यह घटना हिमालय में ग्लेशियरों की निगरानी और शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत को फिर से रेखांकित करती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ऐसी घटनाएं आगे और बढ़ सकती हैं। समय पर जानकारी और मजबूत बचाव व्यवस्था ही जान-माल के नुकसान को कम कर सकती है।









