सरकार के लिए केवल आंकड़ा, जनता के लिए रोटी का सवाल

हमारे शहर में शक्कर 65 रुपये किलो हो गई, कुछ हफ्ते पहले 42 से 45 रुपये किलो थी। मतलब यह कि सरकारी चार्ट के बाहर हैं दाम ! शक्कर के साथ ही हर चीज महँगी बिक रही है। अगले हफ्ते राखी है। फिर तीज, फिर जन्माष्टम, फिर शारदेय नवरात्रि,दशहरा, दीपावली, छठ पूजा…..ये त्यौहार हमारी इकोनॉमी की रीढ़ है। खेती किसानी और छोटे व्यापारियों का कारोबार इसी से चलता है। खाने पीने के सामान की खरीददारी में निम्न आय वर्ग की आधी से ज्यादा कमाई खर्च हो जाती है।

जिस घर में सुबह की शुरुआत चाय से होती है, वहां चीनी के दाम बढ़ते ही महंगाई किसी ग्राफ की रेखा नहीं रहती , वह सीधे कप में उतर आती है। शक्कर का महँगा होना केवल एक वस्तु की कीमत बढ़ना नहीं है, यह उस व्यापक चिंता का संकेत है कि आम भारतीय की थाली, टिफिन और त्योहारों की मिठास पर महंगाई फिर से कब्जा जमा रही है। शक्कर महंगी होती है तो मिठाई महंगी होती है, बिस्कुट और बेकरी उत्पाद महंगे होते हैं, कोल्ड ड्रिंक और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों की लागत बढ़ती है। यानी चीनी की कीमत में उछाल एक ऐसा छोटा-सा पत्थर है, जिसकी लहरें पूरी उपभोक्ता अर्थव्यवस्था में फैलती हैं।

लेकिन असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि चीनी महंगी क्यों हुई? सवाल यह है कि क्या यह उस नई महंगाई की शुरुआत है, जिसमें एक-एक करके हमारी रोजमर्रा की जरूरतों की चीजें महंगी होती चली जाएंगी?

सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग के मूल्य निगरानी तंत्र के 19 अगस्त 2026 के अखिल भारतीय औसत खुदरा आंकड़े बताते हैं कि अरहर दाल लगभग 124 रुपये किलो, उड़द दाल 122 रुपये, मूंग दाल 112 रुपये, सरसों तेल लगभग 200 रुपये लीटर, मूंगफली तेल 210 रुपये, सूरजमुखी तेल 192 रुपये और दूध लगभग 61 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर है। यह लिस्ट किसी फाइव स्टार होटल के मेन्यू की नहीं है। यह भारतीय मध्यमवर्ग और गरीब परिवार की रोजमर्रा की रसोई की सूची है।

कहां गई शक्कर?

शक्कर संकट की जड़ें कई हैं और एक-दूसरे को मजबूत कर रही हैं। 2025-26 सीजन में उत्पादन शुरुआती आशावादी अनुमानों से कम रहा। एथेनॉल के लिए डायवर्जन के बाद शुद्ध उत्पादन करीब 28 मिलियन टन या उससे कम रहने का अनुमान है, जबकि घरेलू खपत भी लगभग उसी स्तर पर है। स्टॉक असुविधाजनक स्तर तक गिर चुके हैं समापन भंडार 3.5 से 4.3 मिलियन टन के आसपास रहने का अनुमान है, जो वर्षों में सबसे कम है।

ई-20 ब्लेंडिंग लक्ष्य पूरा करने के लिए गन्ने और शक्कर का बड़ा हिस्सा एथेनॉल में चला गया। ऊर्जा मोर्चे पर यह नीतिगत सफलता खाद्य मोर्चे पर कीमत चुकवा रही है। महाराष्ट्र जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में सामान्य से कम मानसून ने दबाव बढ़ाया है, जबकि रक्षाबंधन से दीवाली तक के त्योहारी सीजन की मांग ने तंगी को और बढ़ा दिया है। सरकार ने जवाब दिया है: थोक उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक रखने की सीमा सख्त की गई है और लगभग एक दशक बाद पहली बार एक मिलियन टन कच्ची शक्कर के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी गई है।

महंगाई को सही तरीके से देखो

महंगाई को हम अक्सर गलत तरीके से देखते हैं। प्याज महंगा हुआ तो प्याज की चर्चा। टमाटर महंगा हुआ तो टमाटर की बहस। दाल महंगी हुई तो कुछ दिनों तक टीवी स्क्रीन पर दाल दिखाई गई और फिर मामला खत्म, लेकिन परिवार के खर्च का हिसाब क्या ऐसे होता है?

घर का बजट संभालने वाला व्यक्ति यह नहीं देखता कि केवल शक्कर 20 रुपये महंगी हुई है। वह देखता है कि दूध महंगा है, दाल महंगी है, तेल महंगा है, सब्जियां कभी सस्ती तो कभी अचानक महंगी हो जाती हैं, गैस सिलेंडर और ईंधन का असर अलग है और बच्चों की फीस, दवाइयां तथा बिजली का बिल भी उसी आय से निकलना है। महंगाई का संकट तब गहराता है जब आय उतनी तेजी से नहीं बढ़ती, जितनी तेजी से खर्च बढ़ते हैं। यही आकर सारी इकोनॉमिक्स घर में प्रवेश करती है।

किफ़ायत के चक्कर में पहले तो घर की चाय में शक्कर कम हो जाती है, फिर वह कभी कभार खरीदी जानेवाली मिठाई लेने से पहले सोचता है। फिर बाहर खाना कम करता है। फिर ब्रांडेड सामान छोड़कर सस्ता विकल्प चुनता है। और अंततः गैर-जरूरी खर्चों की सूची लंबी होती जाती है।

इसे अर्थशास्त्री ‘उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव’ कहते हैं औरआम आदमी एक ही वाक्य में कहता है – – ‘महीने भर का खर्चा चलाना मुश्किल हो गया है।’

घरेलू बजट की तीन बड़ी चिंताएं

शक्कर की बढ़ती कीमत इसलिए ज्यादा चर्चा में है क्योंकि यह हर घर की भावनात्मक और सांस्कृतिक जरूरत से जुड़ी चीज है। लेकिन असली दबाव तेल, दाल और दूध जैसी वस्तुओं से आ रहा है। सरसों, सूरजमुखी, सोया और अन्य खाद्य तेलों की कीमतें पहले ही घरेलू बजट पर भारी हैं। दालों की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। अरहर और उड़द जैसी रोजमर्रा की दालें कई परिवारों के लिए महंगी प्रोटीन बनती जा रही हैं।

दूध का सवाल तो और भी संवेदनशील है। बच्चे हों या बुजुर्ग, दूध कोई विलासिता नहीं है। लेकिन जब दूध, घी, मक्खन, पनीर और अन्य डेयरी उत्पाद महंगे होते हैं, तो पोषण भी महंगाई की मार में आ जाता है।

सरकार के जून 2026 के आर्थिक समीक्षा दस्तावेज ने भी संकेत दिया था कि खाद्य मुद्रास्फीति फिर मजबूत हो रही है। मई में खाद्य मुद्रास्फीति 4.8 प्रतिशत तक पहुंची थी और प्रोटीन-समृद्ध खाद्य पदार्थ, सब्जियां, फल, खाद्य तेल तथा प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ कीमतों के दबाव में योगदान कर रहे थे।

यानी महंगाई अब केवल टमाटर या कांदे की कहानी नहीं रही। दबाव धीरे-धीरे खाद्य वस्तुओं की कई श्रेणियों में फैल रहा है।

हलवाई को चीनी चाहिए। दूध चाहिए। घी चाहिए। ड्राई फ्रूट चाहिए। गैस और बिजली चाहिए। पैकेजिंग चाहिए। मजदूर चाहिए। इन सबकी लागत बढ़ेगी तो रसगुल्ला और बर्फी पुराने दाम पर नहीं मिलेंगे।

यही कहानी बिस्कुट कंपनी की है, बेकरी की है, आइसक्रीम की है और पैकेज्ड फूड बनाने वाली कंपनियों की भी। हाल के दिनों में तैयार खाद्य पदार्थों, मिठाइयों और स्नैक्स की कीमतों पर इनपुट और पैकेजिंग लागत का दबाव बने रहने की रिपोर्टें सामने आई हैं। इसका अर्थ है कि उपभोक्ता को केवल कच्चा सामान खरीदते समय ही नहीं, बाजार से तैयार चीजें खरीदते समय भी अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

कंपनियां ऐसे चूना लगाती हैं

यहां एक और दिलचस्प लेकिन परेशान करने वाली बात है। कंपनियां हमेशा कीमत बढ़ाकर ही महंगाई नहीं देतीं। कभी पैकेट छोटा कर देती हैं, कभी मात्रा कम कर देती हैं और कीमत वही रखती हैं। उपभोक्ता को लगता है कि दाम नहीं बढ़े, लेकिन वास्तव में प्रति ग्राम कीमत बढ़ चुकी होती है। इसे बाजार की भाषा में कुछ भी कहिए, आम आदमी की भाषा में यह सीधा हिसाब है—पहले 20 रुपये में ज्यादा मिलता था, अब कम मिलता है।

क्या यह 2027 सिर्फ ट्रेलर है? वैश्विक परिस्थितियां चिंता को और बड़ा बनाती हैं। जेपी मॉर्गन सहित वैश्विक वित्तीय संस्थानों और अर्थशास्त्रियों की चेतावनियों का केन्द्र दो बड़े जोखिम हैं – मौसम और ऊर्जा। अगर एल नीनो का प्रभाव गंभीर होता है और साथ ही ऊर्जा कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो खाद्य उत्पादन से लेकर परिवहन, सिंचाई, उर्वरक, पैकेजिंग और वितरण तक पूरी लागत श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। ऊर्जा कीमतों का झटका 2027 में वैश्विक मुद्रास्फीति को अपेक्षा से अधिक बनाए रख सकता है। भारत जैसे देशों को विशेष जोखिम इसलिए है क्योंकि यहां उपभोक्ता खर्च में खाद्य वस्तुओं का हिस्सा बड़ा है और कृषि मौसम के प्रति संवेदनशील है।

यह चेतावनी भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां महंगाई का अनुभव अमेरिका या यूरोप जैसा नहीं है। वहां पेट्रोल की कीमत बढ़ने से लोगों को झटका लगता है, भारत में आलू, प्याज, टमाटर, दाल, तेल और दूध की कीमत बढ़ना करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी बदल देता है।

एचएसबीसी के एक विश्लेषण में भी यह चिंता जताई गई है कि बढ़ता तापमान और मौसम संबंधी बदलाव भारत की खाद्य मुद्रास्फीति को प्रभावित करने में अधिक महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इसलिए 2027 की खाद्य महंगाई का सवाल कोई दूर की भविष्यवाणी भर नहीं है। उसका बीज आज की कीमतों में दिखाई देने लगा है। कभी महंगाई का कारण सूखा बताया जाता था। फिर बाढ़। फिर कमजोर मानसून। अब कहानी और जटिल हो गई है।

बहुत ज्यादा गर्मी फसल को नुकसान पहुंचाती है। बेमौसम बारिश खेतों को प्रभावित करती है। कम बारिश समस्या है, लेकिन गलत समय पर ज्यादा बारिश भी उतनी ही बड़ी समस्या हो सकती है। मौसम की अनिश्चितता अब कृषि के साथ-साथ महंगाई का भी बड़ा कारक बन रही है और कृषि लागत केवल खेत में तय नहीं होती।

डीजल महंगा होगा तो ट्रैक्टर की लागत बढ़ेगी। उर्वरक महंगा होगा तो खेती महंगी होगी। परिवहन महंगा होगा तो खेत से मंडी और मंडी से बाजार तक कीमत बढ़ेगी। पैकेजिंग महंगी होगी तो अंतिम उत्पाद महंगा होगा यानी किसान की लागत और उपभोक्ता की थाली के बीच एक लंबी श्रृंखला है। उस श्रृंखला की हर कड़ी महंगी हुई तो अंत में बिल ग्राहक ही चुकाता है।

तेल की आग और रसोई की आंच

अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में उछाल का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। पेट्रोल-डीजल महंगा तो माल ढुलाई महंगी। माल ढुलाई महंगी तो फल-सब्जी महंगी। ईंधन और ऊर्जा महंगी तो उद्योग की लागत बढ़ी। उद्योग की लागत बढ़ी तो पैकेज्ड सामान महंगा।

जून 2026 में भारत की खुदरा मुद्रास्फीति 4 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर पहुंची थी और खाद्य एवं ईंधन कीमतों में वृद्धि प्रमुख कारणों में शामिल थी।

जुलाई में खुदरा मुद्रास्फीति और बढ़कर 4.45 प्रतिशत तक पहुंच गई। रेटिंग एजेंसी आईसीआरए ने भी मानसून, खाद्य कीमतों और पश्चिम एशिया की परिस्थितियों को ऊपर की ओर जोखिम बताया है तथा सितंबर 2026 में मुद्रास्फीति के 5 प्रतिशत से ऊपर जाने की संभावना जताई है। सबसे बड़ी चिंता ‘सेकंड राउंड इफेक्ट’ की है।

आज तेल महंगा हुआ। कल ट्रांसपोर्ट महंगा होगा। परसों दूध और सब्जी महंगी होगी। उसके बाद रेस्तरां, मिठाई, बेकरी और पैकेज्ड फूड कीमतें बढ़ाएंगे। महंगाई की यही श्रृंखला सबसे खतरनाक होती है।

सरकार के पास महंगाई से लड़ने के कई उपाय हैं—बफर स्टॉक, आयात शुल्क में बदलाव, आवश्यक वस्तुओं की निगरानी, जमाखोरी के खिलाफ कार्रवाई और जरूरत पड़ने पर बाजार में हस्तक्षेप।

लेकिन हर बार संकट आने के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत की खाद्य नीति मौसम, उत्पादन, भंडारण और वितरण के नए दौर के लिए तैयार है? अगर हर साल किसी न किसी समय प्याज महंगा होगा, फिर टमाटर, फिर दाल, फिर चीनी और फिर खाद्य तेल—तो यह केवल मौसमी समस्या नहीं मानी जा सकती। यह आपूर्ति व्यवस्था की संरचनात्मक कमजोरी भी है।

भारत खाद्यान्न उत्पादन में बड़ी उपलब्धियों का देश है। फिर भी किसान को उचित मूल्य और उपभोक्ता को उचित कीमत—इन दोनों लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना लगातार कठिन साबित हो रहा है। किसान को कम दाम मिलें तो संकट। उपभोक्ता को ज्यादा दाम चुकाने पड़ें तो संकट। बीच में कौन जीतता है? अक्सर वही व्यवस्था, जो खेत और रसोई के बीच सबसे ज्यादा परतें जोड़ती है।

ब्याज दर बढ़ाने से क्या सब्जी ज्यादा उगती है?

ब्याज दर बढ़ाने से टमाटर की फसल नहीं बढ़ती। रेपो रेट बदलने से गन्ने की पैदावार नहीं बढ़ती। न ही ब्याज दर बढ़ाकर बारिश कराई जा सकती है। फिर भी अगर खाद्य महंगाई लंबे समय तक बनी रहती है तो उसका असर व्यापक महंगाई पर पड़ सकता है। मजदूर अधिक वेतन मांगेंगे, कंपनियां लागत बढ़ाएंगी, सेवाओं की कीमतें बढ़ेंगी और महंगाई धीरे-धीरे अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों में फैल सकती है।

इसीलिए केंद्रीय बैंक के सामने चुनौती दोहरी है – महंगाई को नियंत्रण में रखना और आर्थिक विकास को भी अनावश्यक झटका न देना। महंगाई बढ़ती है तो स्वाभाविक रूप से निगाहें भारतीय रिज़र्व बैंक की ओर जाती हैं लेकिन खाद्य महंगाई की अपनी एक अलग प्रकृति है। 19 अगस्त को जारी मौद्रिक नीति समिति की बैठक के विवरण में भी खाद्य, ईंधन और आपूर्ति संबंधी जोखिमों को लेकर चिंता दिखाई दी। लेकिन सबसे ज्यादा परेशानी किसे होगी?

महंगाई कभी अकेले नहीं आती। वह अपने साथ कई छोटे बिल लेकर आती है और भारत का विशाल मध्यमवर्ग तथा निम्न आय वर्ग इन्हीं छोटे-छोटे बिलों के नीचे दबता है। मिठास बचानी है तो सिर्फ शक्कर के दाम नहीं देखना होंगे। शक्कर का महंगा होना एक संकेत है। इसे केवल त्योहारों की अस्थायी महंगाई कहकर नजरअंदाज करना शायद भूल होगी। भारत को अगले कुछ वर्षों में खाद्य सुरक्षा की बहस को केवल अनाज उपलब्ध है या नहीं से आगे ले जाना होगा।

सवाल यह भी होना चाहिए कि क्या पौष्टिक भोजन आम आदमी की पहुंच में रहेगा? क्या दूध, दाल, फल और खाद्य तेल मध्यम आय वाले परिवार के बजट में बने रहेंगे? क्या जलवायु परिवर्तन और मौसम की अनिश्चितता के दौर में कृषि उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला को अधिक मजबूत बनाया जा सकता है? क्या महंगाई पर कार्रवाई तब होगी, जब मीडिया प्याज संकट ( या शक्कर संकट) का संगीत बजाना शुरू करें, या उससे पहले?

छोटी खबरें ही कई बार बड़े संकटों की घंटी होती हैं। आज चाय में चीनी कम हो रही है। कल शायद दाल की मात्रा कम हो और परसों परिवार का बजट किसी और चीज को गैर-जरूरी घोषित कर दे।

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना रह सकता है, शेयर बाजार नए रिकॉर्ड बना सकता है और विकास दर प्रभावशाली दिखाई दे सकती है। लेकिन विकास की असली परीक्षा सेंसेक्स की ऊंचाई से नहीं होती। वह उस रसोई में होती है जहां महीने के आखिरी सप्ताह में कोई पूछता है – इस बार खर्च इतना बढ़ कैसे गया? आगे क्या करेंगे?

अर्थव्यवस्था की सफलता का अंतिम पैमाना यही होना चाहिए कि विकास की मिठास आम आदमी की चाय तक पहुंचे सिर्फ आर्थिक आंकड़ों और कॉर्पोरेट मुनाफों तक नहीं।


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