रायपुर । छत्तीसगढ़ में निजी विश्वविद्यालयों को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश देने और डिग्री बांटने का रास्ता साफ करने की कोशिशों पर एक बार फिर पानी फिर गया है। भूपेश बघेल सरकार के कार्यकाल में जिस तरह चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए निजी विवि ( private universities) को अनुमति देने से इनकार कर दिया गया था, ठीक वैसा ही रुख एक बार फिर देखने को मिला है। पं. दीनदयाल उपाध्याय स्मृति स्वास्थ्य विज्ञान एवं आयुष विश्वविद्यालय, रायपुर ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि निजी विश्वविद्यालयों को मेडिकल कोर्स चलाने की अनुमति देने के लिए अधिनियम में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
वर्ष 2026 में क्यों उठा यह मामला?
उच्च शिक्षा विभाग की मंशा और निजी विश्वविद्यालयों के लगातार दबाव के बीच संचालक, चिकित्सा शिक्षा (DME) ने 10 जुलाई 2026 में एक पत्र के माध्यम से आयुष विश्वविद्यालय से औपचारिक राय मांगा था। मामला यह था कि क्या निजी विवि को हेल्थ एंड एलाइड साइंस, मेडिसिन, सर्जरी, आयुर्वेद, होम्योपैथी, पैरामेडिकल और नर्सिंग जैसे संवेदनशील पाठ्यक्रम संचालित करने की अनुमति दी जानी चाहिए? इसके लिए छत्तीसगढ़ आयुष एवं स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय अधिनियम 2008 की धारा 6(1) एवं 6(2) में संशोधन का प्रस्ताव रखा गया था।
घटनाक्रम – 2005 से 2026 तक की मुख्य कड़ियां
2005 एवं 2008 : राज्य में निजी विवि अधिनियम 2005 लागू होने के बाद 2008 में आयुष विवि अधिनियम पारित हुआ, जिसने प्रदेश में चिकित्सा शिक्षा का एकाधिकार आयुष विवि को सौंपा।
28 अप्रैल 2017 : बिलासपुर उच्च न्यायालय ने कलिंगा विवि की याचिका खारिज कर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों पर कड़े नियमों की नजीर पेश की।
05 जुलाई 2022 : उच्च शिक्षा विभाग द्वारा निजी विवि में पैरामेडिकल व नर्सिंग खोलने की अधिसूचना का चिकित्सा जगत ने पुरजोर विरोध किया।
11 अक्टूबर 2022 : आयुष विवि के प्रबंधन बोर्ड ने सर्वसम्मति से निजी विवि को NOC न देने का प्रस्ताव पारित किया।
20 मार्च 2023 : तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंहदेव के संज्ञान में मामला आने पर जनहित में इस प्रयास को रोक दिया गया था।
30 सितंबर 2025 : उच्च शिक्षा विभाग ने भारती विवि को सशर्त अनुमति तो दी पर आयुष विवि की पूर्वानुमति अनिवार्य रखी।
31 जुलाई व 06 अगस्त 2026 : कार्यसमिति की बैठक के बाद आयुष विवि के कुलसचिव ने DME को पत्र लिखकर अधिनियम में संशोधन से साफ इनकार कर दिया।
कुलसचिव द्वारा शासन को भेजे पत्र में प्रस्ताव खारिज करने के मुख्य कारण
आयुष विवि ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि 2008 के अधिनियम के तहत उसकी बिना पूर्व अनुमति के कोई भी अन्य संस्थान चिकित्सा शिक्षा का संचालन नहीं कर सकता। इसके साथ ही, चिकित्सा शिक्षा विभाग का अपना पृथक अस्तित्व है, जिस पर उच्च शिक्षा विभाग का कोई प्रशासनिक या नीतिगत नियंत्रण नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP) का हवाला देते हुए भी विवि ने तर्क दिया कि इसके तहत चिकित्सा, कानून और कृषि शिक्षा को सामान्य उच्च शिक्षा से अलग और विशिष्ट श्रेणी में रखा गया है।
अन्य राज्यों की व्यवस्था और जनहित का जिक्र करते हुए विवि ने बताया कि आंध्र प्रदेश व कर्नाटक की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी चिकित्सा शिक्षा के नियमन और सम्बद्धता के लिए एक ही शासकीय विश्वविद्यालय पूरी तरह पर्याप्त है। पर्याप्त प्रैक्टिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के बिना निजी विश्वविद्यालयों में कोर्स शुरू करने से ये संस्थान ‘डिग्री शॉपिंग मॉल’ बनकर रह जाएंगे, जिससे प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं और जनहित पर गंभीर असर पड़ेगा। इसके अलावा, कृषि शिक्षा को लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट का सख्त रुख और भारती विवि की लंबित याचिका भी इस निर्णय का मुख्य आधार बनी।
अंततः आयुष विवि के प्रबंधन बोर्ड और कार्यसमिति के सर्वसम्मत फैसले ने यह साफ कर दिया है कि राज्य में चिकित्सा शिक्षा को व्यावसायिक होने से बचाने के लिए 2008 के अधिनियम में कोई संशोधन नहीं किया जाएगा।









