बोधघाट परियोजना के विरोध में जुटे 1000 से अधिक ग्रामीण, बोले- जान दे देंगे, जमीन नहीं देंगे

बस्तर| बारसुर इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना के विरोध में रविवार को बारसूर थाना क्षेत्र के हिताल कुड़ुम गांव में डुबान क्षेत्र के 18 पंचायतों के 56 गांवों से आए 1000 से अधिक ग्रामीण एकत्र हुए। ग्रामीणों ने एक स्वर में परियोजना का विरोध करते हुए स्पष्ट कहा कि वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन और जंगल नहीं छोड़ेंगे।

इस दौरान ग्रामीण अपने पारंपरिक देवी-देवताओं के साथ पहुंचे और परियोजना के खिलाफ एकजुटता का प्रदर्शन किया। ग्रामीणों ने भावुक होकर बोले कि “जान दे देंगे, लेकिन जमीन नहीं देंगे। यदि सरकार परियोजना लागू करना चाहती है तो पहले डुबान क्षेत्र के सभी ग्रामीणों को एक साथ खड़ा कर गोली मार दे।”

गौरतलब है कि हाल ही में दंतेवाड़ा जिले के चेरपाल में आयोजित सुशासन तिहार शिविर के दौरान मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बोधघाट परियोजना को लेकर कहा था कि यह लंबे समय से प्रस्तावित योजना है, जिससे लगभग 7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई, 200 मेगावाट बिजली उत्पादन और 4 हजार टन से अधिक मत्स्य उत्पादन की संभावना है। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि सरकार प्रभावित लोगों से चर्चा और उनके पुनर्वास के बाद ही आगे का निर्णय लेगी। मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों में परियोजना को लेकर चिंता और आशंकाएं बढ़ गई हैं।

आंदोलन को समर्थन देने बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी सहित कांग्रेस के पूर्व विधायक रेखचंद जैन, राजमन बेंजाम, देवती कर्मा और चंदन कश्यप समेत कई वरिष्ठ कांग्रेस नेता कार्यक्रम में शामिल हुए। नेताओं ने ग्रामीणों की मांगों का समर्थन करते हुए कहा कि प्रभावित लोगों की सहमति के बिना किसी भी परियोजना को लागू नहीं किया जाना चाहिए।

ग्रामीणों का दावा है कि बोधघाट परियोजना के लागू होने पर 18 पंचायतों के 56 गांव डुबान क्षेत्र में आ जाएंगे तथा लगभग 16 हजार हेक्टेयर जंगल प्रभावित होगा। इससे हजारों आदिवासी परिवारों के विस्थापन और उनकी आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

पूर्व विधायक चंदन कश्यप ने कहा कि नक्सलवाद समाप्त करने की बात एक बहाना है, जबकि वास्तविक उद्देश्य आदिवासियों को जंगलों से विस्थापित कर उद्योगों के लिए रास्ता तैयार करना है।

वहीं बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी ने आरोप लगाया कि बोधघाट परियोजना का मुख्य उद्देश्य उद्योगपतियों के कारखानों के लिए पानी की व्यवस्था करना है। उन्होंने कहा कि यदि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को लगता है कि इस परियोजना से बस्तर की जनता का भला होगा, तो उन्हें स्वयं बस्तर आकर जनता के बीच अपनी बात रखनी चाहिए।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 1979 से प्रस्तावित बोधघाट जल विद्युत परियोजना विभिन्न कारणों से लंबित रही है। पिछले चार दशकों में राज्य और केंद्र सरकारों ने कई बार इसे आगे बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन स्थानीय स्तर पर लगातार हो रहे विरोध के चलते यह परियोजना विवादों में बनी रही। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि उनकी सहमति के बिना परियोजना को आगे बढ़ाने के किसी भी प्रयास का वे हर स्तर पर विरोध करेंगे।

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