रायपुर। छत्तीसगढ़ में पेट्रोल-डीजल (Petrol Crisis) को लेकर पिछले तीन दिनों में जो हालात बने, उन्होंने सरकार और प्रशासन के दावों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सिर्फ सवाल ही नहीं बल्कि दावों की पोल भी खोल दी है।
एक तरफ मुख्यमंत्री विष्णु देव साय यह कह रहे कि प्रदेश में पेट्रोल और डीजल की कोई कमी नहीं है, सभी ऑयल डिपो में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और सप्लाई व्यवस्था पूरी तरह सुचारू है। दूसरी तरफ राजधानी रायपुर समेत प्रदेश के कई शहरों में पेट्रोल पंपों पर आधा-आधा किलोमीटर लंबी लाइनें लगी रहीं, कई पंपों पर ‘नो पेट्रोल’ के बोर्ड नजर आए और लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ा।
अब सवाल यही उठ रहा है कि अगर प्रदेश में किसी तरह का संकट नहीं था, तो फिर जनता तीन दिनों तक परेशान क्यों रही? आखिर ऐसा क्या हुआ कि प्रधानमंत्री की एक अपील के बाद पूरे सिस्टम में अचानक हलचल मच गई और प्रदेशभर में अफरा-तफरी जैसे हालात बन गए?
पूरा घटनाक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस अपील से शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने देशवासियों से पेट्रोल-डीजल का अनावश्यक इस्तेमाल कम करने, ईंधन का संग्रहण न करने और अफवाहों से बचने की बात कही थी। लेकिन इस अपील के बाद लोगों के बीच यह आशंका तेजी से फैलने लगी कि आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं या सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
इसके बाद प्रदेशभर में पैनिक बाइंग शुरू हो गई। जो लोग सामान्य दिनों में 100-200 रुपए का पेट्रोल भरवाते थे, वे फुल टैंक करवाने पहुंचने लगे। कई लोगों ने अतिरिक्त पेट्रोल और डीजल स्टोर करना भी शुरू कर दिया। अचानक बढ़ी डिमांड का असर सीधे पेट्रोल पंपों पर दिखाई देने लगा। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग समेत कई शहरों में लंबी कतारें लग गईं। कई जगह पेट्रोल खत्म हो गया और कुछ पेट्रोल पंपों को अस्थायी रूप से बंद तक करना पड़ा। ग्रामीण इलाकों में स्थिति और ज्यादा खराब दिखाई दी।

सबसे हैरानी की बात यह रही कि लगातार तीन दिनों तक प्रदेशभर में लोग परेशान होते रहे, लेकिन सरकार या प्रशासन की तरफ से कोई मजबूत और स्पष्ट संदेश सामने नहीं आया। न कोई मंत्री हालात देखने सड़क पर उतरा, न कोई बड़ा अधिकारी जनता को भरोसा दिलाता नजर आया। लोग सोशल मीडिया और अफवाहों के आधार पर ही स्थिति समझने की कोशिश करते रहे।
जब हालात ज्यादा बिगड़ने लगे, तब गुरुवार को रायपुर कलेक्टर गौरव सिंह ने पेट्रोल पंप एसोसिएशन और तेल कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। बैठक के बाद प्रशासन ने दावा किया कि प्रदेश में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और संकट सप्लाई का नहीं बल्कि पैनिक बाइंग का है।
अधिकारियों ने कहा कि अचानक फुल टैंक करवाने की वजह से दबाव बढ़ गया है। यानी प्रशासन ने पहली बार सार्वजनिक रूप से माना कि खपत अचानक कई गुना बढ़ गई है।
प्रशासन के दावों ने यह सवाल भी खड़े कर दिया कि अगर डिपो में पर्याप्त स्टॉक था, तो फिर पेट्रोल पंप खाली क्यों हो रहे थे?
इतना ही नहीं पेट्रोल कंपनियों के डिपो से सीधे खरीदी करने वाले इंडस्ट्रियल कस्टमरों ने पेट्रोल पंप से पेट्रोल डीजल लेना शुरू कर दिया, क्योंकि उन्हें अब डिपो से महंगा फ्यूल मिल रहा है। इसका दबाव पेट्रोल पंपों पर पड़ने लगा और कैपेसिटी से ज्यादा फ्यूल खपत होने लगी।
इसे लेकर जानकारी सामने आई कि कई पेट्रोल पंपों तक समय पर टैंकर नहीं पहुंच पा रहे थे। कहीं भुगतान और सप्लाई से जुड़ी दिक्कतें थीं, तो कहीं अचानक बढ़ी डिमांड के कारण टैंकरों पर दबाव बढ़ गया था। यानी स्टॉक मौजूद होने के बावजूद सप्लाई चेन सामान्य तरीके से काम नहीं कर पा रही थी।
इसी बीच गुरुवार देर रात मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का बयान सामने आया। मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पेट्रोल और डीजल का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है और लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं है। उन्होंने दावा किया कि सभी ऑयल डिपो में नियमित सप्लाई जारी है और वितरण व्यवस्था पूरी तरह सुचारू है। साथ ही लोगों से अफवाहों से बचने और जरूरत के मुताबिक ही ईंधन लेने की अपील की गई।
लेकिन, मुख्यमंत्री के बयान के कुछ ही घंटों बाद पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ गए।
इसके बाद विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिल गया। कांग्रेस के पूर्व विधायक विकास उपाध्याय ने आरोप लगाया कि जब तीन दिनों तक लोग परेशान थे तब सरकार और प्रशासन मौन रहे, लेकिन जैसे ही दाम बढ़ने वाले थे, अचानक बैठकें और बयान शुरू हो गए। उन्होंने इसे जमाखोरी और सुनियोजित स्थिति बनाने का आरोप बताया।
प्रशासन का दावा है कि डिपो से 24 घंटे टैंकर सप्लाई शुरू कर दी गई है। लगातार पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति बढ़ाई जा रही है। दाम बढ़ने के बाद सप्लाई में तेजी का दावा तो किया गया, लेकिन शुक्रवार सुबह से कई शहरों में पेट्रोल पंपों पर भीड़ बढ़ती ही चली गई।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर प्रदेश में पेट्रोल-डीजल की कोई कमी नहीं थी, तो फिर तीन दिनों तक जनता को लंबी लाइनों में क्यों खड़ा रहना पड़ा? मुख्यमंत्री के दावों और पेट्रोल पंपों की जमीनी तस्वीरों के बीच यही अंतर अब राजनीतिक और प्रशासनिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है।







