मजदूरों के आंदोलन के साथ खड़े हुए लेखक-कलाकार, जानिए संयुक्‍त बयान में क्‍या कहा?

Joint Statement

लेंस डेस्‍क। देश भर के लेखकों और कलाकारों ने मजदूरों के चल रहे आंदोलन का पूरा समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि गुड़गांव-मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, भिवाड़ी और पानीपत जैसे इलाकों में लाखों मजदूर बेहद कम वेतन और खराब हालात के खिलाफ सड़कों पर उतर आए हैं।

अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान ‘हम देखेंगे‘ की ओर जारी संयुक्‍त बयान में कहा गया है कि  मजदूर 10 से 12 हजार रुपये महीना लेकर 8 से 13 घंटे तक काम करते हैं। कोई छुट्टी नहीं, खाना घटिया और हर कदम पर अपमान सहना पड़ता है। महंगाई और बढ़ते गैस दामों ने उनकी मजबूरी को और बढ़ा दिया। वे अब सिर्फ उचित वेतन और अपने कानूनी अधिकार की मांग कर रहे हैं।

अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान में जनवादी लेखक संघ (जलेस),  दलित लेखक संघ (दलेस), जन संस्कृति मंच (जसम),  प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस), अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच (अभादलम), न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव (एनएसए), प्रतिरोध का सिनेमा, जन नाट्य मंच (जनम) और इप्टा शामिल है।

लेखकों-कलाकारों ने कहा कि यह आंदोलन किसी के उकसावे से नहीं, बल्कि लंबे समय से हो रहे शोषण और वादाखिलाफी का नतीजा है। एक तरफ सरकार देश को तेजी से विकसित होने का दावा कर रही है, दूसरी तरफ मजदूर भूखमरी के कगार पर हैं। न्यूनतम वेतन इतना कम है कि उसे भुखमरी वेतन कहा जा सकता है, फिर भी कई फैक्ट्री मालिक उसे भी नहीं देना चाहते।

9 अप्रैल को मानेसर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मजदूरों पर पुलिस और भाड़े के गुंडों ने लाठीचार्ज किया। 55 मजदूरों को गिरफ्तार कर उन पर गंभीर धाराएं लगाई गईं। इनमें 20 महिलाएं भी थीं। नोएडा में भी सैकड़ों मजदूरों को गिरफ्तार किया गया। कई कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और लेखकों को भी हिरासत में लिया गया।

लेखक-कलाकारों ने इस दमन की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि हड़ताल करना और यूनियन बनाना संविधान का मौलिक अधिकार है, लेकिन सरकार इसे अपराध बता रही है। नये लेबर कोड मजदूरों को और गुलाम बनाने की साजिश है।

क्‍या हैं प्रमुख मांगें

  • सभी गिरफ्तार मजदूरों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और लेखकों को तुरंत रिहा किया जाए
  • फर्जी। मुकदमे वापस लिए जाएं
  • हिंसा की निष्पक्ष जांच हो और दोषियों पर कार्रवाई हो
  • चारों नये लेबर कोड रद्द किए जाएं
  • न्यूनतम वेतन 30,000 रुपये प्रतिमाह किया जाए
  • ठेका प्रथा खत्म हो और स्थायी काम पर स्थायी नौकरी दी जाए

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