नेशनल ब्यूरो। नई दिल्ली
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मूक बधिर यौन शोषण पीड़िता की गवाही दर्ज करने के लिए प्लास्टिक डॉल का प्रदर्शन और दुभाषिए की मदद लेने का ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया है। एक यौन शोषण पीड़िता की गवाही प्लास्टिक डॉल और दुभाषिए की मदद से दर्ज करने के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में इसे वैध ठहराया और आरोपी को दी गई उम्रकैद तक की सजा को बरकरार रखा।
दोषी की सजा बरकरार
कोर्ट ने फैसला दिया कि इस विशेष तरीके से सबूत इकट्ठा करने की प्रक्रिया ने पीड़िता की गवाही को विश्वसनीय बनाया और आरोपी की दोषसिद्धि को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त माना।मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की पीठ आरोपी की अपील पर सुनवाई कर रही थी। आरोपी ने मार्च 2023 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि को चुनौती दी थी।
जजों के आदेश से लाई गई गुड़िया
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि कोई गवाह मूक और बधिर है, उसकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने अपने 16 मार्च के आदेश में कहा, “जब पीड़िता अपनी जांच के दौरान कुछ सवालों को स्पष्ट रूप से समझ नहीं पा रही थी, तब ट्रायल कोर्ट ने संचार को आसान बनाने के लिए प्लास्टिक डॉल लाकर एक उचित तरीका अपनाया।”
कैसे हुआ यह अनोखा ट्रायल
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की विकलांगता के बारे में अपने अवलोकन दर्ज किए और दुभाषिए तथा प्लास्टिक डॉल की मदद से उसकी जांच जारी रखी, ताकि गवाही दर्ज करने में निष्पक्षता और स्पष्टता बनी रहे।ट्रायल कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि हालांकि पीड़ित मूक बधिर है, लेकिन रिकॉर्ड पर कोई ऐसा सबूत नहीं है जो यह साबित करता हो कि उसे कोई मानसिक असामान्यता है, जिससे वह घटना को समझने या उसे व्यक्त करने में असमर्थ हो।
ट्रायल कोर्ट को दिया गया आदेश
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट में यह तरीके इस्तेमाल करने से विश्वसनीयता का आकलन करने के तरीके में कोई दिक्कत नहीं है।पीड़िता की गवाही पूर्ण विश्वास जगाती है और यह विश्वसनीय मौलिक सबूत है, जो आरोपी के खिलाफ दर्ज दोषसिद्धि की नींव है।सबूतों से यह भी पता चलता है कि घटना के तुरंत बाद जब उसकी मां खेत से काम करके घर लौटी, तो पीड़िता परेशान और रोती हुई हालत में मिली।हाईकोर्ट ने कहा कि जब उससे पूछा गया, तो उसने इशारों से घटना बताई और आरोपी का नाम लिया, जो उसका करीबी रिश्तेदार है और उसी गांव में रहता है।यह त्वरित खुलासा उसकी गवाही की सच्चाई को साबित करने वाली है।
शिकायतकर्ता ने क्या कहा
ट्रायल कोर्ट में पीड़िता के इशारे और बयान FIR में दर्ज बयान तथा जांच के दौरान दिए गए उसके पहले बयान के अनुरूप पाए गए।हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने जन्म से ही सुनने और बोलने में अक्षम पीड़िता की गवाही को सही ढंग से सराहा है। यह अच्छी तरह स्थापित सिद्धांत है कि सिर्फ इसलिए कि कोई गवाह बहरा और गूंगा है, उसकी गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता
किसी सक्षम दुभाषिए की मदद से इशारों या संकेतों के माध्यम से दी गई गवाही स्वीकार्य है और अगर वह विश्वास जगाती है तो दोषसिद्धि का आधार बन सकती है।शिकायतकर्ता (पीड़िता की मां) ने लिखित रिपोर्ट दर्ज कराई जिसमें कहा गया कि उसकी बेटी, जो जन्म से बहरा और गूंगा है और केवल अपना नाम और गांव के बारे में बहुत कम बोल सकती है, जुलाई 2020 में अपनी मां के देवर द्वारा कथित तौर पर यौन शोषण का शिकार हुई।








