रायपुर। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर (Balrampur) में आदिवासी शख्स की कथित पीट-पीट कर हत्या के मामले ने तूल पकड़ लिया है। प्रशासन ने इस प्रकरण में एसडीएम समेत चार आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन नायब तहसीलदार पारस शर्मा पर अब तक कोई कार्रवाई न होना गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
एफआईआर दर्ज हुई। गिरफ्तारियां भी हुईं। लेकिन घटना में कथित रूप से शामिल नायब तहसीलदार पारस शर्मा पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। आखिर क्यों?
मामले को लेकर स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश है। आरोप है कि घटना के दौरान नायब तहसीलदार की भूमिका भी संदिग्ध रही, बावजूद इसके उनके खिलाफ न तो कोई एफआईआर दर्ज की गई है और न ही उन्हें पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है।
उनका कहना है कि अगर एसडीएम और अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया जा सकता है, तो नायब तहसीलदार को क्यों बचाया जा रहा है? क्या कानून सबके लिए बराबर नहीं है?
इस मामले में जो चर्चा है, वह यह कि नायब तहसीलदार पारस शर्मा को बचाने की सरकारी कोशिशें चल रहीं हैं। इसकी वजह है कि पारस शर्मा को प्रदेश सरकार के बेहद करीबी अधिकारियों में गिना जाता है और उनका परिवार वर्षों से भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा रहा है।
ऐसे में विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि क्या राजनीतिक संबंधों के कारण कार्रवाई रोकी जा रही है?
घटना के बाद इलाके में तनाव की स्थिति बनी हुई है। आदिवासी समुदाय के लोगों ने निष्पक्ष जांच और सभी दोषियों के खिलाफ समान कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि यदि एसडीएम और अन्य अधिकारियों को गिरफ्तार किया जा सकता है, तो नायब तहसीलदार को बचाने की कोशिश क्यों की जा रही है?
दरअसल, राजस्व अधिकारियों का दल रविवार देर शाम अवैध बक्साइट उत्खनन की सूचना पर हंसपुर पहुँचा था। रात करीब 8 बजे वह सरना के पास पहुंचा, जहाँ उन्होंने तीन ग्रामीणों को रोका।
घायलों ने बताया कि वे अपने खेतों में गेहूँ की सिंचाई करके लौट रहे थे। तभी टीम के लोगों ने उन्हें डंडों, रॉड और लातों से कड़ी निहायत मारपीट कर दी। उन्हें तत्काल वाहन में बैठाकर कुसमी लाया गया। रास्ते में राम नरेश राम (60 वर्ष) बेहोश हो गए, जिन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लाया गया, जहाँ इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। अन्य दो घायल अजीत उरांव (60 वर्ष) व आकाश अगरिया (20 वर्ष) अब खतरे से बाहर हैं।
कानून एक्सपर्ट कहते हैं कि यह मामला सिर्फ एक हत्या का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता की कसौटी बन गया है। यदि आरोपों में सच्चाई है, तो दोषी चाहे किसी भी पद पर हो, उसे कानून के कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।
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