रायपुर। छत्तीसगढ़ के बलरामपुर (Balrampur) में एक आदिवासी बुजुर्ग की मौत ने पूरे प्रदेश की राजनीति में आग लगा दी है। कुसमी थाना क्षेत्र के हंसपुर गांव में जो हुआ, उसने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है।
कथित अवैध खनन की जांच के नाम पर राजस्व टीम पहुंची और उसके बाद 60 वर्षीय आदिवासी राम नरेश राम की मौत हो गई।
आरोप सीधे-सीधे प्रशासन पर हैं। आरोप है कि कुसमी के एसडीएम करुण डहरिया, नायब तहसीलदार पारस शर्मा और उनके साथ मौजूद लोगों ने ग्रामीणों की बेरहमी से पिटाई की। लाठी, डंडे, लात-घूंसे और फिर जबरन गाड़ी में बैठाकर ले जाया गया।
रास्ते में तबीयत बिगड़ी अस्पताल पहुंचते ही मौत।
हत्या के मामले में एसडीएम करुण डहरिया, भाजपा युवा मोर्चा नेता अजय प्रताप सिंह, मंजीत कुमार यादव और सुदीप को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), 115(2) और 3(5) के तहत मामला दर्ज हुआ।
एफआईआर में नायब तहसीलदार पारस शर्मा का नाम नहीं है। इस पर ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि पारस शर्मा को जानबूझकर बचाया जा रहा है।
यह दावा किया जा रहा है कि नायब तहसीलदार एक प्रभावशाली मंत्री के रिश्तेदार हैं। जिसकी वजह से उन्हें बचाया जा रहा है।
एफआईआर में नायब तहसीलदार का नाम शामिल नहीं किए जाने पर गुस्साए ग्रामीण शव को श्मशान में ले गए। लेकिन वहां अंतिम संस्कार नहीं किया।
बीच बाजार में थाने के सामने धरना शुरू कर दिया। देखते ही देखते चक्का जाम हो गया। पूरा इलाका बंद हो गया। भारी पुलिस बल तैनात हो गई।
ग्रामीणों की मांग है कि जब तक एफआईआर में पारस शर्मा और अन्य कथित आरोपियों के नाम नहीं जोड़े जाएंगे, आंदोलन जारी रहेगा।
ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके में अवैध खनन एसडीएम के संरक्षण में चल रहा था। जब शिकायत हुई, तो शिकायतकर्ताओं पर ही कहर बरपा दिया गया।
ये वही एसडीएम करुण डहरिया हैं, जिन्हें 2022 में एंटी करप्शन ब्यूरो ने 20 हजार रुपये की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा था।
बलरामपुर में एक करोड़ रुपए मुआवजा और परिवार के एक सदस्य को नौकरी की मांग उठ रही है। इसके अलावा निष्पक्ष जांच की भी मांग हो रही है।
मामला अब राजधानी तक पहुंच चुका है। रायपुर में कांग्रेस सड़कों पर उतर आई। राजीव गांधी चौक पर शहर कांग्रेस ने जिला अध्यक्ष श्रीकुमार मेनन के नेतृत्व में भाजपा नेता अजय प्रताप सिंह और कथित प्रशासनिक आतंकवाद का पुतला दहन किया गया।
कांग्रेस का आरोप है कि खनन माफिया पूरे प्रदेश में आदिवासी परिवारों को प्रताड़ित कर रहे हैं। सरगुजा, रायगढ़, बस्तर और खदान क्षेत्रों में लौह अयस्क और बॉक्साइट की आड़ में मूल निवासियों पर दबाव बनाया जा रहा है। खनन माफियाओं की वजह से आदिवासियों को प्रशासनिक तौर पर प्रताड़ित करने के आरोप सरकार पर लग रहे हैं। तो वहीं मारपीट में शामिल रहे एक नायब तहसीलदार को बचाने की कोशिश हो रही है।
इस मामले में छत्तीसगढ़ के पूर्व महाधिवक्ता सतीश चंद्र वर्मा ने कहा है कि अगर साक्ष्य मौजूद थे, तो एफआईआर में नाम शामिल करना चाहिए था। आगे की जांच और फैसला अदालत करती।
यह बयान सीधा-सीधा उस सवाल को मजबूती देता है कि क्या किसी को बचाने की कोशिश हो रही है?
क्या प्रशासन सच में निष्पक्ष है? या सत्ता का दबाव हावी है? क्या प्रभावशाली रिश्तों की वजह से कानून की धाराएं कमजोर हो रही हैं? या फिर इस बार सच सामने आएगा?
बलरामपुर की आग अब राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। सड़क से लेकर सदन तक यह गूंजने वाली है।
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