नई दिल्ली। कस्टडी में हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने छत्तीसगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने मामले में कार्रवाई में हुई देरी और जांच के तरीके पर सवाल उठाते हुए राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) अरुण देव गौतम को ‘पूरी तरह अयोग्य’ तक करार दिया।
यह टिप्पणी जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसे मृतक श्रवण सूर्यवंशी की पत्नी और दो बेटियों ने दायर किया है। परिवार का आरोप है कि पुलिस हिरासत में प्रताड़ना के कारण उनके पति और पिता की मौत हुई थी।
मामला जनवरी 2024 का है। 18 जनवरी 2024 को बिलासपुर जिले की सीपत पुलिस ने श्रवण सूर्यवंशी को आबकारी एक्ट के तहत 12 सौ रुपए की कच्ची महुआ शराब के मामले में गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के बाद उसे केंद्रीय जेल बिलासपुर भेज दिया गया। 21 जनवरी को उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे सिम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी की सुबह इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।
आरोप है कि हिरासत में मौत होने के बावजूद पुलिस ने लगभग ढाई साल बाद 30 जुलाई 2026 को FIR दर्ज की। इसी देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
परिवार पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचा था, जहां निष्पक्ष जांच और 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की गई थी। हालांकि हाईकोर्ट ने जांच के निर्देश दिए बिना केवल 1 लाख रुपये का मुआवजा देकर मामला निपटा दिया।
बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसने पहले ही टिप्पणी की थी कि 1 लाख रुपये का मुआवजा ‘पूरी तरह अपर्याप्त’ है और परिवार को हुए नुकसान के अनुरूप नहीं है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के गृह सचिव और DGP को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का निर्देश दिया था। DGP ने अदालत को बताया कि जांच के आदेश दे दिए गए हैं और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। लेकिन, अदालत इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई।
DGP के जवाब पर नाराज हुआ कोर्ट
जब DGP ने FIR दर्ज करने में देरी का कारण न्यायिक जांच रिपोर्ट समय पर नहीं मिलने को बताया, तो जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि वही रिपोर्ट राज्य सरकार के हलफनामे के साथ पहले से हाईकोर्ट में रिकॉर्ड पर मौजूद थी।
इस पर अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘हर पहलू पर कोर्ट को गुमराह किया जा रहा है।’
जब DGP ने यह भी कहा कि उपलब्ध रिपोर्ट से कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता, तो जस्टिस मेहता ने सवाल किया कि ‘कुंद हथियार से सिर पर चोट लगने से मौत का क्या मतलब है? हमें बताइए।’
इसके बाद अदालत ने कहा कि ‘हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह से अयोग्य हैं।’
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि राज्य पुलिस निष्पक्ष जांच करने में सक्षम नहीं दिखती है, तो मामले की जांच किसी अन्य एजेंसी को सौंपी जा सकती है।
अदालत ने कहा कि अब यह तय करना होगा कि जिम्मेदारी तय करने का काम राज्य पुलिस करे या किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपा जाए।
क्या है पूरा मामला?
मृतक, जिसकी उम्र 34 वर्ष थी, को 18 जनवरी 2024 को अपनी किराना दुकान के सामने कथित रूप से करीब 1200 रुपये की शराब बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
तीन दिन बाद उसकी तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां 21 जनवरी 2024 को उसकी मौत हो गई।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में कहा था कि गिरफ्तारी के समय मेडिकल जांच में कोई गंभीर चोट नहीं मिली थी। हालांकि बाद में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176 के तहत हुई न्यायिक जांच में यह निष्कर्ष सामने आया कि मौत सिर पर कुंद हथियार से लगी चोट के कारण हुई जटिलताओं से हुई थी।








