लेंस ब्यूरो। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि लगातार सरकारें ऐसा कानून बनाने में विफल रही हैं, जिससे चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से काम कर सके।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण से पूछा कि ‘बारनवाल फैसले से पहले संसद ने कानून क्यों नहीं बनाया?’
कोर्ट 2023 के अनूप बारनवाल वर्सेस भारत सरकार फैसले का जिक्र कर रहा था, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया गया था। रिट याचिका (सिविल) 104/2015 पर 2023 में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया था।
प्रशांत भूषण ने जवाब में कहा कि हर सरकार ने कानून की अनुपस्थिति का फायदा उठाया ताकि नियुक्तियों पर नियंत्रण बना रहे। उन्होंने कहा, ‘जब विपक्ष में रहते हैं तो स्वतंत्र संस्था की बात करते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही भूल जाते हैं।’
इस दौरान जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी की, ‘यह निर्वाचित लोगों की तानाशाही जैसा है।’ वहीं जस्टिस शर्मा ने कहा, ‘बहुमत की तानाशाही।’
कोर्ट ने यह भी कहा कि जो भी सरकार सत्ता में आती है, वही काम करती है और यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।
जस्टिस दत्ता ने डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान लागू होने के तीन साल बाद ही उन्होंने कहा था कि देश में लोकतंत्र सही तरीके से काम नहीं कर रहा।
याचिकाओं में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) एक्ट, 2023 को चुनौती दी गई है। इस कानून के तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता को शामिल किया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इसमें स्वतंत्र नियुक्ति तंत्र नहीं है और यह निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत के खिलाफ है।
वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया ने कोर्ट से कहा कि संविधान की मूल भावना स्वतंत्र चुनाव आयोग की मांग करती है। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने तर्क दिया कि जब यह कानून संसद में पारित हुआ, तब 141 विपक्षी सांसद निलंबित थे।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाओं में तकनीकी खामियों पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट में इस तरह याचिकाएं दायर की जाती हैं? यह तरीका सही नहीं है।’
प्रशांत भूषण ने दलील दी कि सरकार चुनाव आयोग की नियुक्तियों में ‘पूर्ण नियंत्रण’ चाहती है और यह सुप्रीम कोर्ट के बारनवाल फैसले की भावना को कमजोर करता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह कानून रद्द भी हो गया तो सरकार किसी अन्य रूप में वही व्यवस्था वापस ला सकती है।
वहीं पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारिख ने कहा कि लोकतंत्र का भविष्य स्वतंत्र चुनाव आयोग पर निर्भर करता है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह सुझाव भी दिया कि प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के अलावा तीसरे सदस्य के तौर पर ऐसा व्यक्ति शामिल किया जा सकता है, जिसकी नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद हो।
मामले की अगली सुनवाई 14 मई को होगी।
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