नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को नोटिस जारी कर दिया है
बुधवार ममता बनर्जी ने खुद अदालत में पेश होकर अपनी बात रखी। उन्होंने दावा किया कि यह प्रक्रिया समावेशी नहीं है, बल्कि विभाजनकारी साबित हो रही है और बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोलते हुए इसे “व्हाट्सएप आयोग” कहकर संबोधित किया और आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल को विशेष रूप से निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने पूछा कि असम में ऐसी ही प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई जा रही है।
उनका कहना था कि आयोग आधार कार्ड जैसे दस्तावेजों को मान्य नहीं कर रहा और लोगों से अतिरिक्त प्रमाण मांग रहा है। कई जीवित व्यक्तियों को भी मृत घोषित कर दिया गया है। ममता ने अदालत से लोकतंत्र की रक्षा करने की अपील की और कहा कि आम लोगों को काफी परेशानी हो रही है, अनियमितताएं हो रही हैं। उन्होंने कई पत्र मुख्य चुनाव आयुक्त को लिखे होने की बात भी बताई।
वरिष्ठ वकील श्याम दिवान ने कोर्ट को अवगत कराया कि लाखों मतदाताओं का पुनरीक्षण अभी बाकी है और सुधार के लिए बहुत कम समय बच रहा है।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि पश्चिम बंगाल सरकार इस प्रक्रिया में सहयोग नहीं कर रही है। राज्य स्तर पर निचले स्तर के कर्मचारियों (जैसे तृतीय श्रेणी अधिकारी और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता) को नियुक्त किया जा रहा है, जिनके पास दस्तावेज सत्यापन का अधिकार नहीं है, इसलिए माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े हैं। सॉलिसिटर जनरल ने आरोपों को अनुचित बताते हुए कहा कि राज्य सरकार जरूरी सहायता नहीं दे रही।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि मतदाता सूची का संशोधन प्रवासन से भी जुड़ा है। उन्होंने कहा कि हर समस्या का हल होता है और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिनके पास पूरे दस्तावेज हैं, उनका नाम सूची में रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को 10 फरवरी तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को होगी। सुनवाई के बाद ममता बनर्जी कोलकाता के लिए रवाना हो गईं।
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