जुमलों की बारिश है, पांच विधानसभाओं के लिए चुनाव सामने हैं। असम, केरल और पुदुचेरी में 9 अप्रैल को एक चरण में, 23 अप्रैल को तमिलनाडु में एक चरण में और 23 और 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में दो चरणों में मतदान होंगे। नतीजे 4 मई को आएंगे। कुल 824 सीटें, करीब 17 करोड़ 40 लाख मतदाता वोट डालने जाएंगे।
इनमें पश्चिम बंगाल सबसे रोचक और हिंसक रंग वाला राज्य है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में उसी अंदाज़ में मारक बनी हुई हैं, जैसी बैलिस्टिक मिसाइल होती है।
बैलिस्टिक मिसाइल का अपने लक्ष्य को भेदने की रोचक और जटिल प्रक्रिया है। बैलिस्टिक मिसाइलें मुख्य रूप से तीन चरणों में यात्रा करती हैं। बूस्ट फेज लॉन्च के बाद रॉकेट इंजन काम करता है। इस दौरान मिसाइल को सही दिशा, गति और ऊंचाई दी जाती है। फिर मिड-कोर्स फेज एक तरह से फ्री फ्लाइट या बैलिस्टिक फेज आता है।

इंजन बंद हो जाने के बाद मिसाइल गुरुत्वाकर्षण के नियमों से एक परवलयाकार यानी बेलास्टिक पथ पर चलती है, जैसे कोई फेंका गया पत्थर। इस चरण में कोई सक्रिय इंजन नहीं होता, इसलिए यह फ्री-फॉल जैसी स्थिति में होती है। फिर आता है उसका री-एंट्री फेज़ , जब वह वायुमंडल में वापस आने पर घर्षण से गर्मी पैदा होती है और अंतिम चरण में लक्ष्य पर हमला होता है।
यह बैलिस्टिक मिसाइल लक्ष्य को भेदने के लिए ज़रूरत की दिशा में मुड़ सकती है। एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल (ABM) सिस्टम को भ्रमित करने की ‘कला’ भी उसे आती है। इसकी तकनीकें बेहद जटिल इंजीनियरिंग, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और भौतिकी पर आधारित हैं। ममता बनर्जी बैलिस्टिक मिसाइल जैसी हैं। सामनेवाले पर तेज और सटीक राजनितिक आक्रमण, चकमा देने की कला और लुभाने का हुनर उनमें भरपूर है।
वे बंगाली अस्मिता, माँ-माटी-मानुष और दिल्ली का हस्तक्षेप जैसी बातें कर रही हैं। उन्होंने “मैं सभी सीटों पर उम्मीदवार हूं” जैसा पुराना दांव दोहराया है। भाजपा अराजकता का अंत, घुसपैठ, भ्रष्टाचार और सुवेंदु अधिकारी जैसे स्थानीय चेहरों पर जोर दे रही है। यहां एसआईआर विवाद बड़ा है। एक पक्ष इसे अल्पसंख्यकों का नाम काटना बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे साफ-सुथरी मतदाता सूची कह रह है।
ममता बनर्जी हमेशा से संघर्ष और जन-संपर्क पर निर्भर रही है। 2011 में वाम मोर्चे को हराकर सत्ता हासिल करने के बाद उन्होंने 15 साल से अधिक समय तक पश्चिम बंगाल पर शासन किया। 2021 के चुनाव में उन्होंने भाजपा की लहर को रोकते हुए 215 सीटें जीतीं। अब 2026 में एंटी-इनकंबेंसी, भ्रष्टाचार के आरोप और विकास की कमी जैसे मुद्दे उनके सामने चुनौती बनकर खड़े हैं। लेकिन ममता इन चुनौतियों का सामना अपनी अनोखी रणनीति से कर रही हैं। हाल ही में पुरुलिया की रैली में उन्होंने कहा, ‘मैं सभी सीटों पर उम्मीदवार हूँ।’ यह पुराना दाँव फिर से आजमाया जा रहा है, जिससे कमजोर उम्मीदवारों को भी उनकी व्यक्तिगत अपील से मजबूती मिलती है।
ममता की रणनीति बैलिस्टिक मिसाइल जैसी है—भावनाओं को सीधा टारगेट। उनकी रणनीति मतदाताओं की भावनाओं को उभारना है। ममता ‘बाहरी बनाम बंगाली’ का नैरेटिव लगातार दोहरा रही हैं। उन्होंने केन्द्रीय एजेंसियों, चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और अफसरों के ट्रांसफर जैसे मुद्दों को राजनीतिक हथियार बना लिया है। एसआईआर को लेकर उन्होंने सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी, इसे बंगाल के मतदाताओं का अपमान बताया। इस मुद्दे पर उन्होंने कहा कि दिल्ली के जमींदार बंगाल की स्वायत्तता छीन रहे हैं। यह भावनात्मक अपील महिलाओं, अल्पसंख्यकों और ग्रामीण बंगाल के मतदाताओं को एकजुट करने में कारगर साबित हो रही है।
ममता बनर्जी की चुनावी राजनीति दाँवपेच में कल्याणकारी योजनाओं का बड़ा रोल है। लक्ष्मीर भंडार जैसी योजनाओं में महिलाओ को दी जाने वाली राशि बढ़ाई गई। बेरोजगार युवाओं के लिए ‘बांग्लार युवा साथी’ के तहत मासिक 1500 रुपये देने का वादा किया गया। पुरोहितों और मुअज्जिनों के मानदेय में बढ़ोतरी, कर्मचारियों को महंगाई भत्ता आदि ये सभी घोषणाएँ चुनावी घोषणा-पत्र ‘प्रतिज्ञा’ में शामिल हैं। ये दाँव सीधे मतदाताओं की जेब और भावनाओं को छूते हैं। ममता खुद को माँ की छवि में पेश करती हैं, जो गरीबों, महिलाओं और पिछड़ों की रक्षक हैं। उनकी रैलियों में साड़ी पहनकर आदिवासी नृत्य में शामिल होना या महिलाओं के साथ मंच पर डांस करना आम है। ये सब भावनात्मक कनेक्ट को मजबूत करते हैं।

उत्तर बंगाल में भाजपा का गढ़ माना जाता है, लेकिन ममता ने वहाँ डबल फ्रंट रणनीति अपनाई है। खुद उत्तर में रैलियाँ कर रही हैं, जबकि अभिषेक बनर्जी दक्षिण में फोकस कर रहे हैं। अभिषेक डेटा और नीति-आधारित मैसेजिंग पर जोर दे रहे हैं, जबकि ममता इमोशनल और ग्रासरूट कनेक्ट पर। यह कॉम्प्लिमेंट्री स्ट्रैटेजी टीएमसी को मजबूती दे रही है। ममता ने सोशल इंजीनियरिंग भी की है। 52 महिलाओं को टिकट दिया, स्थानीय चेहरों को प्राथमिकता और जाति-धर्म के बजाय बंगाली एकता का नारा देकर वे माहौल बनाये रखे हुए हैं।
पश्चिम बंगाल के चुनाव में भाजपा ने अपनी रणनीति बदल डाली है। अमित शाह ने टीएमसी पर ‘चार्जशीट’ जारी की जिसमें अराजकता, घुसपैठ, भ्रष्टाचार और सुरक्षा विफलता के आरोप लगाए। भाजपा अब व्यक्तिगत हमलों से बच रही है, ‘माँ-माटी-मानुष’ जैसे नारों पर हमला नहीं कर रही। इसके बजाय स्थानीय नेतृत्व, प्रदर्शन और राष्ट्रीय सुरक्षा पर फोकस है। सुवेंदु अधिकारी जैसे स्थानीय चेहरों को आगे किया जा रहा है। भाजपा उत्तर बंगाल को बचाने और दक्षिण में सेंध लगाने की ‘टू-वे’ रणनीति पर काम कर रही है।
2026 के चुनाव में मतदाता भावनाएँ मुख्य मुद्दा हैं। बेरोजगारी, विकास, घुसपैठ और सांप्रदायिक तनाव जैसे मुद्दे हैं, लेकिन ममता कहती हैं कि भाजपा बंगाल की संस्कृति, भाषा और स्वायत्तता पर हमला कर रही है। यह नैरेटिव मुस्लिम बहुल सीटों (करीब 125) पर खासा असरदार है, जहाँ टीएमसी का दबदबा रहा है। महिलाएँ भी ममता की मुख्य वोट बैंक हैं, जिन्हें कल्याणकारी योजनाओं और ‘दीदी’ की ममता से जोड़ा जा रहा है।
ममता की रणनीति सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीतिक संस्कृति को फिर से परिभाषित करने की है। उन्होंने वामपंथी वर्ग-आधारित राजनीति से हटकर पहचान और कल्याण की राजनीति को मजबूत किया। अब वे इसे और आगे ले जा रही हैं : बंगाली बनाम दिल्ली, स्थानीय बनाम केंद्रीय हस्तक्षेप। यह दाँव मतदाताओं की गहरी भावनाओं को भड़काता है, जो बैलिस्टिक मिसाइल की तरह लक्ष्य भेदता है। भावनाएँ बहुत ही ज्यादा ताकतवर हो सकती हैं, अगर उन्हें सही तरीके से भड़काया जाए। लेकिन साथ ही लंबे शासन में किये गए कार्य का प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण है। विकास, रोजगार और सुरक्षा जैसे मुद्दे अगर नजरअंदाज किए गए तो भावनात्मक अपील कितनी भी तेज हो, अंत में मतदाता फैसला अपनी जेब और भविष्य को देखकर लेते हैं।
पश्चिम बंगाल के इस चुनावी मैदान में ममता बनर्जी सचमुच बैलिस्टिक मिसाइल साबित हो रही हैं। उनकी सोच-समझकर तैयार की गई रणनीति मतदाताओं की भावनाओं को न सिर्फ भड़का रही है, बल्कि उन्हें एकजुट भी कर रही है। अब देखना यह है कि यह मिसाइल कितनी दूर तक उड़ती है और क्या बंगाल की राजनीति को नया मुकाम देती है। चुनावी नतीजे 4 मई को आएंगे, लेकिन ममता की यह यात्रा पहले से ही बंगाल की सियासत को रोमांचक बना चुकी है।
असम में भाजपा के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का फोकस सामान नागरिक संहिता और लव जिहाद पर सख्ती, 2 लाख नौकरियां और इंफ्रास्ट्रक्चर पर है। उनका जुमला है असम की अस्मिता, हिंदुत्व और विकास । कांग्रेस ने मल्लिकार्जुन खड़गे के जरिए पांच गारंटी लॉन्च की—सीधा वित्तीय सहायता, कल्याण योजनाएं और “व्हिसल क्रांति” (व्हिसल प्रतीक पर वोट)। यहां स्थानीय मुद्दे जैसे घुसपैठ, बाढ़ और आदिवासी अधिकार भावनाओं को भड़का रहे हैं।
केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट सत्ता में है, लेकिन विपक्ष (यूडीएफ और भाजपा) एलडीएफ का अलविदा जैसे जुमले चला रहा है। लेफ्ट का नारा है : केरल के लोगों के अलावा और कोई नहीं। यहां शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के पुराने वादे दोहराए जा रहे हैं, जबकि भाजपा मोदी की गारंटी और हिंदुत्व कार्ड खेल रही है। केरल में लेफ्ट का वेलफेयर मॉडल पुराना पड़ चुका है।
तमिलनाडु में डीएमके (एमके स्टालिन) सत्ता में है। उनका मुख्य जुमला द्रविड़ मॉडल और राज्य की स्वायत्तता की रक्षा है। एआईएडीएमके और भाजपा गठबंधन परिवारवाद का अंत और राष्ट्रीय विकास का नारा दे रहे हैं। यहां भाषा, संस्कृति और केंद्र बनाम राज्य का मुद्दा गर्म है। टीवीके जैसी नई पार्टियां जनता के लिए का व्हिसल प्रतीक चला रही हैं। पुदुचेरी में एनआर कांग्रेस और भाजपा गठबंधन बनाम कांग्रेस-डीएमके। यहां स्थानीय मुद्दे हावी हैं, लेकिन राष्ट्रीय पार्टियां इसे मोदी वर्सेस परिवारवाद बनाने की कोशिश में हैं। पुदुचेरी तो छोटा सा लैब है, जहां राष्ट्रीय पार्टियां प्रयोग कर रही हैं।











