नई दिल्ली। उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर अंकिता भंडारी (Ankita Bhandari) हत्याकांड ने तूफान मचा दिया है। 2022 में रिसॉर्ट में काम करने वाली 19 वर्षीय अंकिता भंडारी की हत्या ने पूरे राज्य को हिला दिया था।
मामले में मुख्य आरोपी पुलकित आर्य सहित तीन लोगों को 2025 में उम्रकैद की सजा हो चुकी है, लेकिन दिसंबर 2025 के अंत में सामने आए नए आरोपों ने मामले को फिर से गरमा दिया है। इन आरोपों में एक ‘वीआईपी’ के शामिल होने का दावा किया गया है, जिससे भाजपा के अंदर गहरी फूट पड़ गई है और कई नेताओं व कार्यकर्ताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है।
मामले की शुरुआत तब हुई जब पूर्व भाजपा विधायक सुरेश राठौर की पत्नी उर्मिला सनावर ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत गौतम का नाम जोड़ा। सोशल मीडिया पर वायरल हुए ऑडियो और वीडियो में दावा किया गया कि अंकिता की हत्या में किसी बड़े नेता की भूमिका है। हालांकि दुष्यंत गौतम ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया और दिल्ली हाई कोर्ट से राहत मिली, जहां कोर्ट ने इन वीडियो और पोस्ट को हटाने का आदेश दिया।
कोर्ट ने इसे मानहानिकारक बताया। भाजपा ने भी इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है। लेकिन इन आरोपों का असर भाजपा के अंदर दिखने लगा है। पार्टी में असंतोष खुलकर सामने आया है। भाजपा युवा मोर्चा के जिला मंत्री अंकित बहुखंडी ने सबसे पहले इस्तीफा दिया। उन्होंने कहा कि सीबीआई जांच में देरी से वे आहत हैं और न्याय नहीं मिलने से पार्टी में रहना मुश्किल हो गया है। इसके बाद एक के बाद एक इस्तीफे आने लगे।
भाजपा नेता अरविंद तोमर ने भी पार्टी छोड़ दी और सीबीआई जांच की मांग की। सोशल मीडिया पर कई कार्यकर्ताओं ने ऑनलाइन इस्तीफे पोस्ट किए, जिसमें उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर न्याय को दबाने का आरोप लगाया। कुछ रिपोर्ट्स में तो चार इस्तीफों का जिक्र है, जिसमें स्थानीय स्तर के नेता शामिल हैं। एक भाजपा नेता तो प्रदर्शन के दौरान भावुक होकर रो पड़े और अपनी ही पार्टी की आलोचना की।
उत्तराखंड भाजपा अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने इन इस्तीफों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कुछ लोग भावुक होकर फैसले ले रहे हैं, लेकिन पार्टी सरकार पर भरोसा रखे। उन्होंने कांग्रेस के प्रदर्शनों को राजनीतिक हथकंडा बताया और कहा कि एसआईटी ने मजबूत जांच की है, आरोपियों को सजा हो चुकी है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी कहा कि मामला कोर्ट में है और ठोस सबूत आए तो किसी भी जांच के लिए तैयार हैं। पुलिस ने भी ‘वीआईपी’ की संलिप्तता से इनकार किया है।
विपक्ष ने इस मुद्दे को जोरशोर से उठाया है। कांग्रेस ने राज्यव्यापी प्रदर्शन किए और सीबीआई जांच की मांग की। देहरादून सहित कई शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतरे। अंकिता के पिता ने भी इंसाफ की गुहार लगाई। 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद का ऐलान किया गया है, जिसमें विपक्ष और सामाजिक संगठन शामिल हैं। प्रदर्शनकारियों ने रिसॉर्ट पर धरना दिया और भाजपा सरकार के खिलाफ नारे लगाए।
यह मामला भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। पार्टी के अंदर की यह फूट राज्य में भाजपा की छवि को नुकसान पहुंचा रही है। जहां एक तरफ नेतृत्व मामले को पुराना बताकर दबाने की कोशिश कर रहा है, वहीं कार्यकर्ताओं का असंतोष बढ़ता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सीबीआई जांच नहीं हुई तो यह मुद्दा 2027 के विधानसभा चुनावों तक भाजपा को परेशान कर सकता है। अंकिता भंडारी का परिवार अभी भी इंसाफ की आस में है, जबकि राज्य की सियासत इस मामले में उलझ गई है।
यह घटनाक्रम उत्तराखंड की राजनीति में महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। देखना यह है कि सरकार इस दबाव को कैसे संभालती है और मामले की सच्चाई क्या सामने आती है।
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