एक वोट से चुनाव जीतने वाला TVK विधायक विश्वास प्रस्ताव में नहीं डाल सकेगा वोट, अदालत का आदेश

नई दिल्ली। मद्रास हाईकोर्ट ने तिरुपत्तूर विधानसभा सीट से एक वोट से चुनाव जीतने वाले TVK विधायक सीनिवासा सेतुपति को फिलहाल फ्लोर टेस्ट में हिस्सा लेने से रोक दिया।अदालत ने कहा कि जब किसी विवादित वोट से सरकार का भविष्य तय होने की स्थिति बन जाए तब संवैधानिक अदालतें मूकदर्शक नहीं रह सकतीं।जस्टिस विक्टोरिया गौरी और जस्टिस एन. सेंथिलकुमार की अवकाशकालीन पीठ ने यह अंतरिम आदेश DMK उम्मीदवार पेरियाकरुप्पन की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।

याचिका में आरोप लगाया गया था कि उनके पक्ष में पड़ा एक डाक मतपत्र गलती से समान नाम वाले दूसरे तिरुपत्तूर निर्वाचन क्षेत्र भेज दिया गया और बाद में उसे खारिज कर दिया गया।

दरअसल एक्टर विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम को विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक 108 सीटें मिलीं, लेकिन वह अपने दम पर बहुमत के आंकड़े 118 तक नहीं पहुंच सकी। बाद में कांग्रेस, इंडियन मुस्लिम लीग, भाकपा, माकपा और VCK समेत कई दलों के समर्थन से सरकार बनाने का रास्ता साफ हुआ। सरकार को 13 मई को फ्लोर टेस्ट का सामना करना है।

हाईकोर्ट ने कहा कि फ्लोर टेस्ट कोई सामान्य विधानसभा कार्यवाही नहीं होती बल्कि इससे सरकार का बने रहना या गिरना तय होता है। अदालत ने कहा कि यदि सीनिवासा सेतुपति को मतदान की अनुमति दी गई और उनका वोट निर्णायक साबित हुआ तो इसका असर केवल उनके निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे राज्य की संवैधानिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

अदालत ने कहा कि यदि प्रतिवादी का वोट सरकार के पक्ष या विपक्ष में निर्णायक बनता है तो इसके परिणाम राज्य के शासन तक पहुंच सकते हैं।

पीठ ने माना कि संवैधानिक निष्पक्षता बनाए रखने के लिए फिलहाल विधायक को फ्लोर टेस्ट में मतदान से रोकना जरूरी है। अदालत ने कहा कि इससे विधायक को कोई विशेष नुकसान नहीं होगा लेकिन यदि उन्हें वोट डालने दिया गया और बाद में वह वोट विवादित पाया गया तो चुनाव प्रक्रिया की शुचिता को बहाल करना कठिन हो सकता है।

मामले में चुनाव आयोग और विजयी उम्मीदवार ने दलील दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दाखिल याचिका सुनवाई योग्य नहीं है और चुनावी विवाद केवल चुनाव याचिका के जरिए उठाए जा सकते हैं।हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि यह सामान्य चुनावी विवाद नहीं बल्कि असाधारण परिस्थितियों वाला मामला है।

अदालत ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 100 में ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की गई थी जहां एक निर्वाचन क्षेत्र का डाक मतपत्र दूसरे निर्वाचन क्षेत्र की मतगणना प्रक्रिया में पहुंच जाए और बिना किसी सुधारात्मक कदम के खारिज की जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि चुनाव अधिकारी केवल औपचारिक प्रक्रिया निभाने वाले कर्मचारी नहीं बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारी हैं, जिनका दायित्व है कि हर वैध वोट सही जगह पहुंचे और उसकी गणना हो।

पीठ ने तिरुपत्तूर निर्वाचन क्षेत्र संख्या 50 के रिटर्निंग अधिकारी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए।अदालत ने कहा कि अधिकारी को डाक मतपत्र को सीधे खारिज करने के बजाय उसे सही निर्वाचन क्षेत्र संख्या 185 तिरुपत्तूर के रिटर्निंग अधिकारी को भेजना चाहिए था।

हाईकोर्ट ने मतगणना से जुड़े सभी रिकॉर्ड, डाक मतपत्र, खारिज मतपत्रों के लिफाफे, वीडियो फुटेज और अन्य दस्तावेज सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश पुनर्गणना, परिणाम रद्द करने या मतपत्रों को दोबारा खोलने के लिए नहीं है।

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