क्या एकेडमिक रिसर्च की आड़ में कथित तौर पर राजस्थान के आदिवासियों के डीएनए से जुड़े जेनेटिक डेटा की तस्करी की जा रही है? इस डेटा को कथित तौर पर अमेरिकी फार्मा कंपनियों तक पहुंचा दिया गया, बिना आदिवासियों या सरकार को सूचित किए। इसे ‘तस्करी’ कहा जा रहा है क्योंकि यह बायोलॉजिकल/जेनेटिक डेटा का अनधिकृत निर्यात है। यह नियो-कॉलोनियलिज्म जैसा है, जहां विकासशील देशों के संसाधनों का शोषण विकसित देश करते हैं।शक यह है कि यह तो एक ही मामला सामने आया है ऐसे और भी न जाने कितने मामले हुए होंगे।
यह गैरकानूनी है क्योंकि Biological Diversity Act, 2002 (सेक्शन 3, 4, 6, 7) भारत के जैव संसाधनों (जेनेटिक मटेरियल सहित) का विदेशी हस्तांतरण बिना National Biodiversity Authority (NBA) की पूर्व अनुमति के प्रतिबंधित है। आदिवासी क्षेत्रों से लिए गए सैंपल्स पर विशेष प्रावधान हैं। ICMR Ethical Guidelines और DBT Guidelines के मुताबिक मानव विषयों पर रिसर्च के लिए केंद्रीय अनुमति जरूरी है खासकर vulnerable groups (आदिवासी) पर। इसके लिए आदिवासियों को सूचित करना था और उनकी लिखित परमिशन लेनी चाहिए थी, जो नहीं ली गई। अगर डेटा विदेश पहुंचा और इस्तेमाल हुआ तो यह बायोपाइरेसी माना जा सकता है, जो दंडनीय है और इसके लिए जेल और जुर्माने का प्रावधान है। चूँकि अब यह मामला करीब ढाई दशक पुराना हो गया है, लेकिन इससे आरोप की गंभीरता नष्ट नहीं हो जाती। इसलिए अब कानूनी कार्रवाई मुश्किल हो सकती है, लेकिन जांच चल सकती है।
इस मामले के अनेक ऐसे पहलू हैं जो अनैतिक हैं। यह आदिवासी समुदाय के शोषण का मामला है। वे जागरूकता में कमजोर होते हैं, उनका फायदा नहीं उठाया जा सकता। सरकार और या समुदाय को इसके बारे में सूचित नहीं किया गया। रिसर्च कैसी? किसके फायदे के लिए? इसकी जोखिम क्या-क्या हो सकती है? और इससे विदेशी कंपनियों को कितना फायदा हो सकता है, इसका कोई मूल्यांकन ही नहीं हुआ ? जबकि जोखिम/नुकसान भारत/आदिवासियों पर।
पूरे मामले को ऐसे समझिए : राजस्थान के प्रमुख आदिवासी समुदायों भील, मीणा, गरासिया, डामोर, कठौड़ी और सहरिया के ब्लड सैंपल लिए गए थे।ये राजस्थान की राज्य की आदिवासी आबादी का लगभग 96.18 प्रतिशत हैं। ये ब्लड सेम्पल क्या कहकर लिये गये ? जो रिसर्च हुई उसका नाम Sero-genetic Profile and Phylogenetic Relationships of Tribes of Rajasthan था और इसमें 12 sero-genetic markers (जैसे A1A2BO, MNSs, Rhesus आदि) का अध्ययन किया गया। रिसर्च करने वाले मुख्य शोधकर्ता सतीश कुमार थे, जो दिल्ली यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे थे और उनके साथ डॉ. एमके भसीन थे।

इस तरह की रिसर्च करने के लिए केन्द्र सरकार (जैसे ICMR या DBT जैसी बॉडी) से मंजूरी लेनी थी, जो नहीं ली गई। केवल दिल्ली यूनिवर्सिटी की एथिक्स कमेटी से अनुमति ली गई, और इस डेटा को कथित तौर पर अमेरिकी फार्मा कंपनियों तक पहुंचा दिया गया, बिना आदिवासियों या सरकार को सूचित किए।
सवाल यह है कि आदिवासियों के ही डीएनए का डेटा क्यों लिया गया? दावा किया गया है कि यह रिसर्च आदिवासी समुदायों के जेनेटिक स्ट्रक्चर, फाइलोजेनेटिक रिलेशनशिप्स (विकासवादी संबंध) और सेरो-जेनेटिक प्रोफाइल समझने के लिए थी। आदिवासी समुदायों का जेनेटिक डेटा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे एंडोगेमस (अंदरूनी विवाह) ग्रुप्स हैं, जिनमें कम जेनेटिक मिक्सिंग होती है। इससे विशिष्ट जेनेटिक मार्कर्स मिल सकते हैं जो दवाओं की प्रभावशीलता, बीमारियों के जोखिम या प्रिसिजन मेडिसिन (व्यक्तिगत आधारित दवाएं) के लिए उपयोगी होते हैं। अब आरोप है कि यह डेटा विदेशी कंपनियों को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल करने के लिए भेजा गया, बिना पूर्ण जानकारी के साथ सहमति के। आदिवासियों को नहीं बताया गया कि उनका डेटा कहां जाएगा या कैसे इस्तेमाल होगा।
इस रिसर्च के आधार पर, इस जेनेटिक कोड से प्रिसिजन-टारगेटेड मेडिसिन बनाने की तैयारी है। दुनिया की दो सबसे बड़ी फार्मा कंपनियां इस पर काम कर रही हैं। ये ऐसी दवाएं होती हैं जो व्यक्ति या विशिष्ट समूह के जेनेटिक प्रोफाइल के आधार पर बनाई जाती हैं, जैसे कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग या अन्य बीमारियों के लिए अधिक प्रभावी और कम साइड इफेक्ट वाली दवाएं। अमेरिकी फार्मा कंपनियां ऐसे डेटा का इस्तेमाल फार्माकोजेनोमिक्स में करती हैं, जहां दवा व्यक्ति के DNA के अनुसार एडजस्ट की जाती है। कोई स्पेसिफिक दवा का नाम अभी सामने नहीं आया है, लेकिन यह लंबे समय में नई जेनेटिक-बेस्ड थेरेपीज या दवाओं की ओर इशारा है।

इस रिसर्च को करने वाले डॉ सतीश कुमार अब भारत छोड़कर अमेरिका में बस गए हैं। वे टेक्सास की रियो ग्रैंड वेली यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ़ ह्यूमन जेनेटिक्स केअसोसिएट प्रोफ़ेसर ऑफ़ रिसर्च बन गए हैं। उनका रिसर्च पेपर 2011 में The Anthropologist जर्नल में प्रकाशित हुआ था। इस रिसर्च में उन्होंने सेरो-जेनेटिक स्टडी की थी यानी खून के सैंपल से कुछ खास जेनेटिक मार्कर्स का अध्ययन किया जाता है। इसके लिए उन्होंने राजस्थान के 6 प्रमुख एंडोगेमस (अंदरूनी विवाह करने वाले) आदिवासी समूहों से कुल 647 लोगों के ब्लड सैंपल लिए गए थे। ये सेम्पल्स मीणा (Mina) – सवाई माधोपुर जिले से, भील – उदयपुर जिले से, गरासिया – सिरोही जिले से, डामोर – डूंगरपुर जिले से, कठौड़ी – उदयपुर जिले से, सहरिया – बारां जिले से। इस रिसर्च में 12 सेरो-जेनेटिक पॉलीमॉर्फिक सिस्टम्स का विश्लेषण किया गया था. ।
भारत में बायोपाइरेसी के कई प्रमुख मामले सामने आए हैं, जहां विदेशी कंपनियों या संस्थाओं ने भारतीय पारंपरिक ज्ञान जड़ी-बूटियों, फसलों या जैव संसाधनों का इस्तेमाल कर पेटेंट हासिल किए, बिना भारत को लाभ साझा किए या स्रोत को मान्यता दिए। लेकिन यह मामला अपने आप में अलग ही है। अब रिसर्च के तरीके बदल गए हैं, और वैश्विक फार्मा कंपनियों की अनैतिक गतिविधियां काम होने के बजाय बढ़ती जा रही है।
यह भी पढ़ें : अफगानिस्तान पाकिस्तान के बीच जंग, दोनों तरफ सैकड़ों सैनिकों की शहादत का दावा










