उमरिया। देश के सबसे प्रसिद्ध टाइगर (Tiger) रिजर्व बांधवगढ़ के बाघों के अस्तित्व पर अब खतरा मंडरा रहा है। केवल बाघ नहीं बल्कि, अन्य वन्य जीवों के अस्तित्व पर चिंता की लकीर खींच रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि, सरकार ने बांधवगढ़ और अचानकमार टाइगर रिजर्व से सटे हुए घुनघुटी के जंगलों में कोयला खदान शुरू करने की अनुमति दे दी है। अब यहां प्राइवेट कंपनियों का आगमन शुरू हो गया है और पेड़ों को कटाई भी तेजी से जारी है।
दरअसल, मध्यप्रदेश के उमरिया और शहडोल जिले के बीच स्थित घुनघुटी का जंगल वन्यजीवों के लिए एक महत्वपूर्ण कॉरिडोर है। इस कॉरिडोर के जरिए बाघ, चीतल, सांभर, हाथी सहित अन्य वन्य जीव विचरण करते हुए एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक जाते हैं। लेकिन, अब सरकार ने 11 अलग– अलग कंपनियों को कोल ब्लॉक के ठेके दे दिए हैं। ये कंपनियां जंगल के बीचो– बीच पेड़ों की कटाई कर रहीं हैं और जमीन से कोयला निकालने की तैयारी कर रहीं हैं। जिसके चलते वन्य जीवों के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है।
द लेंस की ग्राउंड रिपोर्ट में क्या दिखा?
द लेंस रिपोर्टर घुनघुटी के जंगलों में खुलने वाली कोयला परियोजनाओं और जंगल को होने वाले नुकसान की पड़ताल करने पहुंचा। रविवार को ही पिथौरा कॉल ब्लॉक की पहली इकाई का उद्घाटन हुआ है। इसका संचालन रायपुर की कंपनी बजरंग इस्पात कर रही है। द लेंस रिपोर्टर सबसे पहले बजरंग इस्पात के मेन रोड स्थित अस्थायी दफ्तर के मुख्य द्वार पर पहुंचा जहां वीडियो और फोटो लेने से साफ तौर पर मना कर आईडी कार्ड छीन लिया गया। कुछ देर तक बात करने के बाद आईडी कार्ड वापस मिल। और हम वहां से खदान खुलने वाले रास्ते पर निकल गए।
जहां हुआ पिछले साल वृक्षारोपण वहां भी काटे जा रहे पेड़
द लेंस जब खदान के मुख्य द्वार पर पहुंचा तो मौके पर दो बिना वर्दी के सुरक्षाकर्मी मौजूद थे। उन्होंने हमें अंदर जाने से रोक दिया अपने अधिकारी से बात की हमने अपना परिचय बताया फिर भी अंदर जाने नहीं दिया गया। जहां खदान खुलनी है उसके बड़े एरिया में चारों ओर नुकीले तार को बाउंड्री बना दी गई है। अंदर जाने नहीं दिया गया तो हम वहां से चले गए। ध्यान देने वाली बात यह है कि जिस जगह पर खनन किया जाना है साल 2024-25 में 15625 पौधों का वृक्षारोपण किया गया था।
ये दृश्य बेहद चिंताजनक है!
द लेंस ने मुख्य द्वार से निकलने के बाद गांव के अंदर से होते हुए जंगलों के रास्ते उस कोल ब्लॉक तक पहुंचने की कोशिश की। जंगल के करीब 3 किलोमीटर अंदर जाने के बाद हम पेड़ कटने वाली जगह से कुछ 1 किलोमीटर दूर थे। हम वहां पहुंचे तो वह नजारा बेहद चिंताजनक था। जिस जगह पर यह कॉल ब्लॉक खोला जा रहा है वहां नुकीले तार लगाए गए हैं जो वन्य जीवों के रास्ते का रोड़ा हैं। साथ ही अगल– बगल बड़े– बड़े गड्ढे खोदे गए हैं जिससे वन्य जीव वहां प्रवेश ना कर सकें हैं। हम रिपोर्ट करते हुए देखते हैं कि बड़ी– बड़ी मशीन लगी हुई हैं और वहां पेड़ों को काटने का काम तेजी से चल रहा है। वर्षों पुराने हरे भरे पेड़ों को काटा जा रहा है।
जंगल काट रहें हैं, हम कहां जाएं?
द लेंस ने गांव के कई लोगों से बातचीत करने की कोशिश की लेकिन, कोई बात करने को तैयार नहीं हुआ। एक गाय और बकरी चराने वाली महिला ने हमसे बात की। उसने कहा कि कोयला खदान खोल रहें हैं। पेड़ों को काट रहें हैं। जानवर कहां चराएंगे। अधिकारी लोग से भी बोले हैं कि ना खोलिये लेकिन, कोई सुनता नहीं है।
हजारों पेड़ों को काटा जाएगा
घुनघुटी के जंगलों में 11 कंपनियों को कोयला खदान शुरू करने की अनुमति मिली है। पिथौरा में खुल रही खदान में 1757 पेड़ों को काटा जा रहा है। इसी प्रकार जब अन्य माइंस खुलेंगी तो 22 हजार से ज्यादा पेड़ों को काटा जाएगा। जब ये पेड़ कट जाएंगे तब वन्यजीव के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जाएगा। अभी एक ही खदान से उत्पादन शुरू किया गया, जो अपने शुरुआती चरण में है। आने वाले दिनों में जंगल में हरियाली की जगह, बड़ी– बड़ी गाड़ियां, मशीनें, लोगों की भीड़, धूल और कोयला ही दिखाई देगा।
इन कंपनियों को मिली है खदान शुरू करने की अनुमति
मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में बांधवगढ़-अचानकमार टाइगर कॉरिडोर और घुनघुटी वन क्षेत्र के तहत आने वाले विभिन्न कोयला ब्लॉकों के वाणिज्यिक खनन के लिए 11 कंपनियों को आवंटन या नीलामी प्रक्रिया के विभिन्न चरणों में मंजूरी मिली है। जिनमें अलोपी लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड (Alopi Logistics Pvt. Ltd.), रुंगटा संस प्राइवेट लिमिटेड (Rungta Sons Private Limited), गैलेंट इस्पात (Gallantt Ispat), क्यूब कमर्शियल (Qube Commercial), सीजी सिन-गैस एंड केमिकल्स (CG Syn-Gas and Chemicals), झारखंड एक्सप्लोरेशन एंड माइनिंग कॉर्पोरेशन (JEMCO), अडानी समूह (Adani Group), जिंदल स्टील एंड पावर (Jindal Steel & Power), टाटा स्टील लिमिटेड (Tata Steel Ltd.), जेएसडब्ल्यू स्टील लिमिटेड (JSW Steel Ltd.), और सार्वजनिक क्षेत्र की वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (Western Coalfields Limited – WCL) / एनएलसी इंडिया (NLC India) शामिल हैं।
बांधवगढ़-अचानकमार टाइगर कारिडोर होगा प्रभावित
नया कोल ब्लॉक पिथोरा ईस्ट अंडरग्राउंड कोल माइनिंग ब्लॉक यह सोहागपुर कोलफील्ड बांधवगढ़-अचानकमार बाघ कॉरिडोर से लगभग डेढ़ किलोमीटर की दूरी है। यह निर्णय कमेटी की 27 जुलाई को हुई बैठक में लिया गया है। इससे पहले आठ-नौ जुलाई को हुई बैठकों में कमेटी ने मरवटोला-सात कोल ब्लाक और अर्जुन वेस्ट कोल ब्लाक में खनन के लिए पर्यावरण मंजूरी देने की सिफारिश की थी। ये ब्लाक बांधवगढ़-अचानकमार टाइगर कारिडोर से 53 मीटर और 3.9 मीटर की दूरी पर स्थित हैं ये खदानें बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से लगे उमरिया सामान्य वन मंडल के घुनघुटी और पाली रेंज के जंगल के नजदीक हैं। पिथोरा ईस्ट परियोजना का खनन पट्टा क्षेत्र एक हजार हेक्टेयर से अधिक है, जिसमें 800 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि शामिल है।
वन्यजीव और मानव संघर्ष की नई शुरुआत
जब जंगलों को काट दिया जाएगा तो इस क्षेत्र में वन्यजीव और मनुष्यों के बीच संघर्ष शुरू हो जाएगा। इसका ताजा उदाहरण छत्तीसगढ़ के हसदेव से देखने को मिलता है। बड़ी संख्या में छत्तीसगढ़ से हाथ मध्यप्रदेश की ओर पलायन कर रहें हैं जिससे कई बार वे ग्रामीण और शहरी इलाकों में प्रवेश कर जाते हैं। आए दिन गांवों से हाथी और मानव संघर्ष की खबरें सामने आती हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो घुनघुटी के आस– पास के इलाकों में इस तरह की खबरें भी आम हो जाएंगी।
वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
द लेंस से चर्चित वाइल्डलाइफ एक्सपर्ट अजय शंकर दुबे से बातचीत की उन्होंने कहा कि शहडोल -बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के बाघों के कॉरिडोर को नष्ट करने का सरकारी निर्णय समूचे पारिस्थितिक के लिए घातक है। सरकार पुनर्विचार कर कोल माइंस नहीं खोले।
नियम क्या कहते हैं?
भारतीय पर्यावरण नियमों के अनुसार, घुनघुटी और बांधवगढ़ जैसे संवेदनशील वन क्षेत्रों में कोयला खनन के लिए वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) से ‘फॉरेस्ट क्लीयरेंस’ और काटे गए पेड़ों के बदले समानुपातिक वनीकरण (CAMPA) फंड देना अनिवार्य है; साथ ही पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) व स्थानीय ग्रामीणों के साथ जनसुनवाई करना तथा वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत बाघ कॉरिडोर की सुरक्षा हेतु राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) से अनिवार्य ‘वाइल्डलाइफ क्लीयरेंस’ लेना जरूरी है, और इन नियमों का उल्लंघन होने पर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) को उस मंजूरी को रद्द करने या रोकने का पूरा कानूनी अधिकार है।
क्या नियमों को देखा गया?
पर्यावरण संरक्षण के नियमों को दरकिनार करते हुए सरकार ने इन कंपनियों को कोल ब्लॉक खोलने की अनुमति दे दी है। अनुमति दे दी गई है याने कि सभी नियमो को देखा गया होगा। लेकिन, ऐसा नहीं है यदि यहां के मौजूदा हालात को देखा गया होता तो अनुमति नहीं मिल सकती थी। फिलहाल अब अनुमति मिलने के साथ– साथ इस इलाके में कंपनिया अपनी बड़ी– बड़ी मशीनों के साथ जंगल का दोहन करने को तैयार हैं।
जंगल बचाने दायर की गई है याचिका
सरकार के फैसले के खिलाफ पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में अपील संख्या 18/2026 दायर कर दी है, जिसमें यह दलील दी गई है कि खदानों की मंजूरी में इस बेहद संवेदनशील वन्यजीव गलियारे के अस्तित्व को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया है। याचिका में चेतावनी दी गई है कि 1,700 से अधिक पेड़ों की कटाई और भारी मशीनरी के इस्तेमाल से बाघों के प्राकृतिक आवागमन का यह मुख्य रास्ता और छत्तीसगढ़ से आए जंगली हाथियों का आशियाना पूरी तरह नष्ट हो जाएगा, जिससे क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष और गंभीर पर्यावरण प्रदूषण का खतरा पैदा हो गया है, जिसे आधार बनाकर पर्यावरणविद् इस मंजूरी पर तत्काल रोक लगाने की मांग कर रहे हैं।











