लेंस डेस्क। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि किसी लड़की के पायजामे का नाड़ा खींचना और ब्रेस्ट पकड़ना रेप की कोशिश माना जाएगा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को पलट दिया है, जिसमें इन हरकतों को ‘रेप की तैयारी’ कहा गया था।
यह मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का है। जनवरी 2022 में एक महिला ने शिकायत दर्ज कराई कि नवंबर 2021 में उसकी 14 साल की बेटी के साथ रास्ते में छेड़छाड़ और जबरन खींचने की कोशिश की गई।
आरोप लगाया कि 10 नवंबर, 2021 को वह अपनी 14 साल की बेटी के साथ कासगंज के पटियाली में देवरानी के घर गई थी। उसी दिन शाम को अपने घर लौट रही थी। रास्ते में गांव के रहने वाले पवन, आकाश और अशोक मिल गए। पवन ने बेटी को अपनी बाइक पर बैठाकर घर छोड़ने की बात कही। मां ने उस पर भरोसा करते हुए बाइक पर बैठा दिया, लेकिन रास्ते में पवन और आकाश ने लड़की के प्राइवेट पार्ट को पकड़ लिया। आकाश ने उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करते हुए उसके पायजामे की डोरी तोड़ दी।
लड़की की चीख-पुकार सुनकर ट्रैक्टर से गुजर रहे सतीश और भूरे मौके पर पहुंचे। इस पर आरोपियों ने देसी तमंचा दिखाकर दोनों को धमकाया और फरार हो गए।
पीड़ित की मां की शिकायत पर आरोपी पवन और आकाश के खिलाफ IPC की धारा 376, 354, 354B और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत केस दर्ज किया गया। वहीं आरोपी अशोक पर IPC की धारा 504 और 506 के तहत केस दर्ज किया।
आरोपियों ने समन आदेश से इनकार करते हुए हाईकोर्ट के सामने रिव्यू पिटीशन दायर की। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली थी।
आरोप था कि आरोपियों ने लड़की के निजी अंग पकड़े, पायजामे की डोरी तोड़ी और पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की।
पीड़िता की चीख सुनकर लोग मौके पर पहुंचे, जिसके बाद आरोपी फरार हो गए।
मामले में IPC की धारा 376, 354, 354B और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत केस दर्ज हुआ।
17 मार्च 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने कहा कि ये हरकतें ‘रेप की कोशिश’ नहीं बल्कि ‘रेप की तैयारी’ हैं। कोर्ट ने धारा 376 और POCSO की धारा 18 हटाकर हल्की धाराओं में ट्रायल का आदेश दिया।
फैसला सामने आते ही देशभर में विरोध शुरू हो गया। मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।
चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट ने आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल किया है।
कोर्ट ने साफ कहा कि इन आरोपों से पहली नजर में रेप की कोशिश का मामला बनता है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की कुछ टिप्पणियों को ‘असंवेदनशील’ और ‘अमानवीय’ बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को फैसले लिखते समय ऐसी टिप्पणियों से बचना चाहिए, जो पीड़ित पर ‘चिलिंग इफेक्ट’ डालें। यानी कि ऐसा डर पैदा करें कि पीड़ित शिकायत वापस लेने पर मजबूर हो जाए।
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अब यह मामला आगे ट्रायल कोर्ट में रेप की कोशिश की धाराओं के तहत चलेगा।
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