छत्तीसगढ़ विधानसभा में पारित छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक-2026 (Religious Freedom Bill 2026) को लेकर मसीही समाज में शुरू से व्यापक असहमति है, तो उसे समझा जा सकता है, क्योंकि इसके कई प्रावधान सीधे ईसाई समुदाय को प्रभावित करते हैं।
सबसे पहली बात कि इस विधेयक के निशाने पर ईसाई समुदाय है, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। खुद मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सोशल मीडिया पर जारी पोस्ट में कहा है कि इसका मकसद छत्तीसगढ़ को विधर्मियों से मुक्त करना है। उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि विधर्मियों से उनका आशय क्या है। विधेयक में जिस तरह से मूल धर्म के रूप में हिंदू धर्म की ओर इशारा किया गया है, उससे इसकी मंशा समझी जा सकती है।
छत्तीसगढ़ में हाल के वर्षों में कथित धर्मांतरण के नाम पर ईसाई संस्थाओं को निशाना बनाने की घटनाओं में बढ़ोतरी अप्रत्याशित नहीं है। दरअसल यह उस राजनीति का हिस्सा है, जिसकी परिणति धर्म स्वातंत्र्य विधेयक के रूप में सामने है।
जबरिया या प्रलोभन के आधार पर होने वाले धर्मांतरण की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और इस पर संविधान निर्माताओं ने संविधान सभा में भी चर्चा की थी। जाहिर है, ऐसा कोई भी कानून सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
दरअसल ईसाई समुदाय को छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को लेकर संदेह है कि यह उनके साथ भेदभाव करता है। यदि ऐतिहासिक रूप से इस समुदाय के लोग छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में सड़क पर उतरकर शांतिपूर्ण विरोध कर रहे हैं, तो इसे पूरी समग्रता में देखने की जरूरत है।
संयुक्त मसीही समाज का कहना है कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14, 19. 21 और 25 के तहत उन्हें मिले मौलिक अधिकारों का हनन करता है, जिसमें धर्म की स्वतंत्रता शामिल है। यही नहीं उनका कहना है कि इसमें जिला मजिस्ट्रेट को असीमित अधिकार दे दिए गए हैं।
राज्य की नजर में सभी धर्मों को बराबर होना चाहिए यही हमारे संविधान का केंद्रीय भाव है। होना तो यह चाहिए था कि छत्तीसगढ़ सहित सारे राज्य जबरिया धर्मांतरण पर रोक संबंधी कानून बनाने से पहले सभी धर्मों के लोगों को साथ में लेकर व्यापक सहमति बनाते। मगर छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि भाजपा शासित उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र जैसे अनेक राज्यों में बनाए गए ऐसे विधेयक या कानून हिंदुत्व की राजनीति के एक सिलसिले में दिखते हैं।











