रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मोबाइल चोरी के संदेह में एक किशोर की कमल विहार पुलिस चौकी में पिटाई का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। मारपीट का वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए दो आरक्षकों लक्ष्मीनारायण और आसमान सिंह को निलंबित कर दिया।
डीसीपी वेस्ट संदीप पटेल ने विभागीय जांच के आदेश दिए हैं और कड़ी कार्रवाई की बात कही है। लेकिन, इस पूरे मामले में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठने लगे हैं।
मारपीट में शामिल एक अन्य पुलिस कर्मी पर निलंबन की कार्रवाई न करने और मारपीट के इस मामले में भारतीय न्याय संहिता के तहत एफआईआर दर्ज नहीं किए जाने को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं।
जानकारी के मुताबिक कमल विहार बस्ती में रहने वाले एक किशोर को मोबाइल चोरी के शक में कमल विहार चौकी लाया गया था। आरोप है कि बिना चौकी प्रभारी की अनुमति और परिजनों की सहमति के उसे पूछताछ के नाम पर चौकी बुलाया गया। किशोर ने चोरी से इनकार किया तो उसके साथ लाठी-डंडों और लात-घूंसों से मारपीट की गई।
पीड़ित ने परिजनों को बताया कि उस पर जबरन चोरी कबूलने का दबाव बनाया गया। कबूल नहीं करने पर उसके साथ मारपीट की गई है। कूल्हे में गंभीर चोट और सूजन के कारण वह ठीक से चल भी नहीं पा रहा है।
इसके बाद इसकी जानकारी जैसे ही लगी तो लोगों ने हंगामा शुरू कर दिया गया।
वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने दो आरक्षकों को सस्पेंड कर दिया, लेकिन मामला यहीं नहीं थमा।
जानकारी के मुताबिक, घटना के दौरान एक तीसरा पुलिसकर्मी भी मौजूद था, लेकिन उसे निलंबित नहीं किया गया। इस पर पुलिस की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब तक संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। जबकि एक नाबालिग के साथ कथित मारपीट, जबरन अपराध कबूल करवाने की कोशिश और शारीरिक प्रताड़ना जैसे आरोप गंभीर आपराधिक श्रेणी में आते हैं।
कानूनी जानकारों का कहना है कि केवल विभागीय निलंबन पर्याप्त नहीं है। यदि वीडियो और पीड़ित के बयान में सच्चाई है तो आपराधिक मामला दर्ज कर निष्पक्ष जांच होना चाहिए।








