रायपुर। छत्तीसगढ़ के हेमचंद यादव विश्वविद्यालय, दुर्ग में कुलसचिव बनाए गए डॉ. भूपेंद्र कुलदीप की पीएचडी (PhD) डिग्री को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। पीएचडी प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं, समयसीमा और शोध निर्देशक (गाइड) की पात्रता पर सवाल उठाए गए हैं। मामले की शिकायत विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) तक पहुंच चुकी है और निष्पक्ष जांच की मांग की गई है।
जानकारी के अनुसार डॉ. भूपेंद्र कुलदीप ने दुर्ग स्थित निजी संस्थान भारती विश्वविद्यालय में अक्टूबर 2022 में पीएचडी के लिए पंजीयन कराया था। इसके बाद जुलाई 2024 में रिसर्च डिग्री कमेटी (RDC) की प्रक्रिया पूरी होने के साथ उन्हें पीएचडी उपाधि मिलने की जानकारी सामने आई है।
इस प्रकार कुल मिलाकर करीब 21 महीने में पीएचडी पूरी होने का दावा किया जा रहा है। इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि माइक्रो बायोलॉजी जैसे विषय में इतनी कम अवधि में शोध कार्य पूर्ण होना असामान्य माना जा रहा है।
विवाद का सबसे गंभीर पहलू पीएचडी गाइड की पात्रता को लेकर सामने आया है। आरोप है कि जिन डॉ. लुमेश्वरी साहू को डॉ. कुलदीप का शोध निर्देशक नियुक्त किया गया, उस समय उन्होंने स्वयं पीएचडी उपाधि प्राप्त नहीं की थी।
दस्तावेजों के अनुसार डॉ. लुमेश्वरी साहू ने वर्ष 2019 में हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में पीएचडी प्रवेश परीक्षा दी थी और बाद में शोध प्रक्रिया पूरी करते हुए नवंबर 2023 में पीएचडी उपाधि हासिल की।
जबकि डॉ. भूपेंद्र कुलदीप ने अक्टूबर 2022 में पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन कराया था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नवंबर 2023 से पहले डॉ. लुमेश्वरी साहू किसी शोधार्थी की अधिकृत गाइड कैसे बनीं?
8 महीने में गाइड और स्कॉलर दोनों को पीएचडी
दस्तावेजों के मुताबिक डॉ. लुमेश्वरी साहू को नवंबर 2023 में पीएचडी मिली और उसके महज 8 महीने बाद जुलाई 2024 में डॉ. भूपेंद्र कुलदीप को पीएचडी उपाधि प्रदान कर दी गई।
इस तथ्य को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि शोध निर्देशक और शोधार्थी के बीच इतनी कम अवधि के अंतराल में डिग्री प्रदान किया जाना क्या नियमानुसार था।
नियमों के अनुसार जिस विश्वविद्यालय से पीएचडी की जा रही हो, शोध निर्देशक का उसी संस्थान से संबद्ध होना आवश्यक माना जाता है। आरोप है कि जिस समय डॉ. कुलदीप की पीएचडी प्रक्रिया चल रही थी, उस समय डॉ. लुमेश्वरी साहू भारती विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत नहीं थीं।
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार वे बस्तर विश्वविद्यालय से संबद्ध अंतागढ़ स्थित शासकीय लाल कालिंद सिंह कॉलेज में गेस्ट लेक्चरर के रूप में कार्यरत थीं।
मामले में यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि रिसर्च डिग्री कमेटी ने सभी दस्तावेजों और पात्रता की जांच किए बिना पीएचडी उपाधि किस आधार पर स्वीकृत की। साथ ही यह भी चर्चा में है कि दूसरे विश्वविद्यालय में प्रशासनिक पद पर कार्यरत व्यक्ति को इतनी कम अवधि में पीएचडी उपाधि देने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी।
PSC से उप कुलसचिव, फिर बने कुलसचिव
डॉ. भूपेंद्र कुलदीप को वर्ष 2019 में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (PSC) के माध्यम से उप कुलसचिव पद पर नियुक्ति मिली थी। बाद में वर्ष 2023 में पदोन्नति के बाद उन्हें हेमचंद यादव विश्वविद्यालय का कुलसचिव बनाया गया।
पूरे मामले को लेकर UGC में शिकायत दर्ज कराई गई है। शिकायतकर्ता ने पीएचडी प्रक्रिया, गाइड की पात्रता और विश्वविद्यालय नियुक्तियों की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
इस संबंध में डॉ. भूपेंद्र कुलदीप से संपर्क करने की कोशिश की गई। फोन कॉल रिसीव होने के बाद जब उनसे इन आरोपों को लेकर सवाल पूछा गया, तो कॉल कट कर दिया।
मामले ने उच्च शिक्षा जगत में हलचल पैदा कर दी है। यदि शिकायत पर औपचारिक जांच शुरू होती है तो पीएचडी डिग्री, गाइड की पात्रता और विश्वविद्यालय की प्रशासनिक प्रक्रिया पर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।











