सोनिया की आत्मकथा का भारत में प्रकाशन अधर में, क्या राजनीतिक दबाव में पीछे हट गया प्रकाशक?

रशीद किदवई,वरिष्ठ पत्रकार
(अनेक भाषाओं में प्रकाशित SONIA – A Biography (प्रकाशक: पेंगुइन इंडिया,2003), 24 Akbar Road जैसी चर्चित किताबों के लेखक।)

कांग्रेस नेता सोनिया गांधी की बहुप्रतीक्षित आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग : अ जर्नी ऑफ लव’ का भारत में प्रकाशन मंझधार में फंस गया है। कहा जा रहा है कि पेंगुइन रैंडम हाउस इस किताब को प्रकाशित करने से पीछे हट गया है। हालांकि पेंगुइन की ही अमेरिकी इकाई ‘अल्फ्रेड ए. नॉप्फ’ इसे पूर्व निर्धारित तारीख 10 नवंबर को अमेरिका में रिलीज करेगी।

एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पैंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने सोनिया गांधी से किताब के कुछ हिस्सों को संपादित करने और हटाने के लिए कहा था, जिससे लेखिका ने इनकार कर दिया। हालांकि पेंगुइन ने अपने बयान में कहा कि तथ्य की जांच करना और ऐसी सिफारिशें देना जो किताब और लेखकों दोनों के हित में हो, एक प्रकाशक के रूप में हमारा विशेषाधिकार और जिम्मेदारी दोनों है।

किताब को लेकर दिए गए संपादकीय सुझावों को पेंगुइन ने प्रकाशन प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा बताया है। लेकिन यहां यह सवाल उठना लाजिमी है कि प्रकाशक ने कुछ तथ्यों को कथित रूप से हटाने के जो सुझाव दिए थे, वे क्या सामान्य संपादकीय गुणवत्ता के मद्देनजर दिए गए थे या फिर किसी दबाव में आकर? यह सवाल इसलिए और मौजूं है, क्योंकि अमेरिका में तो सोनिया की किताब अपने मूल स्वरूप में ही प्रकाशित हो रही है। तो ऐसे में किताब और लेखक, ‘दोनों के हित में’ में ऐसी क्या बातें थीं, जो प्रकाशन पूर्व की अनिवार्य शर्त बन गई?

क्या ‘छाछ’ को भी फूंककर पी रहा है प्रकाशक?

दो साल पहले 2024 में पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ को लेकर भी काफी विवाद हुआ था। उसमें चीन से संबंधित कुछ संदर्भ थे। खुफिया या सुरक्षा से जुड़े संगठनों से सेवानिवृत्त कर्मचारियों को अपने संगठन से संबंधित जानकारी प्रकाशित करने से पूर्व सरकारी अनुमति लेनी होती है। लेकिन तब अनुमति के बगैर ही पेंगुइन रैंडम हाउस ने उस किताब को कथित तौर पर छाप दिया था। हालांकि वह बाजार में नहीं आ पाई, लेकिन उसकी रिव्यू कॉपीज चली गई थीं। कुछ पत्रिकाओं में उसके अंश भी प्रकाशित हो गए थे। उन्हीं के आधार पर राहुल गांधी ने इसका मुद्दा भी बना लिया था और इसे संसद में उठाने का प्रयास किया था।

इसके बाद पेंगुइन को बड़ी असहज परिस्थितियों से गुजरना पड़ा था। यहां तक कि दफ्तर में पुलिस की आमद और वहां के वरिष्ठ कर्मचारियें से काफी पूछताछ भी हुई थी। एक विशुद्ध प्रोफेशनल संस्थान में पुलिस का आना या पूछताछ जैसी स्थितियों से रूबरू होना सामान्य बात नहीं मानी जा सकती। कहावत भी है कि ‘दूध का जला व्यक्ति छाछ को भी फूंककर पीने लगता है।’ तो क्या पेंगुइन के सोनिया की किताब के प्रकाशन से पीछे हटने को भी इसी आलोक में देखा जा सकता है?

अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल भी सतह पर…

इस विवाद के बाद देश में अभिव्यक्ति की आजादी का मामला फिर सतह पर आ गया है। जनरल नरवणे की किताब पर कुछ पाबंदियों को समझा जा सकता है, क्योंकि उसके लिए रक्षा मंत्रालय के स्पष्ट नियम हैं। लेकिन देश के किसी राजनीतिज्ञ की किताब को लेकर पेंगुइन जैसे बड़े प्रकाशक की हिचक कई सवाल खड़े करती है। विपक्ष के कुछ नेताओं ने इसे सीधे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ते हुए सरकार पर प्रहार किया है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक्स पर पेंगुइन से पूछा, ‘सोनिया गांधी जी की आने वाली किताब को पेंगुइन की वर्ल्डवाइड कंपनी मूलस्वरूप में दुनियाभर में छापने को तैयार है, पर पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया भारत में इसे लॉन्च करने के लिए बदलाव करवाना चाहता है। आखिर जो दुनिया भर में छापा जा रहा है, उसे भारत में क्यों नहीं छाप सकते?’ अपनी इस पोस्ट में वे आगे दावा करते हैं कि प्रकाशक पर मोदी की कार्यप्रणाली, आरएसएस के राजनीतिक दखल और मोदी सरकार के शासनकाल के दौरान चीन द्वारा भारतीय क्षेत्र पर कब्जे से जुड़े अंशों को हटाने का दबाव डाला गया।

तो क्या कोई प्रकाशक आगे आएगा?

कई लोगों को यह बात पच नहीं रही है कि आखिर जब अमेरिका में इसी किताब के प्रकाशन में कोई दिक्कत नहीं है तो भारत में इसको लेकर बाल की खाल क्यों खींची जा रही है? और अगर वाकई इसे लेकर कोई गंभीर राजनीतिक दबाव है तो क्या कोई अन्य प्रकाशक भी इसका सामना करते हुए पुस्तक को प्रकाशित करने को तैयार होगा? लेकिन अब यह भी तय हो गया है कि भारत में किताब प्रकाशित न होने के बाद भी यह देश में काफी चर्चित किताब रहेगी। वे सारे मुद्दे और खुलकर सामने आएंगे, जो बगैर विवाद के प्रकाशित होने पर शायद इतना तूल नहीं पकड़ पाते।

यह भी दिलचस्प तथ्य …

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक दिलचस्प बात यह है कि 2020 से 2024 के बीच रक्षा मंत्रालय ने सैन्य अधिकारियों की 35 किताबों को मंजूरी दी थी। नरवणे की किताब उस अवधि में लंबित रहने वाली अकेली किताब थी और वह आज तक लंबित है। उसे अब तक अनुमति नहीं मिली है।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now