लेंस डेस्क। Reporters Without Borders (RSF) की ओर से जारी 2026 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों की सूची में 157वें स्थान पर पहुंच गया है। पिछले साल (2025) भारत 151वें स्थान पर था, यानी एक साल में छह पायदान की गिरावट दर्ज की गई। भारत का स्कोर भी 32.96 से घटकर 31.96 रह गया, जो RSF की श्रेणी में बहुत गंभीर माना जाता है।
RSF की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर प्रेस स्वतंत्रता 25 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। विश्व भर में औसत स्कोर में गिरावट आई है और 110 से ज्यादा देशों में स्थिति बिगड़ी है।
2000 के दशक और यूपीए शासन (2004-2014) के दौरान भारत की रैंकिंग आमतौर पर 100 से 140 के बीच रही। कुछ वर्षों में 106, 120, 133 भी थी। 2014 के आसपास रैंकिंग लगभग 140 के करीब थी। 2015-16 से गिरावट तेज हुई। 2019 में 140, फिर 142, 150, 159, 161 और अब 157 तक पहुंच गई। कुल मिलाकर पिछले 10-12 वर्षों में करीब 15-20 पायदान की गिरावट आई है।
गिरावट के मुख्य कारण
RSF रिपोर्ट में भारत में मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण, बड़े कॉर्पोरेट घरानों का बढ़ता नियंत्रण, राजनीतिक-मीडिया गठजोड़ और कानूनी दबाव को प्रमुख वजह बताया गया है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों (जैसे UAPA, NSA), मानहानि के मुकदमों, IT नियमों, 2023 टेलीकॉम्यूनिकेशंस एक्ट और डेटा प्रोटेक्शन कानूनों का इस्तेमाल स्वतंत्र पत्रकारों और छोटे न्यूज पोर्टल्स पर “कानूनी उत्पीड़न” के रूप में हो रहा है।
रिपोर्ट में “खुला राजनीतिक जुड़ाव” और कुछ मीडिया घरानों का सत्ताधारी दल से करीबी रिश्ता भी रेखांकित किया गया। साथ ही, स्व-संयम (self-censorship) की शिकायतें मुख्यधारा के मीडिया में आम बताई गई हैं। RSF ने “बढ़ता इस्लामोफोबिक नैरेटिव” और “हिंदू राष्ट्रवादी दक्षिणपंथ” का भी जिक्र किया, हालांकि यह हिस्सा विवादास्पद माना जा रहा है।
भारत सरकार और आलोचकों का पक्ष
भारत सरकार RSF इंडेक्स को अक्सर पश्चिमी उदारवादी मानकों पर आधारित और भारत-विरोधी नैरेटिव का हिस्सा बताकर खारिज करती रही है। आलोचक कहते हैं कि RSF भारत जैसे देशों में राष्ट्रीय सुरक्षा, बहुसंख्यक भावनाओं और आतंकवाद विरोधी उपायों को प्रेस स्वतंत्रता का उल्लंघन मान लेता है।
दूसरी ओर, कई भारतीय पत्रकार और संगठन मानते हैं कि जांच-पड़ताल वाली पत्रकारिता पर दबाव, एफआईआर, छापेमारी और कुछ मामलों में हमले जैसी समस्याएं मौजूद हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि पत्रकारों पर हमले दोनों पक्षों से होते हैं, लेकिन संख्या और पैटर्न चिंताजनक बताए जाते हैं।
कैसे बदल गए मीडिया हाउस
पिछले एक दशक में मीडिया हाउसों का स्वामित्व बड़े कॉर्पोरेट समूहों के हाथ में केंद्रित होने से पहले की विविधता (अंग्रेजी, हिंदी, क्षेत्रीय भाषाओं में अपेक्षाकृत स्वतंत्र कामकाज) प्रभावित हुई। हालांकि भारत में हजारों मीडिया आउटलेट्स जो टीवी, प्रिंट, डिजिटल, यूट्यूब हैं और कई स्वतंत्र पत्रकार अभी भी साहसिक रिपोर्टिंग कर रहे हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने कुछ हद तक विविधता बनाए रखी है।
गिरावट केवल कानूनी या सरकारी दबाव से नहीं जुड़ी है। मीडिया की विश्वसनीयता भी प्रभावित हुई है। फेक न्यूज, पेड न्यूज, टीआरपी-आधारित सनसनीखेज कवरेज और अत्यधिक ध्रुवीकरण ने जनता का भरोसा कम किया है।
दुनिया के बाकी देशों का हाल
इस मामले में नॉर्वे लगातार दसवें साल नंबर 1 है। उसके बाद नीदरलैंड्स, एस्टोनिया, स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क जैसे नॉर्डिक देश हैं। ये छोटे, समृद्ध और उच्च सामाजिक विश्वास वाले देश हैं जहां कानूनी सुरक्षा मजबूत है। भारत से पीछे वेनेजुएला, सूडान, इराक, तुर्की, अफगानिस्तान, ईरान, चीन (178वां), उत्तर कोरिया (179वां) और इरिट्रिया (180वां, सबसे खराब) है। पड़ोसी देश नेपाल (87वां), मालदीव (108वां), श्रीलंका (134वां), भूटान (150वां), बांग्लादेश (152वां), पाकिस्तान (153वां)। इस बार पाकिस्तान भारत से ऊपर है।










