लिवर, यकृत और हिंदी में एमबीबीएस की फ्लॉप पढ़ाई

MP Ki Baat

सरकारें कई बार फैसले लेते समय व्यावहारिक दृष्टिकोण नहीं रख पातीं। क्योंकि मकसद “राजनीतिक आकाओं” को प्रसन्न करना होता है। व्यावहारिक धरातल पर उसके फैसले का क्या नतीजा निकलेगा, इस बारे में सोचा ही नहीं जाता। ताज़ा मिसाल हिंदी माध्यम में मेडिकल (एमबीबीएस) की पढ़ाई की है, जो मध्यप्रदेश में फ्लॉप हो गई है।

राज्य की भाजपा सरकार ने तीन साल पहले बड़े तामझाम और शोर के साथ मेडिकल कॉलेजों में हिंदी माध्यम से शिक्षा का बीड़ा उठाया था, लेकिन छात्रों ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई। परीक्षा में उत्तर अंग्रेजी में ही लिखे गए। किसी छात्र-छात्रा ने हिंदी में प्रश्नों के उत्तर नहीं लिखे। एक ने भी नहीं। कारण साफ है, जब पूरी दुनिया में “लिवर को लिवर” पढ़ा और लिखा जा रहा है तो “यकृत” कौन लिखेगा? और फिर, मेडिकल की उच्च शिक्षा में हिंदी की कितनी उपयोगिता है? लेकिन, सरकार ने बिना कुछ सोचे-विचारे इन तीन वर्षों में हिंदी में कोर्स की पुस्तकें छपवाने पर 10 करोड़ रुपये खर्च कर दिए हैं।

दरअसल, वर्ष 2022 में, जब शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री थे, इस कार्यक्रम की लॉन्चिंग केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से कराई गई थी। यह सोचकर कि मध्यप्रदेश के इस नवाचार से शाह खुश होंगे। क्या मालूम, हुए भी हों, पर खुशी जाहिर न की हो। लेकिन, मोहन यादव की सरकार को शायद इसका पता चल गया है, तभी उसने अमित शाह को “और खुश” करने का इरादा कर लिया है। उसने हिंदी माध्यम का सीधे मेडिकल कॉलेज ही खोलने का निर्णय लिया है। 2027-28 सत्र से इसकी शुरुआत जबलपुर में होगी और एमबीबीएस की 50 सीटों पर दाखिला दिया जाएगा।

कहां है दिक्कत, राजभवन या वल्लभ भवन में?

अगर डॉ. नवनीत मोहन कोठारी, जिन्हें “सिया” विवाद के बाद पिछले सप्ताह पर्यावरण विभाग से हटाया गया था, की राजभवन में पोस्टिंग न हुई होती तो पता ही नहीं चलता कि बतौर राज्यपाल मंगू भाई छगन भाई पटेल को चार वर्ष पूरे हो गए हैं। सिवाय इसके कि चार वर्ष में राजभवन में पांच प्रमुख सचिव बदले गए हैं। इनमें भी डेढ़ साल में चार प्रमुख सचिव बदले गए। यानी, औसतन चार माह में एक।

दरअसल, इसके बाद ही राज्य मंत्रालय के गलियारों में मंगू भाई के कार्यकाल के बारे में चर्चा शुरू हुई। वैसे, नौकरशाही में राजभवन की पोस्टिंग को “पनिशमेंट पोस्टिंग” माना जाता है, बावजूद इसके कि सरकार राज्यपाल के नाम से ही चलती है। मंगू भाई ने 8 जुलाई 2021 को जब शपथ ली थी, तब एक साल पहले से डीपी आहूजा प्रमुख सचिव थे और 28 जनवरी 2024 तक रहे।

उनके बाद क्रमशः संजय शुक्ला (डेढ़ माह), मुकेश चंद्र गुप्ता (आठ माह), केसी गुप्ता (सात माह) को राजभवन भेजा गया और अब नवनीत कोठारी गए हैं। सवाल यही है कि श्यामला हिल्स जाने वाली सड़क की इस इमारत में अचानक ऐसा क्या हो गया कि अफसर टिक नहीं पा रहे हैं। दिक्कत कहां है- राजभवन में या वल्लभ भवन में?

छोटे पड़ने लगे मंत्रियों के बंगले

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ रहा है, लोगों में “और-और” की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। संतोष कम हो रहा है। जिसे देखो, “और” के चक्कर में चकरघन्नी बना रहता है। पार्षद बन गए तो विधायक, और फिर विधायक से मंत्री, मंत्री से मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री। मतलब, इच्छाओं का अंत नहीं है। हर मामले में यही हाल है। व्यक्ति को हर चीज़ “और चाहिए”। एक वाहन है तो दो चाहिए। दो कमरों का मकान है तो चार का चाहिए।

एक मंजिला है तो दूसरी मंजिल भी चाहिए। और, यदि पैसा खुद की जेब से न देना हो, तब तो “और” चाहिए ही चाहिए। उदाहरण के लिए मध्यप्रदेश सरकार के ऐसे मंत्री, जिन्हें आवंटित सरकारी बंगले अब छोटे पड़ने लगे हैं। लिहाजा, कई मंत्रियों के बंगलों में निर्माण का काम चल रहा है। बंगलो को एक से दो मंजिल का किया जा रहा है। राज्य का गठन 1956 में हुआ था, तब से मंत्री एक मंजिल से ही काम चलाते आए थे। लेकिन, अब वही बंगले छोटे पड़ने लगे हैं। सो, एक्सपांशन किया जा रहा है।

74 बंगले से गुजरने वाली लिंक रोड-1 पर एक बंगले में एक करोड़ का काम होना है। जबकि, करोड़ों पहले ही लग चुके हैं। बहरहाल, पब्लिक का पैसा है, और उसी पर खर्च किया जा रहा है। मंत्री भी तो जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए ही होता है। भला किसी को क्या दिक्कत होगी? जलने वाले तो जलेंगे ही…!

गोपाल भार्गव और जौन एलिया का यह शेर…

गोपाल भार्गव इस समय मध्यप्रदेश के सबसे वरिष्ठ विधायक हैं। 40 वर्ष से लगातार चुनाव जीत रहे हैं। इलाके पर पकड़ इसी से समझी जा सकती है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नृशंस हत्या के बाद हुए चुनाव में पार्टी के तमाम दिग्गज धराशायी हो गए, मगर भार्गव ने इसी चुनाव से विधानसभा में अपनी पारी की शुरुआत की। तब से वे “नॉट आउट” हैं।

2023 में नौवां चुनाव था। लेकिन, बीजेपी में अब इस सबसे फर्क नहीं पड़ता। वह ऐसी छोटी-मोटी चीज़ों से ऊपर उठ चुकी है। विपक्ष में रहकर पार्टी के झंडे के साथ संघर्ष करने वाले धीरे-धीरे भुलाए जाने लगे हैं। उनसे अब बेगार करवाई जा रही है। राज्य विधानसभा का मानसून सत्र चल रहा है। पिछले दिनों, भार्गव और भूपेंद्र सिंह ने सदन में नियम 139 के अधीन अविलंबनीय लोक महत्व की चर्चा “उठाई”। विषय था-“प्रदेश में लगातार कम होता भू-जल स्तर”।

कहने वाले कह रहे हैं-दोनों की परीक्षा थी। चर्चा खुद नहीं उठाई, बल्कि “उठवाई” गई। उस पर मजबूरी यह कि चर्चा “उठाने” से इनकार नहीं कर सकते, सरकार के खिलाफ बोल नहीं सकते। बोलना तारीफ में ही है। सो, परीक्षा दी गई। परिणाम कब आएगा और क्या आएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। लेकिन, परीक्षार्थी को नतीजे का इंतज़ार तो रहता ही है। संयोग देखिए, दोनों सागर के हैं और दोनों को ही 2023 में मंत्री नहीं बनाया गया था। भार्गव को भी नहीं, जबकि वे कमलनाथ सरकार में नेता प्रतिपक्ष थे। जौन एलिया का एक शेर है-“इलाज यह है कि मजबूर कर दिया जाऊं, वरना यूं तो किसी की नहीं सुनी मैंने।”

गैरों पर करम और अपनों पर सितम

“गैरों पर करम और अपनों पर सितम,” राजनीति में कई बार होता है ऐसा। आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा जब राज्यसभा सदस्य बनकर संसद में पहुंचे तो उन्हें पात्रता से एक टाइप ऊपर का बंगला आवंटित कर दिया गया। टाइप-6 की जगह टाइप-7। जाहिर है, बीजेपी कुनबे में इसे सहज रूप में नहीं लिया गया। कारण स्वाभाविक था। ऐसा ही मध्यप्रदेश में हुआ।

भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक, जो मंत्री नहीं बनाए गए थे, चाहते थे कि उनका आवास विधानसभा पूल में आवंटित हो जाए। ताकि, दिक्कत न हो। लेकिन, चाहने से क्या होता है? कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह की किस्मत बुलंद थी। भले ही उनकी पार्टी बुरी तरह चुनाव हार गई, लेकिन उनका बंगला बरकरार रहा।

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