नई दिल्ली। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश Jairam Ramesh ने मनरेगा के 20 साल पूरे होने पर कहा है कि मनरेगा एक परिवर्तनकारी क़ानून था। मोदी सरकार की नई योजना, जिसने इसे बुलडोज़र से खत्म कर दिया है, खामियों से भरी हुई है।
गौरतलब है कि आज से ठीक 20 साल पहले, मनरेगा को आंध्र प्रदेश के अनंतपुर ज़िले के बदनापल्ली गाँव में लॉन्च किया गया था। इन 20 वर्षों के दौरान, मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों को 180 करोड़ कार्य-दिवस प्रदान किए, अनुमानित 10 करोड़ सामुदायिक परिसंपत्तियाँ तैयार कीं, संकटजन्य पलायन को काफ़ी हद तक कम किया, ग्राम पंचायतों को सशक्त बनाया और ग्रामीण गरीबों की ज़्यादा मज़दूरी के लिए मोलभाव करने की शक्ति को निर्णायक रूप से बढ़ाया है।
जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर कहा है कि मनरेगा ने मज़दूरी को सीधे बैंक और डाकघर खातों में जमा करने के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर पहल की भी शुरुआत की। छोटे और सीमांत किसानों को अपनी ज़मीन पर खुद के लिए कुएँ जैसे सिंचाई साधन स्थापित करने का अवसर मिला।
वो कहते हैं कि मनरेगा एक मांग-आधारित कानूनी गारंटी था-सिर्फ़ एक प्रशासनिक वादा नहीं। यह संविधान के अनुच्छेद 41 से मिला हुआ एक अधिकार था। नागरिकों द्वारा माँग किए जाने पर काम आवंटित किया जाता था और ग्रामीण भारत में कहीं भी उपलब्ध कराया जाता था।
परियोजनाओं का निर्णय स्थानीय ग्राम पंचायत करती थी, और कुल लागत का केवल 10 फीसदी वहन करने के कारण राज्य सरकार को बिना बड़े वित्तीय बोझ के काम उपलब्ध कराने के लिए प्रोत्साहन मिलता था। ऑडिट नियमित रूप से किए जाते थे-ग्राम सभा के माध्यम से सामाजिक ऑडिट और CAG के माध्यम से उच्च-स्तरीय ऑडिट।
उन्होंने जीरामजी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मोदी सरकार का नया क़ानून केवल नई दिल्ली में केंद्रीकरण की गारंटी देता है। अब काम कुछ चुनिंदा ज़िलों में मोदी सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाएगा। काम नागरिकों की माँग के बजाय सरकार द्वारा आवंटित बजट के आधार पर दिया जाएगा। यह योजना हर साल दो महीनों के लिए, चरम कृषि गतिविधियों के दौरान, पूरी तरह बंद रहेगी-जो श्रमिकों की मोलभाव करने की शक्ति के लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि वे कृषि कार्य के लिए बेहतर वेतन के लिए मोलभाव नहीं कर पाएँगे।
जयराम कहते हैं पंचायत को हाशिए पर डाल दिया गया है, और परियोजनाएँ मोदी सरकार अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार तय करेगी। अंततः अब राज्यों को लागत का 40% वहन करना होगा-उनकी वित्तीय तंगी को देखते हुए वे ऐसा नहीं कर पाएँगे और काम देना ही बंद कर देंगे।










