नई दिल्ली। ग्रामीण भारत को रोजगार देने वाली सबसे सफल योजना मनरेगा (MNREGA) का नाम बदलने की तैयारी मोदी सरकार ने कर ली है। केंद्रीय कैबिनेट की आज की बैठक में इसे मंजूरी मिल चुकी है। इस योजना का नया नाम ‘पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार योजना’ (PBGROY) कर दिया गया है। यह दूसरी बार है जब इस योजना का नाम बदला गया। इससे पहले मनरेगा को नरेगा के नाम से जाना जाता था।
इसके साथ ही ग्रामीण परिवारों को मिलने वाले रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 करने का प्रावधान भी किया गया है। साथ ही न्यूनतम मजदूरी 240 प्रतिदिन किए जाने का प्रवधान किया गया है। वित्त वर्ष 2025-26 के लिए योजना पर 1.51 लाख करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया जाएगा। यह बदलाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने और महात्मा गांधी के ‘बापू’ के नाम से योजना को नया आयाम देने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है।
कब हुई थी शुरुआत
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) की शुरुआत 2005 में तत्कालीन यूपीए सरकार के दौरान हुई थी। 2009 में इस योजना का नाम बदलकर मनरेगा (MGNREGA) (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) कर दिया गया था।
यह अधिनियम ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन और आजीविका सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से लागू किया गया था। अधिनियम के तहत हर ग्रामीण परिवार के वयस्क सदस्यों को वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों का अकुशल मजदूरी आधारित रोजगार गारंटी दी जाती है।
यदि काम न मिले तो बेरोजगारी भत्ता भी प्रदान किया जाता है। योजना का मुख्य लक्ष्य ग्रामीण बेरोजगारी को कम करना, ग्रामीण बुनियादी ढांचे का निर्माण (जैसे सड़कें, तालाब, कुएं) और महिलाओं व कमजोर वर्गों को सशक्त बनाना रहा है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह योजना गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों के लिए एक सुरक्षा जाल साबित हुई है, हालांकि कार्यान्वयन में कई चुनौतियां जैसे वेतन भुगतान में देरी और भ्रष्टाचार की शिकायतें भी सामने आई हैं।
जब मोदी ने बताया था विफलताओं का स्मारक
2015 में लोकसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मनरेगा को ‘कांग्रेस की विफलताओं का जीवंत स्मारक’ करार दिया था। उन्होंने कहा था, “मेरा राजनीतिक विवेक कहता है कि मनरेगा को बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह स्वतंत्रता के 60 वर्षों बाद भी लोगों को गड्ढे खोदने पर मजबूर करने वाली विफलता का प्रतीक है।”
यह बयान यूपीए सरकार की नीतियों पर तीखा प्रहार था, जिसके बाद विपक्ष ने इसे योजना के महत्व को कमतर आंकने का प्रयास बताया। फिर भी, मोदी सरकार ने योजना को जारी रखा और समय-समय पर बजट बढ़ाया, खासकर कोविड-19 महामारी के दौरान जब यह ग्रामीण मजदूरों के लिए जीवन रेखा बनी।
अब 10 साल बाद नाम परिवर्तन के इस फैसले को मोदी सरकार की रीब्रांडिंग रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। बीते मंगलवार को रास मेला ग्राउन्ड में आयोजित एक जनसभा में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने मनरेगा को लेकर मोदी सरकार पर बड़ा हमला बोला था। ममता ने कहा था कि केंद्र सरकार ने राजनीतिक बदले की भावना में बंगाल की मनरेगा लाइफलाइन का गला घोंटा है। करीब 52 हजार करोड़ रुपये रोक दिए गए। ग्रामीणों को मजदूरी नहीं मिल पा रही है। उनके परिवार को कई समस्याओं का सामना भी करना पड़ रहा है। ऐसा करके सरकार ने राज्य के सबसे कमजोर लोगों पर हमला किया है।










