एक जैसे नाम और रूप वाली दवाइयाँ बन सकती हैं जानलेवा, सेंट्रल रजिस्ट्री बनाने की उठी मांग

देश के दवा बाजार में एक जैसी दिखने वाली और एक समान उच्चारण वाली दवाइयों (Look-Alike, Sound-Alike – LASA) का प्रचलन मरीज सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुका है. भारतीय बाजार में कई ऐसी दवाइयाँ मौजूद हैं, जिनके ब्रांड नाम तो लगभग एक जैसे हैं लेकिन उनके अंदर मौजूद सॉल्ट और उनका काम पूरी तरह अलग है. फार्मा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं के अनियोजित और बिना किसी स्पष्ट नीति के नाम रखने के कारण डॉक्टरों, मेडिकल स्टोर संचालकों और मरीजों के बीच भारी भ्रम पैदा हो रहा है. इसके कारण लगभग 25 प्रतिशत तक मेडिकल गलतियाँ हो रही हैं, जो कई मामलों में जानलेवा साबित हो सकती हैं.

क्या हैं लासा (LASA) दवाइयाँ और कैसे बढ़ता है जोखिम

जब दो अलग-अलग बीमारियों की दवाइयों के नाम बोलने या देखने में एक जैसे लगते हैं, तो उन्हें लासा (LASA) दवाइयाँ कहा जाता है. देश और दुनिया में ऐसी दवाइयों के कई आम उदाहरण हैं जो अक्सर बड़े हादसे का कारण बनती हैं.

हाई ब्लड प्रेशर के लिए दी जाने वाली दवा ‘ओल्वेंस’ (Olvance) और मानसिक रोग के इलाज में काम आने वाली ‘ओलियांज’ (Oleanz) के नाम इतने मिलते-जुलते हैं कि कोई भी धोखा खा सकता है. इसी तरह इंसानों की एंटीबायोटिक ‘आईमॉक्स’ (IMOX) और पशुओं के इलाज में काम आने वाले इंजेक्शन ‘इनीमॉक्स’ (INIMOX) के नाम में बेहद मामूली अंतर है. दर्द निवारक दवा ‘सेलेब्रेक्स’ (Celebrex) और अवसाद रोधी दवा ‘सेलेक्सा’ (Celexa) के बीच का भ्रम मरीज की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकता है.

ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने वाली ‘क्लोनिडाइन’ (Clonidine) और दौरे की रोकथाम के लिए दी जाने वाली ‘क्लोनोपिन’ (Klonopin) भी एक बड़ा उदाहरण हैं. डायबिटीज के मरीजों के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘ह्युमालॉग’ (Humalog) और ‘ह्युमुलिन’ (Humulin) दोनों इंसुलिन के प्रकार हैं, लेकिन इनके असर करने की गति और समय सीमा में काफी अंतर होता है, जिससे ब्लड शुगर खतरनाक स्तर तक गिर सकता है.

खुजली व घबराहट की दवा ‘हाइड्रोक्सीज़ाइन’ (Hydroxyzine) और गंभीर ब्लड प्रेशर की दवा ‘हाइड्रैलाज़ाइन’ (Hydralazine) में गलती होने पर जान जोखिम में पड़ सकती है. इसी तरह एंटीडिप्रेसेंट दवा ‘बुप्रोपियोन’ (Bupropion) और एंग्जायटी की दवा ‘बसपिरोन’ (Buspirone) के नाम डॉक्टरों और फार्मासिस्टों को भ्रमित करते हैं.

सामान्य दर्द निवारक ‘एसिटामिनोफेन’ (Acetaminophen) और मोतियाबिंद या सूजन के लिए दी जाने वाली ‘एसिटाज़ोलामाइड’ (Acetazolamide) में भी बड़ा अंतर है.

एक और चौंकाने वाला उदाहरण मानसिक स्वास्थ्य (OCD) के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा ‘क्लोमीप्रामाइन’ (Clomipramine) और बांझपन या फर्टिलिटी के इलाज में दी जाने वाली ‘क्लोमीफीन’ (Clomiphene) का है. यदि किसी मरीज को क्लोमीप्रामाइन की जगह क्लोमीफीन दे दी जाए, तो मानसिक लक्षण गंभीर हो सकते हैं, जबकि विपरीत स्थिति में अंडाशय में गंभीर सूजन (OHSS) जैसी स्थितियाँ बन सकती हैं.

गलतियों के केंद्र और स्वास्थ्य पर इसके दुष्परिणाम

लासा दवाइयों से जुड़ी गलतियाँ किसी भी स्तर पर हो सकती हैं. घर पर दवा लेते समय मरीज खुद धोखा खा सकता है, पर्चा लिखते वक्त डॉक्टर से चूक हो सकती है, या मेडिकल स्टोर पर फार्मासिस्ट गलत दवा दे सकता है. इसके अलावा दवा निर्माताओं, वितरकों और अस्पतालों में भर्ती मरीजों को दवा देते समय भी यह जोखिम बना रहता है. विशेषकर हाई-रिस्क वाली दवाइयों जैसे इंसुलिन और ओपिऑइड्स (दर्द निवारक) के मामले में छोटी सी भूल भी मरीज को कोमा में डाल सकती है या सांस की गति रोक सकती है. ऐसी भी घटनाएँ सामने आई हैं जहाँ महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी दवा को किसी दूसरे राज्य में एसिडिटी की दवा के नाम पर अनुमति मिल गई.

अदालती रुख और सरकारी प्रयासों की स्थिति

दवाइयों के इस भ्रम को रोकने के लिए वर्ष 2019 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, 1945’ में संशोधन का एक मसौदा पेश किया था. इसके तहत ब्रांड नाम से दवा बेचने वाले निर्माताओं को यह हलफनामा देना अनिवार्य किया जाना था कि उनका ब्रांड नाम बाजार में पहले से मौजूद किसी अन्य नाम से मेल नहीं खाता है. हालाँकि, जमीनी स्तर पर इसका पूर्ण क्रियान्वयन अभी भी एक चुनौती बना हुआ है.

वर्ष 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस गंभीर मुद्दे पर कड़ा संज्ञान लेते हुए ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) को एक केंद्रीय ड्रग डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया था. अदालत का निर्देश था कि राज्य दवा नियंत्रक किसी भी नए ब्रांड नाम को मंजूरी देने से पहले इस केंद्रीय डेटाबेस में नाम की जाँच करें, ताकि एक ही नाम से दो अलग-अलग दवाएँ बाजार में न आ सकें.

समाधान की दिशा: टॉल मैन लेटर्स और सेंट्रल रजिस्ट्री की मांग

वर्तमान में फार्मासिस्ट इस भ्रम को कम करने के लिए ‘टॉल मैन लेटरिंग’ (Tall Man Lettering) तकनीक का सहारा लेते हैं, जिसमें दवा के नाम के अलग हिस्सों को बड़े अक्षरों में लिखा जाता है (जैसे hydrOXYzine और hydralAZINE). इसके अलावा पर्चे को साफ-सुथरा लिखने और ई-प्रिस्क्रिप्शन का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है.

हालाँकि, इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए विशेषज्ञ डॉ. बी.आर. जगशेट्टी ने केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) को देश की सभी ब्रांडेड दवाओं की एक समयबद्ध सेंट्रल रजिस्ट्री (केंद्रीय रजिस्ट्रार) बनाने का सुझाव दिया है. इस डिजिटल रजिस्ट्री में देश में स्वीकृत हर ब्रांड नाम और उसके सटीक केमिकल सॉल्ट का ब्योरा दर्ज होगा. किसी भी नई दवा को मंजूरी देने से पहले इस सिस्टम के जरिए स्वचालित स्क्रीनिंग की जाएगी, जिससे एक जैसे नाम वाली दवाइयों का बाजार में आना पूरी तरह बंद हो सकेगा और मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी.

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now