डायन के बहाने हत्या, झारखंड में अंधविश्वास का भूत मेला

Jharkhand

अप्रैल 2026 में झारखंड के दुमका जिले के मुफस्सिल थाना क्षेत्र के डुमरसोल गांव में पिता नहीं बन पाने से नाराज मुंशी टुडू ने 55 साल की विधवा पक्कू हेंब्रम को ‘डायन’ मान लिया और अपने ही घर में उसकी लाठी से पीट-पीटकर हत्या कर दी। मुंशी टुडू ने इस घटना के बाद कहा कि शादी के बाद से विधवा उसे हर बात में टोका करती थी। शादी के तीन साल बाद ही जब मुंशी पिता नहीं बन सका, तो उसकी पत्नी उसे छोड़ कर चली गई। पिछले साल उसके पिता की भी मौत हो गई। इसके लिए विधवा महिला ही दोषी  थी।

वहीं, फरवरी 2026 में झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के कुदासाई-कलाइया गांव में डायन होने के आरोप में एक ही परिवार को पेट्रोल छिड़ककर जिंदा जलाया गया। इस हृदय विदारक घटना में 32 वर्षीय महिला और उसके दो माह के नवजात शिशु की जलकर मौत हो गई वहीं उसका पति गंभीर रूप से घायल हुआ। पुलिस इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया है। 

पिछले 10 सालों में डायन-बिसाही से संबंधित 6,000 से ज्यादा घटनाएं (सामाजिक और कानूनी तौर पर) दर्ज की गई है। अक्टूबर 2025 में एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 2023 में झारखंड डायन हत्या के 22 मामलों के साथ देश में अव्वल रहा।

इन भयानक आंकड़ों के बीच रांची जिला मुख्यालय से 252 किलोमीटर दूर पलामू जिले के हैदरनगर में मेला चैती नवरात्र के समय भूत मेला आयोजित होता है। दस दिनों के इस मेले में झारखंड के अलावा आस-पड़ोस के राज्यों से हजारों लोग अंधविश्वास का इलाज कराने भी आते हैं। यह मेला भी जिला प्रशासन की निगरानी और स्थानीय मंदिर कमेटी के लोगों की देखरेख में आयोजित होता है। ऐसे में सवाल उठता है कि एक तरफ सरकार डायन के नाम पर हत्या को रोकने का कोशिश रहा है वहीं दूसरी तरफ भूत मेला का आयोजन बंद नहीं करवा पा रहा है। आखिर क्यों?

कानून सदियों पुरानी प्रथा को खत्म नहीं कर सकता

राज्य में घटित अधिकांश घटनाओं के मुताबिक ग्रामीण इलाकों, खासकर आदिवासी समुदायों में, प्राकृतिक विपदा या बच्चों की मौत जैसी गंभीर बीमारी के फैलने पर लोग पहले नीम-हकीमों या ओझाओं की शरण लेते हैं। झोला-छाप डॉक्टरों और ओझाओं से कोई फायदा न होने पर वे पास-पड़ोस की किसी महिला को जिम्मेदार ठहराते हैं और उसे डायन करार दे देते हैं। आज भी गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण ये ओझा ही लोगों का सबसे बड़ा सहारा बने हुए हैं। ओझा के मुंह से निकला एक शब्द गांव वालों के लिए ब्रह्मवाक्य बन जाता है। डायन बताई गई महिला का उत्पीड़न शुरू हो जाता है, जो अक्सर उसकी जान लेकर ही थमता है। लोग कानून हाथ में लेकर उस कथित डायन को उसके ‘कर्मों’ की सजा दे देते हैं। ऐसी पीड़ित महिलाएं ज्यादातर छोटी जातियों से होती हैं।

रांची में रेडियो में काम कर रहें और मैथिली भाषा के लेखक कौशल झा बताते हैं कि, ‘महज कानून बना देने से सदियों पुरानी इस कुप्रथा को जड़ से मिटाना या इस पर अंकुश लगाना मुमकिन नहीं है। अंधविश्वास और निरक्षरता अभी भी व्यापक रूप से फैली हुई है, और पुलिस व्यवस्था अक्सर अप्रभावी होती है। झारखंड में बरसों पहले डायन प्रथा के खिलाफ कानून बनने के बावजूद डायन के नाम पर होने वाली हत्याओं में कोई कमी नहीं आ है।’

वर्ष 2025 में झारखंड में महिला दिवस के अवसर पर विभिन्न महिला संगठनों ने महिला दिवस पर महिला हिंसा समेत डायन अधिनियम पर संशोधन की मांग रखी।

झारखंड में 2001 से जादू-टोना विरोधी कानून लागू हैं, जो बिहार जादू-टोना निवारण अधिनियम पर आधारित है। किसी को डायन करार देने पर 3 महीने तक कैद और 1,000 रुपये जुर्माना। सभी अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती हैं। झारखंड राज्य विधि सेवा प्राधिकरण के अनुसार, पीड़ित जिला विधि सेवा प्राधिकरण से संपर्क कर सकते हैं। शिकायत दर्ज कराने के लिए अर्ध-कानूनी स्वयंसेवक ब्लॉक, अस्पतालों, पुलिस स्टेशनों और पंचायतों में तैनात हैं। पुलिस FIR न दर्ज करे तो मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दर्ज करा सकते है। डायन की पहचान, प्रचारित या षड‍्यंत्र करने पर झारखंड के अलावा छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे राज्यों में 3 महीने से लेकर अधिकतम 3 साल की सजा है। जबकि असम में सीधे आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। लेकिन मुख्य अभियुक्त यानी ओझाओं पर कार्रवाई न के बराबर होती है।

हाई कोर्ट के वकील और लेखक अंशुमान इस विषय पर बताते हैं कि, ‘जादू टोना का विचार ग्रामीण क्षेत्रों में फैला हुआ है, लेकिन इसका उद्देश्य अध्यात्मिक होने के बजाय जहरीला अधिक है। इस प्रथा पर प्रत्येक राज्य का अपना अलग-अलग कानून है। सच यह भी हैं कि केंद्रीय कानून के अभाव में पूरे देश में कानून के लागू होने में समानता की कमी है। अन्य केस की भांति इस केस में भी गवाह बाद में जब मुकर जाता है तो  तो मुकदमा पंगु हो जाता है, फिर निष्पक्ष सुनवाई नहीं हो सकती है। सरकार को इस विषय पर खास ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यह अपराध अन्य अपराध से अलग है। डायन-शिकार  समाज के ज्यादातर आदिवासी और पिछड़े लोग होते हैं। डायन प्रथा की जड़ें पितृसत्तात्मक मानसिकता, आर्थिक झगड़ों, अंधविश्वास और दूसरी निजी और सामाजिक संघर्ष में छिपी हैं।’

बनारस में पंडित और ज्योतिषाचार्य साकेत मिश्रा बताते हैं कि,”ग्रामीण इलाकों में भगत और ओझा का प्रभाव इतना है कि लोग अपनी बीमारी और पारिवारिक विवाद का संकट थाना और अस्पताल की बजाए उनके पास पहुंचते हैं। कोई भी कानून सदियों पुरानी किसी प्रथा को खत्म नहीं कर सकता है। सरकार को इसके लिए शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना होगा और जागरूकता फैलानी होगी। खासकर धर्म में मामले में इस तरह का कट्टरता अधिक देखने को मिलता है।”

स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक एनसीआरबी के आंकड़े राज्य के तस्वीर का असली रूप सामने नहीं लाते है। डायन के नाम पर होने वाली हत्याओं की तादाद इससे कई गुनी ज्यादा है। ग्रामीण इलाकों में डायन के खिलाफ लोगों की एकजुटता की वजह से ज्यादातर मामले पुलिस तक नहीं पहुंच पाती है। 

अंध विश्वास का आर्थिक मॉडल, और भूत भगाने के नाम पर तंत्र मंत्र के ठेकेदार

झारखंड में अंधविश्वास और डायन प्रथा सामाजिक कुरीतियों के साथ कमाने का जरिया भी बन गई है। किसी कमजोर महिला को डायन घोषित करने और भूत भगाने जैसी कुप्रथाओं के माध्यम से तंत्र मंत्र के ठेकेदार हजारों रुपये भोले भाले और मासूम लोगों से ऐंठ रहे हैं। 

स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक पलामू के हैदरनगर में आयोजित भूत मेला में एक एक व्यक्ति से 10 से 40 हजार रुपये तक वसूली की जाती है।  इस भूत मेला में कई राज्यो से लोग शामिल होतें हैं।  इस मेले से अंधविश्वास के ठेकेदारों की काफी कमाई होती है।

झारखंड की रहने वाले ट्वींकल गुप्ता बताती हैं कि, ‘झारखंड में कई जगह पर इस प्रथा को लेकर धार्मिक आयोजन होता है। इस तरह के आयोजन के माध्यम से महिलाओं को शोषण किया जाता है। कमजोर या अकेली महिला को अंधविश्वास के माध्यम से निशाना बनाया जाता है।’

विच हंटिंग: ए फॉर्म ऑफ़ वायलेंस अगेंस्ट दलित वूमेन इन इंडिया आर्टिकल में लेखिका तन्वी यादव लिखती है कि यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में अकाल, बाढ़, सूखा और महामारी जैसी आपदाओं के लिए डायन को जिम्मेदार ठहराया गया था, जिसके बाद कई मौतें हुईं। भारत में इस तरह की घटना का कारण दुश्मनी और निचली जाति की महिलाओं के प्रति यौन इच्छाएं थी।

झारखंड न्यायिक अकादमी में आयोजित कार्यक्रम में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश और राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (एनएएलएसए) के कार्यकारी अध्यक्ष, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 समानता, भेदभाव से मुक्ति और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार देते हैं। लेकिन इनका फायदा सभी को बराबर नहीं मिलता। डायन-शिकार को सामाजिक असमानता, पुरुषवादी सोच और गहरी जड़ें वाली सत्ता व्यवस्था से जुड़ी लैंगिक हिंसा का खतरनाक रूप माना जाता है। समस्या कानूनों की कमी नहीं, बल्कि उनके खराब क्रियान्वयन की है।

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