Israel-Iran War: अमेरिका-इजरायल का ईरान पर साझा हमला, मध्य पूर्व के लिए कितना बड़ा संकट? भारत पर क्‍या होगा असर?

US Israel-Iran War

लेंस डेस्‍क। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर साझा हमले से मध्य पूर्व में तनाव चरम पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो में ‘मेजर कॉम्बैट ऑपरेशंस’ की घोषणा की, जिसमें ईरान के सैन्य ठिकानों, मिसाइल कार्यक्रम और न्यूक्लियर सुविधाओं को निशाना बनाया गया।  ईरान ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की और मध्‍य पूर्व के देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलें दागी हैं।

अमेरिका ने मध्य पूर्व में कई जगहों पर अपने सैन्य ठिकाने बनाए हैं, जो इस क्षेत्र की भू-राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अमेरिकी थिंक टैंक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अनुसार, अमेरिका के कम से कम 19 साइट्स पर सैन्य सुविधाएं हैं, जिनमें से 8 स्थायी ठिकाने हैं।  ये ठिकाने बहरीन, मिस्र, इराक, जॉर्डन, कुवैत, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में फैले हुए हैं।

कतर का अल उदेद एयर बेस: यह अमेरिका का सबसे बड़ा एयर बेस है, जहां लगभग 10,000 सैनिक तैनात हैं। यह सेंट्रल कमांड का मुख्यालय है और हवाई अभियानों के लिए महत्वपूर्ण है।

बहरीन का नेवल सपोर्ट एक्टिविटी: यहां यूएस नेवी की फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय है, जो फारस की खाड़ी, लाल सागर और अरब सागर की सुरक्षा करता है।

कुवैत का कैंप अरिफजन और अली अल सलेम एयर बेस: ये ठिकाने लॉजिस्टिक्स और सैनिकों की तैनाती के लिए इस्तेमाल होते हैं।

यूएई का अल धफ्रा एयर बेस: यहां से हवाई हमले और निगरानी अभियान चलाए जाते हैं।

अन्य ठिकाने: इराक में अल असद एयर बेस, जॉर्डन में मुवाफक अल-साल्टी बेस, और सऊदी अरब में प्रिंस सुल्तान एयर बेस जैसे ठिकाने क्षेत्रीय स्थिरता और ईरान के खिलाफ कार्रवाई के लिए जरूरी हैं।

ये ठिकाने अमेरिका को क्षेत्र में त्वरित कार्रवाई करने की क्षमता देते हैं। वे इंटेलिजेंस इकट्ठा करने, हवाई हमलों और सैन्य सहायता प्रदान करने में मदद करते हैं। ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और न्यूक्लियर महत्वाकांक्षाओं के खिलाफ ये ठिकाने रणनीतिक ढाल की तरह काम करते हैं।  लेकिन ये ही ठिकाने ईरान के निशाने पर हैं, क्योंकि ईरान की मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें इन तक पहुंच सकती हैं।

ईरान का जवाबी हमला, तेल सप्‍लाई पर क्‍या होगा असर?

ईरान ने अमेरिका-इजरायल के हमले के जवाब में कई अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल दागे। ईरानी राज्य मीडिया के अनुसार, कतर का अल उदेद, कुवैत का अल सलेम, यूएई का अल धफ्रा और बहरीन का यूएस फिफ्थ फ्लीट मुख्य निशाने थे।  ईरान की इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड कोर ने कहा कि ये हमले अमेरिकी हमलों का ‘क्रशिंग’ जवाब हैं। ईरान ने पहले भी चेतावनी दी थी कि अगर हमला हुआ तो अमेरिकी ठिकाने सुरक्षित नहीं रहेंगे।

मध्य पूर्व की भू-राजनीति में अमेरिका अपने सहयोगियों (इजरायल, सऊदी अरब, यूएई) की रक्षा करता है, जबकि ईरान शिया समूहों (जैसे हूती, हिजबुल्लाह) के जरिए प्रभाव बढ़ाता है। यह संघर्ष क्षेत्रीय स्थिरता को बिगाड़ सकता है, जैसे यमन, सीरिया और इराक में नए हमले हो सकते हैं। अमेरिकी ठिकाने क्षेत्र में स्थिरता लाते हैं, लेकिन वे ईरान के लिए चुनौती भी हैं। अगर युद्ध लंबा चला, तो हॉर्मुज स्ट्रेट बंद हो सकता है, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है।

भारत के लिए क्‍या है टेंशन ?

यह संघर्ष भारत के लिए बड़ा खतरा है, क्योंकि भारत अपनी 50% से ज्यादा तेल की जरूरत मध्य पूर्व से पूरी करता है, खासकर हॉर्मुज स्ट्रेट से।  अगर स्ट्रेट बंद हुआ या हमले बढ़े, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। ब्रेंट क्रूड पहले ही 70 डालर प्रति बैरल पहुंच गया है और 10  डालर की बढ़ोतरी से भारत का आयात बिल 12-13 अरब डालर बढ़ सकता है।

भारत ईरान से तेल खरीदता है और इजरायल-अमेरिका से रक्षा सहयोग करता है। रूस से तेल आयात पर अमेरिकी प्रतिबंध पहले ही भारत को प्रभावित कर रहे हैं। अगर युद्ध बढ़ा, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। साथ ही, मध्य पूर्व में रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा चिंता का विषय है। भारत सरकार को वैकल्पिक तेल स्रोतों (जैसे वेनेजुएला) की तलाश करनी होगी, लेकिन ये महंगे पड़ेंगे। कुल मिलाकर, यह संकट भारत की विकास दर को 0.5% तक गिरा सकता है।

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