नफरती बयानों को लेकर क्या देशव्यापी कानून बनाने का वक्त नहीं आ गया?  

Hate Speech in India

वॉशिंगटन स्थित एक गैर-सरकारी संस्थान सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट ने भारत में नफरती भाषणों पर ‘हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया’ रिपोर्ट जारी की है। इसके मुताबिक साल 2025 में देश के 21 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों में हेट स्पीच के 1,318 मामले सामने आए हैं। यह पिछले वर्ष की तुलना में 13 फीसदी, जबकि 2023 की तुलना में लगभग दोगुनी (97 फीसदी) बढ़ोतरी है। 

इस रिपोर्ट का लब्बोलुआब देखें तो इसमें एक ट्रेंड एकदम साफ नजर आता है। हेट स्पीच की 88 फीसदी घटनाएं उन राज्यों में हुई हैं, जहां भाजपा शासित सरकारें काबिज हैं। इनमें उत्तर प्रदेश में 266, महाराष्ट्र में 193 और मध्य प्रदेश में 172 नफरती व भड़काऊ भाषण दिए गए। रिपोर्ट के मुताबिक हेट स्पीच के 289 मामलों (यानी करीब 22 फीसदी) में विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की सहभागिता रही है।

कोई भी इससे इनकार नहीं करेगा कि विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे समूहों को लगातार राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है और इसी वजह से भाजपा शासित राज्यों में इनके नफरती तेवरों पर किसी तरह की लगाम लगाने की कोशिश नहीं की गई। इसका कारण भी स्पष्ट है। चूंकि हेट स्पीच के राजनीतिक फायदे ज्यादातर भाजपा को हुए हैं। लिहाजा हेट स्पीच पर नियंत्रण करना तो दूर, सत्ता प्रतिष्ठानों के मुखिया या प्रमुख नेता भी अपने भाषणों में बढ़-चढ़कर नफरत फैलाने वाली बातें करते हैं।

रिपार्ट में उत्तराखंड के भाजपाई मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के 71 भाषण भड़काऊ पाए गए, तो भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय के 35 भाषणों को हेट स्पीच की श्रेणी में रखा गया। 

राजनीतिक तौर पर गैर भाजपाई विपक्षी दल हेट स्पीच की वजह से हमेशा नुकसान में रहे हैं, इसलिए विपक्ष शासित राज्यों में पुलिस और प्रशासनिक तंत्र ऐसे तत्वों को काबू में रखने का प्रयास करते हैं।

नतीजतन, विपक्ष शासित सात राज्यों में हेट स्पीच के सिर्फ 154 मामले सामने आए, जो 2024 की तुलना में 34 फीसदी कम हैं। दरअसल, जहां भी सांप्रदायिक भीड़ के प्रति पुलिस का रवैया नरम होता है, वहां ऐसी घटनाएं ज्यादा होती हैं। 1984 के सिख विरोधी दंगे और 2002 के गुजरात दंगे इसका प्रमाण हैं। जहां पुलिस एवं प्रशासन चुस्त होता है, वहां ऐसे मामले अमूमन कम होते हैं। 

मुस्लिम ही नहीं, ईसाई समुदाय भी निशाने पर…

बीते कुछ वर्षों के दौरान नफरती भाषणों के केंद्र में मुस्लिम ही ज्यादा रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2025 में भी मुस्लिम समुदाय को 1156 मामलों (यानी करीब 88 फीसदी) में विशेष रूप से निशाना बनाया गया। लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि इसी अवधि में ईसाई समुदाय के प्रति 162 भड़काऊ बयान दर्ज हुए, जो गत वर्ष की तुलना में 41 फीसदी अधिक हैं।

क्रिसमस के मौके पर हमने भले ही प्रधानमंत्री को चर्च में जाकर प्रार्थना सभा में भाग लेते हुए देखा, लेकिन उनकी पार्टी शासित राज्यों में संघ के अनुषंगी संगठनों द्वारा इसी समुदाय के खिलाफ फैलाई जा रही कटुता ने असल स्थिति को उजागर कर दिया है। इस बार कुछ राज्यों में क्रिसमस के दौरान सांता क्लास के बहाने ईसाई समुदाय को जिस तरह से निशाने पर लिया गया, वह भी अपने आप में अभूतपूर्व है। 

क्या कारगर रहेगा विशेष कानून?

गुजरे साल दिसंबर के दूसरे पखवाड़े में जब कर्नाटक सरकार ने ‘कर्नाटक हेट स्पीच एंड हेट क्राइम्स (प्रिवेंशन) बिल, 2025’ पारित किया, तो ऐसा करने वाला यह देश का पहला राज्य बन गया। यह बिल भड़काऊ भाषणों और इससे जुड़े अपराधों को रोकने के लिए बनाया गया है। इस कानून में हेट स्पीच की परिभाषा को स्पष्ट किया गया है।

इसके अनुसार धर्म, जाति, लिंग, यौन झुकाव आदि के आधार पर किसी व्यक्ति/समूह के खिलाफ नफरत फैलाने को हेट स्पीच माना जाएगा। अपराध को गैर जमानती बनाया गया है। इसमें एक बेहतर पहल यह है कि हेट स्पीच को लेकर संगठनों की जिम्मेदारी भी तय की गई है। नफरती भाषणों में अमूमन संगठन भी शामिल होते हैं। ऐसे में कानून में तय किया गया है कि अगर हेट स्पीच किसी संगठन से जुड़ी हो तो उसके जिम्मेदार अधिकारी भी दोषी माने जाएंगे। इस कानून की अनेक लोगों ने सराहना करते हुए अन्य राज्यों में भी इसी तर्ज पर कानून बनाए जाने की जरूरत जताई है।   

सवाल यह उठ सकता है कि क्या केवल कानून बनाने भर से नफरत फैलाने वाले भड़काऊ बयान रुक सकेंगे? अनेक समाजशास्त्रीय अध्ययनों में भीड़ की हिंसा को लेकर बताया गया है कि अगर कानून का डर न हो तो सीधे-साधे नजर आने वाले लोग भी उग्र रूप ले लेते हैं। आमतौर पर लोगों में पुलिस और कोर्ट-कचहरी का डर होता है और इसलिए कानून से कुछ तो रोक लगती है।

मिसाल के तौर पर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के विरुद्ध होने वाले अत्याचारों से संबंधित विशेष कानून ‘अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989’ को लिया जा सकता है। भले ही यह कानून जातिगत भेदभाव को पूरी तरह समाप्त न कर पाया हो, लेकिन इसने इन जातियों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर एक प्रभावी निवारक (डिटरेंट) की भूमिका जरूर निभाई है।

हालांकि यह भी सच है कि जिस तरह से इस कानून का दुरुपयोग हुआ है, उसी तरह से हेट स्पीच को लेकर बनाए जाने वाले कानूनों का भी दुरुपयोग हाे सकता है, जैसा कि भाजपा ने इसकी आशंका जताई है। लेकिन सवाल यह भी है कि भाजपा शासित अनेक राज्यों ने लव जिहाद पर कानून बना रखे हैं और वहां भी इनके दुरुपयोग को लेकर उनकी सरकारों पर अनेक आरोप लगते आए हैं। तो क्या कानूनों को लेकर राजनीतिक पार्टियों से समदृष्टि रखते हुए संविधान के अनुसार व्यवहार करने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए? 

  • लेखक वरिष्‍ठ पत्रकार हैं

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