अभी-अभी भारत-भाग्य-विधाता सड़कों पर थे।
यह एक हिस्सा था।
बड़ा हिस्सा था।
देश के लिए मायने रखने वाला हिस्सा था।
ये युवा था।
जब भारत-भाग्य-विधाता की बात होगी तो इस देश के युवा होंगे, मजदूर होंगे, किसान होंगे, महिलाएं होंगी…
हर वह नागरिक होगा जो इस देश के भविष्य के लिए, नागरिकों की बेहतरी के लिए, गैरबराबरी के खिलाफ बराबरी के लिए, नाइंसाफी के खिलाफ इंसाफ के लिए, लोकतांत्रिक उम्मीदों के लिए, अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए लड़ रहा होगा, कुछ कर रहा होगा।
हर वह व्यक्ति जिसे संविधान से इंसाफ की उम्मीद है।
उस इंसाफ की आस में हर सुबह अपने घर से निकलकर अपने हिस्से की लड़ाई लड़ता होगा।
अपनी हिस्सेदारी से एक ऐसे समाज को गढ़ना चाहता होगा जहां समता हो, सामूहिकता हो…
ऐसे अधिनायक हों, जिनमें यह आम इंसान भी हिस्सेदार बने।
देश के निर्माण में इसकी भी हिस्सेदारी हो।
आजादी इसकी भी चौखट तक पहुंचे।
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द लेंस की नियमित बैठक में हम इसी सवाल पर विचार कर रहे थे।
हमने सोचा, क्यों न उस अवाम की जिंदगी का जायजा लिया जाए जिसके कंधों पर ऐसा भार है जिसे कोई ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर, वैश्य समाज का व्यक्ति उठाना नहीं चाहेगा!
इन कंधों पर ऐसा भार जिसमें भरपूर मैला हो, बदबू हो, कीड़े हों…
जिसे उठाकर वो हमारे शहरों को, गांवों को, मोहल्लों को साफ रखते हों…
जिनकी मेहनत के दम पर शहरों को स्मार्ट बनाए जाने के दावे होते हों।
और इन दावों के बीच लाखों-करोड़ों गटर के रास्ते उनकी जेबों में चले जाते हों, जो देश के स्वयंभू अधिनायक बने बैठे हों!
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हमने सोचा कि क्यों न उस अवाम की चौखट पर जाया जाए और देखा जाए कि आजादी वहां पहुंची या नहीं?
देखा जाए कि संविधान की वह प्रस्तावना उनकी चौखट पर पहुंची या नहीं, जहां लिखा है— ‘हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए…’
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हम महसूस करना चाहते थे कि जिस आरक्षण से समाज के प्रभावशाली हिस्से उबले हुए हैं, जिसको लेकर देश में युवाओं के बीच विभाजन की दीवार खड़ी करने की साजिश चल रही है, उसका कितना लाभ देश के असली अधिनायकों, भाग्य-विधाताओं की बदबूदार गलियों में पहुंचा?
हम समझना चाहते थे कि जिसने आजादी के बाद भी मैला साफ किया हो, उसकी औलादें आज क्या कर रही हैं?
हम समझना चाहते थे कि क्या उन्हें वह गरिमा, न्याय, विश्वास और अवसर हासिल हुआ है, जिसके बारे में हम पिछले 79 वर्षों से बात करते आ रहे हैं?
हम चाहते थे कि हम यह जान सकें कि सफाईकर्मियों की बस्ती में, उनकी गलियों में, उनकी चौखट पर संविधान जिंदाबाद है या नहीं?
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पूरी कहानी आप हमारी सहयोगी पूनम ऋतु सेन की रिपोर्ट में सुन सकते हैं, जिसका लिंक नीचे संलग्न है।
हम बस आपको इतना बताते चलते हैं कि इस बस्ती में ऐसे परिवार भी मिले जहां मां-बाप, दादा-दादी ने मैला साफ किया था।
आज बच्चे भी मैला साफ कर रहे हैं।
तीसरी पीढ़ी भी यही काम कर रही है।
गटर में डूबकर मर रहे हैं!
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आइए इस श्रम में भी आरक्षण की मांग करें!
आखिर देश के सबसे जरूरी कामों में से एक यह काम यही लोग क्यों करें?
इस बार जब आरक्षण की बात हो तो इस काम में भी हिस्सा मांगना न भूलिएगा।
पूरी रिपोर्ट सुनिए और कहिए—
जय हे…जय हे…जय हे!








