दिल्ली।देश में वोटर लिस्ट और SIR को लेकर चल रहे विवादों पर पूर्व गृहसचिव और पूर्व भाजपा सांसद आर. के. सिंह ने देशवासियों के नाम एक खुला ख़त लिखा है। वह खत यहाँ हिंदी में प्रस्तुत है।मेरे सभी देशवासियों के नाम एक खुला ख़तक्या आप चाहते हैं कि भारत एक लोकतंत्र बना रहे? तो आपको यह समझना होगा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और उनके आका तथाकथित SIR में क्या कर रहे हैं। वे क़ानून का उल्लंघन कर रहे हैं।
1. क़ानून की धारा 21 के मुताबिक़, विशेष पुनरीक्षण केवल विशेष परिस्थितियों में ही किया जा सकता है और हर मामले में उसके कारणों को लिखित रूप में दर्ज करना आवश्यक है। वह भी किसी निर्वाचन क्षेत्र या उसके किसी हिस्से तक सीमित होना चाहिए। पूरे देश के लिए गहन पुनरीक्षण (SIR) का आदेश ग़ैर-क़ानूनी था। विशेष परिस्थितियों के लिए बनाया गया अपवाद सामान्य नियम नहीं बन सकता। सामान्य SIR को बरक़रार रखने वाला सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला ग़लत था। एक और सवाल है: पूरे देश में SIR का फ़ैसला किसने लिया? पूरी निर्वाचन आयोग ने या केवल ज्ञानेश कुमार ने?
2. जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 के अनुसार, जब मतदाता सूची का पुनरीक्षण शुरू किया जाता है, तो पुनरीक्षण की अधिसूचना जारी होने के समय जो मतदाता सूची लागू थी, वह पुनरीक्षण पूरा होने तक प्रभावी रहती है। संशोधित मतदाता सूची तभी अंतिम मानी जाती है जब नाम जोड़ने या हटाने से संबंधित सभी अपीलों का निपटारा हो जाए। जहाँ अपीलें लंबित थीं, वहाँ अधिसूचना की तारीख़ को लागू मूल मतदाता सूची का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था। इसके विपरीत, अपीलें लंबित होने के बावजूद नाम हटाए जाने वाली नई सूची का इस्तेमाल चुनावों में किया गया। यह ग़ैर-क़ानूनी था।
3. RP Act की धारा 22 के तहत किसी मतदाता का नाम मतदाता सूची से हटाने का अधिकार केवल Electoral Registration Officer (ERO) को है, किसी और को नहीं। वह भी केवल धारा 22(a), (b) और (c) में दिए गए आधारों पर। इसके लिए बाक़ायदा जाँच होनी चाहिए, संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाना चाहिए और उसके आदेश के ख़िलाफ़ दायर अपीलों के निपटारे के बाद ही नाम हटाया जा सकता है। ज्ञानेश कुमार ने 2003 के बाद ERO द्वारा मतदाता सूची में शामिल किए गए सभी मतदाताओं के नाम बिना किसी आधार, बिना किसी जाँच और बिना संबंधित मतदाताओं को कारण बताओ नोटिस दिए हटा दिए।
यह खुला और स्पष्ट ग़ैर-क़ानूनी क़दम था।जिन लोगों के नाम इस तरह अचानक हटा दिए गए, उन्हें नए मतदाता के रूप में Form 6 भरकर फिर आवेदन करना पड़ा और यह प्रमाण देना पड़ा कि वे मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के योग्य हैं। यह सुप्रीम कोर्ट के Lal Babu Hussain and Others v. Electoral Registration Officer and Others [(1995) 3 SCC 100] के फ़ैसले का साफ़ उल्लंघन है। इस फ़ैसले में कहा गया था कि किसी पंजीकृत मतदाता को अयोग्य ठहराने का दावा करने वाला जाँच प्राधिकारी या आपत्ति दर्ज कराने वाला व्यक्ति ही उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य पेश करेगा, मतदाता नहीं। ऐसे मामलों में मतदाता को यह बताने का अवसर दिया जाना चाहिए कि प्रस्तुत आधारों पर उसका नाम क्यों न हटाया जाए। यहाँ इनमें से कुछ भी नहीं हुआ।स्थापित न्यायिक सिद्धांत यह है कि किसी व्यक्ति को किसी अधिकार से वंचित करने या दंडित करने के लिए पर्याप्त आधार होने का भार उस व्यक्ति या संस्था पर होता है जो यह कार्रवाई करना चाहती है।
यहाँ ज्ञानेश कुमार ने प्रमाण प्रस्तुत करने की ज़िम्मेदारी उलटकर मतदाता पर डाल दी। यह भी क़ानून के ख़िलाफ़ है।अब तक सरकार और निर्वाचन आयोग की कोशिश हमेशा यह रही है कि सभी योग्य मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल किया जाए। यह लोकतंत्र को गहरा करने और सभी नागरिकों को सशक्त बनाने का अभियान था। देश के इतिहास में यह पहली बार है कि अभियान का मक़सद लोगों को मताधिकार से वंचित करना बन गया है।ज्ञानेश कुमार ने Form 6 में एक नया परिशिष्ट जोड़ दिया। उन्हें ऐसा करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि Form 6 वैधानिक नियमों के तहत निर्धारित है। उन्होंने यह परिशिष्ट दोनों निर्वाचन आयुक्तों की राय के ख़िलाफ़ स्वयं जोड़ा। आयोग के फ़ैसले या तो सर्वसम्मति से या बहुमत से लिए जाते हैं। दोनों निर्वाचन आयुक्त इस नए परिशिष्ट को जोड़ने के ख़िलाफ़ थे।
इसलिए Form 6 में यह नया परिशिष्ट जोड़ना स्वयं आयोग के फ़ैसले के ख़िलाफ़ था। फिर इसे क्यों जोड़ा गया? किसके आदेश पर जोड़ा गया? यह ग़ैर-क़ानूनी था।इस परिशिष्ट में आवेदक से यह बताने को कहा गया कि 2003 की मतदाता सूची में उसके माता-पिता के नाम किस क्रमांक पर दर्ज थे। एक सामान्य व्यक्ति, मसलन 18 साल का कोई नौजवान, 2026 में 2003 की मतदाता सूची तक कहाँ से पहुँचेगा? इस वजह से सभी युवा मतदाताओं का पंजीकरण रुक गया। BJP जानती है कि युवा मतदाता उसे वोट नहीं देंगे।
Form 7 में मतदाताओं के नाम शामिल किए जाने पर बड़े पैमाने पर आपत्तियाँ दाख़िल की गईं। इन्हें किसने दाख़िल किया? जब उन पर हस्ताक्षर करने वाले लोग स्वयं उपस्थित नहीं हुए तो इन फ़ॉर्मों को स्वीकार कैसे किया गया और उन पर कार्रवाई कैसे हुई?पश्चिम बंगाल में ERO द्वारा वैध पाए गए 16 लाख मतदाताओं के नाम दर्ज नहीं किए गए, क्योंकि ऐसा लगता है कि निर्वाचन आयोग ने उनके ख़िलाफ़ अपीलें दाख़िल कर दीं। क्यों? किन आधारों पर? आयोग को अपीलें दाख़िल करने का अधिकार किसने दिया? दो निर्वाचन आयुक्तों का कहना है कि उन्होंने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया। यानी आयोग ने किसी को अपील दाख़िल करने के लिए अधिकृत नहीं किया। फिर यह किसने किया? ज्ञानेश कुमार ने? इन लोगों को चुनाव में वोट देने से रोक दिया गया।तो क्या निर्वाचन आयोग और किसी राजनीतिक दल के कुछ लोग मिलीभगत करके बड़ी संख्या में फ़र्ज़ी Form 7 आपत्तियाँ दाख़िल करवा रहे थे और नाम हटवा रहे थे?
जब लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित थीं, तब चुनाव होने की अनुमति कैसे दी गई? निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट को इसका जवाब देना होगा। जिन अपीलों पर फ़ैसला हुआ है, उनसे पता चलता है कि जिन मतदाताओं को सूची से बाहर रखा गया, उनमें 90 प्रतिशत वैध थे।“Logical discrepancy” नाम की एक हास्यास्पद चीज़ सामने लाई गई। ज्ञानेश कुमार को भारत के ग़रीबों की ज़िंदगी के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं है। उनके बच्चे अस्पतालों में पैदा नहीं होते। उनके पास जन्म प्रमाणपत्र नहीं होते। उनके घरों में कैलेंडर तक नहीं होते।
जब BLO उन्हें मतदाता सूची में दर्ज करने के लिए पहुँचा तो उन्होंने अपने जन्म का अनुमानित वर्ष बताया। इसी तरह जब उनके पिता का नाम मतदाता सूची में दर्ज किया गया था, तब उन्होंने अपने जन्म का अनुमानित वर्ष बताया था।ज्ञानेश कुमार के अधीन निर्वाचन आयोग के इन नासमझ लोगों ने कहा कि पिता और बच्चे की उम्र में 15 वर्ष से कम का कोई अंतर “logical discrepancy” है और इसी आधार पर उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं। “Logical discrepancy” वाले नाम बिना किसी जाँच के हटा दिए गए, जो अधिनियम की धारा 21 के विपरीत था।सबसे बड़ी संख्या में नाम ग़रीबों और वंचित लोगों के हटाए गए हैं, उन लोगों के जिनकी कोई आवाज़ नहीं है। वे पहले भी और आज भी अपने घरों से दूर रहकर रोज़ी-रोटी कमाने के लिए मजबूर हैं। लाखों लोग दूर-दराज़ के स्थानों और दूसरे राज्यों में काम कर रहे हैं। वे अपने नाम दर्ज कराने के लिए एक महीने के लिए घर वापस जाने का ख़र्च नहीं उठा सकते।
अगर वे कमाने नहीं जाएँगे तो उनके घरों में चूल्हा नहीं जलेगा। वे जटिल फ़ॉर्म नहीं भर सकते। उनके पास जन्म प्रमाणपत्र और दूसरे दस्तावेज़ नहीं हैं। आख़िर एक वोट के लिए वे अपनी रोज़ की मज़दूरी क्यों छोड़ें?ग़ैर-क़ानूनी आप्रवासियों पर इसका असर नहीं पड़ा है। भारत में दाख़िल होने के बाद वे सबसे पहले अपने दस्तावेज़ बनवाते हैं, जैसे आधार कार्ड, राशन कार्ड आदि। पहले से आए हुए आप्रवासी उनके लिए मददगार नेटवर्क का काम करते हैं। मताधिकार से वंचित भारतीय नागरिक ग़रीब लोग हैं। निर्वाचन आयोग के ये नासमझ लोग और उनके आका इसे समझ नहीं पाए। या फिर वे यही चाहते थे।ज्ञानेश कुमार ने एक डिजिटल मतदाता सूची बनाई है और उसे “Logical discrepancy” के आधार पर नाम जोड़ने से इनकार करने का अधिकार दे दिया है। “Logical discrepancy” के नाम पर लाखों मतदाताओं के नाम शामिल नहीं किए गए हैं। यह क़ानून के ख़िलाफ़ है।
क़ानून के तहत नाम जोड़ने या हटाने और मतदाता सूची प्रकाशित करने का अधिकार केवल Electoral Registration Officer को दिया गया है। इसके विपरीत मतदाता सूची को केंद्रीकृत कर दिया गया और पुनरीक्षण का काम भी केंद्रीय स्तर पर किया गया। यह ग़ैर-क़ानूनी था।दो निर्वाचन आयुक्तों ने बताया कि जिन लोगों को नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार है, यानी ERO, DEO और CEO, उन्हें मतदाता सूची तक पहुँचने की अनुमति ही नहीं दी जा रही थी। गोवा में ERO ने 97 मतदाताओं को वैध और मतदाता सूची में शामिल किए जाने के योग्य पाया। लेकिन वे अब तक अपने नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं करवा सके हैं।मतदाता सूची में संशोधन का केंद्रीकरण ख़तरनाक है। इसका इस्तेमाल उन बूथों से मतदाताओं के नाम काटने के लिए किया जा सकता है जहाँ NDA के ख़िलाफ़ वोट पड़ते हैं। क्या ऐसा ही हुआ?सत्यापन से पहले मतदाताओं के नाम हटाना एक घोर अपराध है और इसके लिए ज्ञानेश कुमार ज़िम्मेदार हैं।
अब तक SIR के ज़रिए 13 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं। यह कुल मतदाताओं का 13 प्रतिशत है और SIR अभी पूरा भी नहीं हुआ है। 2024 के चुनाव में NDA और INDIA के बीच अंतर केवल 3 प्रतिशत था। इसलिए इन नामों को हटाने का चुनावों पर प्रभाव पड़ा है और आगे भी पड़ेगा।26 सितंबर को आयोग की बैठक के बाद जारी प्रेस नोट ऊपर बताए गए ग़ैर-क़ानूनी क़दमों की पुष्टि करता है।क्या ज्ञानेश कुमार ने ये सभी ग़ैर-क़ानूनी काम ख़ुद किए या उनके आकाओं ने उन्हें ऐसा करने का निर्देश दिया था?विपक्ष कहता है कि वह ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग चलाएगा। यह कवायद बेकार है। उनके पास इसके लिए पर्याप्त संख्या नहीं है। अगर वे वास्तव में कोई समाधान चाहते हैं तो उन्हें ज्ञानेश कुमार के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज कराने चाहिए।अगला क़दम यह होना चाहिए कि सभी विपक्षी दल एकजुट होकर कहें कि वे किसी भी चुनाव में तब तक हिस्सा नहीं लेंगे जब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्त इस्तीफ़ा नहीं देते और उनके उत्तराधिकारियों का चयन पिछली चयन प्रक्रिया के अनुसार नहीं किया जाता, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के किसी मौजूदा न्यायाधीश को शामिल किया गया था।जिन राज्यों में लाखों मतदाताओं की अपीलें लंबित होने के बावजूद चुनाव कराए गए, वहाँ के चुनाव रद्द किए जाने चाहिए और नए सिरे से चुनाव कराए जाने चाहिए और मतदान EVM के बजाय बैलेट पेपर से होना चाहिए, क्योंकि अभी तक ऐसी कोई इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली नहीं बनाई गई है जिसे हैक न किया जा सके।
यही वजह है कि आर्थिक और डिजिटल रूप से उन्नत देशों में EVM का इस्तेमाल नहीं होता।अगर हम अपने लोकतंत्र को बचाए रखना चाहते हैं तो पूरे देश को जागरूक और एकजुट करना होगा।SIR पर दिए गए फ़ैसले ने सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा को धूमिल किया है। इसकी बदनामी आपातकाल को सही ठहराने वाले फ़ैसले के बराबर है। माननीय न्यायाधीशों को इस पर ध्यान देना चाहिए।निर्वाचन आयुक्तों के चयन से संबंधित क़ानून को चुनौती देने वाली याचिका पर हो रही देरी भी सुप्रीम कोर्ट के बारे में एक ग़लत संदेश दे रही है। यह एक बिल्कुल स्पष्ट मामला है कि निर्वाचन आयुक्तों का चयन सत्ता में बैठी पार्टी द्वारा नहीं, बल्कि एक निष्पक्ष चयन समिति द्वारा किया जाना चाहिए, ताकि उनकी निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।आइए, अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए एकजुट हों।आर. के. सिंह(सेवानिवृत्त IAS, पूर्व केंद्रीय गृह सचिव)
लोकतंत्र के लिए खतरा हैं ज्ञानेश कुमार की कार्यवाहियाँ, बोले पूर्व गृह सचिव
🗓️ Published: September 29, 2026 11:02 am | 🔄 Updated: September 29, 2026 11:28 am









