नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आज (29 सितंबर) संभल हिंसा 2024 (Sambhal Violence)के मास्टरमाइंड बताए गए मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 के तहत एहतियाती हिरासत रद्द कर दी। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का वह फैसला भी खारिज कर दिया, जिसमें हिरासत आदेश को सही ठहराया गया था। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार अफरोज द्वारा पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश नहीं दे सकती थी। जानकारी के लिए आपको बता दें तमाम मीडिया हाउसेज ने उन्हें अपराधी की तरह दिखाया।
अवैध एहतियाती हिरासत आदेश पारित करने के लिए सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।याद रहे कि 8 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखते समय पीठ ने कथित कस्टोडियल कबूलनामे की प्रासंगिकता और महत्व पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने पूछा था कि क्या ऐसा कबूलनामा प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश जारी करने के लिए जरूरी व्यक्तिगत संतुष्टि का आधार बन सकता है।
हिरासत में करा लिया जुर्म कुबूल
याचिकाकर्ता मुल्ला अफरोज संभल हिंसा का आरोपी हैं। यह हिंसा शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-आदेशित सर्वे के बाद हुई थी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई। उन्हें घटना के लगभग 54 दिन बाद गिरफ्तार किया गया था। आरोप है कि यह गिरफ्तारी पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे के आधार पर हुई।बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी, लेकिन 13 अक्टूबर 2025 को NSA के तहत उनके खिलाफ हिरासत आदेश जारी कर दिया गया। हाईकोर्ट ने बाद में इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता का कहना था कि हिंसा के दौरान पुलिस ने खुद फायरिंग की थी और इस पहलू की निष्पक्ष जांच नहीं हुई। उन्होंने इस संबंध में प्रोटेस्ट पिटीशन दायर करने की अनुमति मांगी।
क्या कहा मुल्ला अफरोज ने
मुल्ला अफरोज ने यह भी तर्क दिया कि उनकी गिरफ्तारी पुलिस हिरासत में दिए गए इकबालिया बयान पर आधारित थी, जो कानूनन अमान्य है। प्रिवेंटिव डिटेंशन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि सिर्फ कई आपराधिक मामले होने से हिरासत जायज नहीं हो जाती। इसके लिए पर्याप्त सामग्री के आधार पर ईमानदार और सूचित सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन जरूरी है। उन्होंने **रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य और अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य का हवाला दिया और कहा कि केवल यह संभावना कि बंदी दोबारा अपराध में शामिल हो सकता है, ठोस सामग्री के बिना प्रिवेंटिव डिटेंशन का वैध आधार नहीं बन सकती।
सरकार का पक्ष
हिरासत आदेश का बचाव करते हुए राज्य ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा हिंसा कराने या लोक व्यवस्था प्रभावित करने की संभावना मौजूद थी। अगर उपलब्ध सामग्री से ऐसी आशंका दिखती है, तो प्रिवेंटिव डिटेंशन जायज है। कस्टोडियल कबूलनामे को लेकर राज्य का तर्क था कि वह बयान प्रासंगिक है या नहीं, यह उचित कानूनी कार्यवाही में देखा जाना चाहिए।







