नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट दर्ज की गई है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के शुक्रवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, 24 अप्रैल को समाप्त सप्ताह के दौरान देश के विदेशी मुद्रा भंडार में 4.82 बिलियन डालर की कमी आई है, जिसके बाद कुल भंडार घटकर 698.487 बिलियन डालर रह गया है। इससे पहले सप्ताह में इसमें 2.362 बिलियन डालर की बढ़ोतरी हुई थी।
इस गिरावट में विदेशी मुद्रा आस्तियों (FCA) में 2.841 बिलियन डालर की कमी और सोने के भंडार की वैल्यू में 1.897 बिलियन डालर की गिरावट मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। अब FCA 554.622 बिलियन डालर और सोने का भंडार 120.236 बिलियन डालर रह गया है। मार्च 2026 के अंत में RBI के पास 880.52 टन सोना था, जो कुल भंडार का करीब 16.7% है।
पिछले महीनों का ट्रेंड
- अप्रैल के पहले तीन सप्ताह में भंडार में $14 बिलियन से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई।
- मार्च 2026 के चार सप्ताहों में $40 बिलियन से अधिक की भारी गिरावट आई।
- फरवरी 2026 के अंत में भंडार $728.494 बिलियन के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचा था।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह गिरावट मुख्यतः RBI द्वारा रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए डॉलर बेचने, विदेशी निवेशकों की निकासी और पश्चिम एशिया संकट से बढ़े तेल आयात बिल के कारण है।
अर्थव्यवस्था के लिए क्या मतलब?
विदेशी मुद्रा भंडार किसी देश की आर्थिक ढाल की तरह काम करता है। इसकी गिरावट का अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है, खासकर महंगाई के मोर्चे पर। भंडार घटने से रुपये का अवमूल्यन हो सकता है। कमजोर रुपये से आयात महंगे हो जाते हैं। भारत 80% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे पेट्रोल-डीजल, परिवहन और खाद्य वस्तुओं की कीमतों को प्रभावित करती है, जिससे महंगाई बढ़ती है। महंगे आयात से चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ सकता है। इससे उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, जो आम आदमी की जेब पर बोझ बनता है।
RBI के लिए चुनौती
RBI को रुपये को संभालने के लिए और डॉलर बेचने पड़ सकते हैं, जिससे भंडार और घट सकता है। हालांकि, RBI गवर्नर ने कहा है कि भंडार पर्याप्त हैं। 11 महीने से ज्यादा के आयात कवर के बराबर और चिंता की बात नहीं है, लेकिन लंबे समय तक दबाव बने रहने पर ब्याज दरों या अन्य उपायों का सहारा लेना पड़ सकता है, जो आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकता है।









